
केरल के कोट्टांकुलंगारा श्रीदेवी मंदिर में हर साल मार्च में मनाया जाने वाला चमयविलक्कु त्योहार पुरुषों द्वारा स्त्री वेशभूषा धारण कर 16 शृंगार के साथ पारंपरिक दीप जलाकर भव्य शोभायात्रा निकालने की अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है.

किन्नौर के रौलाने उत्सव में दो पुरुष दूल्हा-दुल्हन की भूमिका निभाते हैं, जो पारंपरिक किन्नौरी वेशभूषा और गहनों से सजे होते हैं. यह त्योहार प्रकृति, खेती और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है, जिसे हजारों वर्षों पुरानी परंपरा माना जाता है.

केरल के तिरुवनंतपुरम जिले में अट्टुकल भगवती मंदिर के पोंगाला महोत्सव के अवसर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है. यह महोत्सव महिलाओं का सबसे बड़ा धार्मिक समागम है, जिसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है.

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले की सांगला घाटी में मनाई जाने वाली होली, जिसे फागली या फागुली भी कहा जाता है, 800 साल पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं और लोकगीतों का अनूठा संगम है.

राजस्थान के कांकरोली में द्वारिकेश मंदिर में फागुन के महीने में राल दर्शन का आयोजन होता है, जिसमें प्राकृतिक राल और सिंघाड़े का आटा जलाकर अग्नि प्रज्ज्वलित की जाती है. यह परंपरा होलिका दहन के साथ जुड़ी है और ऋतु परिवर्तन के कारण होने वाली बीमारियों से बचाव का प्रतीक मानी जाती है.

संत कबीर ने होली को केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आत्मा की जागरूकता और प्रेम का प्रतीक बताया है. उनकी होली बाहरी रंगों से नहीं, बल्कि भीतर के रंगों से जुड़ी है, जो स्थायी है.
मणिकर्णिका घाट को केवल श्मशान स्थल नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु के बीच की गहराई को समझने वाला स्थान माना जाता है. यहां राख से होली खेलने की परंपरा है जो बंधनों को तोड़कर आत्मा की शुद्धि और मुक्ति का प्रतीक है.
फाल्गुन मास को लेकर यह लेख होली के त्योहार की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता को दर्शाता है. यह बताता है कि कैसे फागुन का महीना जीवन के अंत और नए आरंभ का प्रतीक है, जिसमें दुख नहीं बल्कि उल्लास होता है.
होली से पहले के आठ दिन जिन्हें होलाष्टक कहा जाता है, अशुभ माने जाते हैं और इस दौरान कोई शुभकार्य नहीं किया जाता. यह परंपरा दैत्य हिरण्यकश्यप और उनके पुत्र प्रह्लाद की पौराणिक कथा से जुड़ी बताई जाती है.
गुजरात सरकार ने इस बार के बजट में वारली पेंटिंग और आदिवासी देवी कंसारी देवी की छवि को शामिल कर आदिवासी संस्कृति को सम्मानित किया है. वारली पेंटिंग, जो दक्षिण गुजरात और महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्रों की पारंपरिक कला है, को बजट कवर पर प्रदर्शित किया गया है.
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ओल चिकी लिपि को संथाली भाषा और समुदाय की पहचान का एक शक्तिशाली प्रतीक बताया. उन्होंने इस शताब्दी पुरानी लिपि के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया.