अलसाया और मदमाता हुआ फागुन चारों ओर छा गया है. रंग-गुलाल इतने उड़ रहे हैं कि आसमान रंगीन हो गया है. उत्तर भारत में होली के एक दिन पहले होलिका दहन की परंपरा है. होलिका दहन का कॉन्सेप्ट भले ही एक पौराणिक कहानी से निकला है, लेकिन असल में ये मौसम बदलने के सूचना है. इसीलिए इस उत्सव की मौजूदगी भारत के हर भौगोलिक सिरे में अलग-अलग तरीके और नाम से है.
राजस्थान को ही लें तो यहां के मेवाड़ क्षेत्र के मंदिरों में होलिका दहन की तरह का ही एक अग्नि उत्सव होता है, जिसे राल दहन और राल दर्शन कहते हैं. इसमें एक बड़े मैदान में आग जलाई जाती है. उसमें प्राकृतिक गोंद-राल को डालकर जलाया जाता है. लोग इसका दर्शन करते हैं और मानते हैं कि ये बहुत पवित्र है. आइए जानते हैं क्या है राजस्थान में राल दर्शन की परंपरा.
आठ बार तक जलाई जाती है राल, 'होलिका दहन' जैसी परंपरा
राल दर्शन मुख्य रूप से राजस्थान में राजसमंद जिले के कांकरोली स्थित श्री द्वारकाधीश मंदिर (पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय) में फागोत्सव के दौरान होने वाली एक अनूठी परंपरा है. यह पूरे राजस्थान के हर मंदिर में नहीं बल्कि मुख्य रूप से मेवाड़ क्षेत्र के द्वारकाधीश और कुछ विशेष कृष्ण मंदिरों में होली के समय होती है जिसमें आयुर्वेदिक सामग्री जलती है. ये राल जलाना कोई एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि फागुन लगते ही फागुन की पूर्णिमा तक आठ बार तक राल जलाई जाती है.
यह लगभग 1500 वर्ष पुरानी परंपरा है जो होली डंडा रोपण के साथ शुरू होती है और फागुन माह में होती है. इस दौरान जलती हुई मशाल पर पांच आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों का मिश्रण डाला जाता है जिससे निकलने वाला धुआं मौसमी बीमारियों (कफ) को खत्म करने में सहायक माना जाता है. यह प्रमुख रूप से कांकरोली के द्वारकाधीश मंदिर, आमेट के जयसिंह श्याम मंदिर और पुष्टिमार्गी कृष्ण सेवित मंदिरों में इस परंपरा का आयोजन किया जाता है. इसमें राल-गुलाल उड़ाई जाती है जिसे देखने के लिए देशभर से श्रद्धालु आते हैं

कांकरोली (राजसमंद) के द्वारिकेश मंदिर में राल दर्शन
राजस्थान के कांकरोली (राजसमंद) में मौजूद है द्वारिकेश नाथ मंदिर. ये मंदिर श्रीकृष्ण के गिरधारी स्वरूप को राजा की तरह पूजता है और मंदिर प्रांगण में फागुन लगते ही रसिया का आयोजन बड़े पैमाने पर होने लगता है. मंदिर में पूजा व प्रबंधन से जुड़े ओम व्यास बताते हैं कि ये मंदिर, यहां लाल पत्थर से बनी भगवान की भाव प्रतिमा की बड़ी मान्यता है और यहां उन्हें रक्षक मानकर भी पूजा जाता है. यह मंदिर वैष्णव और वल्लभाचार्य संप्रदायों के अंतर्गत आता है. फाग उत्सव के दौरान यहां 'राल दर्शन' सबसे प्राचीन परंपरा है.
क्या है राल दर्शन की परंपरा?
इस दौरान बड़े-बड़े बांसों पर कपड़ा बांधा जाता है. उन कपड़ों को तेल में भिगोया जाता है. फिर एक खुले मैदान के बीच इसमें अग्नि जलाई जाती है, फिर मंदिर के ही गोस्वामी परिवार की ओर से उस अग्नि में राल और सिंघाड़े का आटा डाला जाता है. इसमें अग्नि प्रज्जवलित होती है और उससे जबरदस्त लपटें उठती हैं. इसके दर्शन के लिए बड़ी संख्या में राजस्थान और अन्य इलाकों से लोग पहुंचते हैं. माना जाता है कि ऋतु परिवर्तन के कारण हो रहे बदलाव और पनपने वाली बीमारियों को इसके जरिए रोकथाम की जाती है.
होलिका दहन, राल दर्शन से जुड़े सिंबल
होलिका दहन के साथ एक गहरा सिंबल ये भी जुड़ा है कि एक साल का समय पूरा खत्म हुआ और इसमें जो कुछ भी निगेटिव हुआ उसे जलाकर राख कर देना है और फिर नए साल की ओर या नई शुरुआत की ओर नए विचार के साथ बढ़ना है. ये परंपराएं सदियों से जिंदा ही इसीलिए हैं क्योंकि ये हमारे सर्वाइवल से जुड़ी हैं. मौसम बदलने पर फसली बुखार, बीमारियों से आदिम समाज हमेशा जूझता रहा था. समय के साथ उसे पता चला कि ऋतुओं के बदलने पर पर्यावरण में गुड बैक्टिरिया और बैड बैक्टीरिया के साथ सूक्ष्म जीवों का संतुलन बिगड़ जाता है. यही असंतुलन बीमारी का कारण है.

बीमारी को दूर करने वाली मानी जाती है आग
आग को लेकर प्राचीन विज्ञान ये है कि आग और इसकी ताप बीमारी फैलाने वाले मैक्सिम बैक्टिरिया को खत्म कर देती है. इसलिए हर चार महीने पर मौसम बदलने पर ऐसे त्योहारों की परंपरा है, जिनमें आग का महत्व देखा जाता है. वो भी ऐसी आग जो सामूहिक तौर पर चलती है. गंगा-यमुना के मैदानी और हिमालय के तराई इलाके संक्रमण वाले इलाके रहे हैं, इसलिए आग की मौजूदगी वाले त्योहार यहां इधर अधिक रहे हैं. जैसे दशहरे पर रावण दहन, दिवाली पर दीए जलाना, लोहड़ी पर आग के चारों ओर नाचना और होलिका दहन में आग की परिक्रमा करना उसमें नए अनाज की बाली भूनना.
इसलिए होलिका दहन सिर्फ एक पौराणिक कहानी के आधार पर मानी जाने वाली मान्यता भर नहीं है, ये हमारे जीवन में हो रहे समय के बदलावों का संकेत भी है. यही उत्सवधर्मिता हमें बनाए रखती हैं और जड़ों से जोड़ी रखती है.