सऊदी अरब पर हूतियों का बड़ा हमला, रियाद एयरपोर्ट और अरामको समेत कई ठिकानों को बनाया निशाना

यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के रियाद एयरपोर्ट, यानबू स्थित अरामको फैसिलिटी, राबिख ऑयल रिफाइनरी और कई अन्य एयरबेसों पर हमले का दावा किया है. इन हमलों को लेकर सऊदी अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, जिससे क्षेत्र में तनाव बढ़ने की आशंका है.

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हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की रिफाइनरी समेत कई ठिकानों पर हमले का दावा किया है.. (फोटो प्रतीकात्मक है) हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की रिफाइनरी समेत कई ठिकानों पर हमले का दावा किया है.. (फोटो प्रतीकात्मक है)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 24 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:04 PM IST

 यमन के हूती विद्रोहियों ने एक बार फिर सऊदी अरब पर बड़ा हमला करने का दावा किया है. हूतियों की तरफ से जारी बयान के मुताबिक, विद्रोहियों ने सऊदी अरब के 5 से ज्यादा अति-महत्वपूर्ण रणनीतिक और ऊर्जा ठिकानों को ड्रोन और मिसाइलों से निशाना बनाया है. 

हालांकि, इन हमलों को लेकर सऊदी अरब की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि या बयान सामने नहीं आया है. हूती विद्रोहियों के दावों के अनुसार, जिन प्रमुख ठिकानों पर हमले किए गए हैं उनमें सऊदी अरब की राजधानी का मुख्य अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा रियाद एयरपोर्ट भी शामिल है.

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इसके अलावा हूती विद्रोहियों ने यानबू स्थित सऊदी अरामको फैसिलिटी, राबिख ऑयल रिफाइनरी के अलावा दम्माम स्थित किंग फहद इंटरनेशनल एयरपोर्ट, नजरां के एयरपोर्ट और खमीस मुशैत के एयरबेस पर हमला किया है.

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यानबू लाल सागर के तट पर स्थित एक महत्वपूर्ण औद्योगिक और ऊर्जा केंद्र है. वहीं, राबिग में सऊदी अरामको की रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल गतिविधियां हैं. इन क्षेत्रों में किसी भी बड़े हमले से ऊर्जा आपूर्ति और परिवहन व्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका रहती है. हालांकि, मौजूदा दावों के बाद इन प्रतिष्ठानों को हुए नुकसान का विवरण अभी सामने नहीं आय़ा है.

क्षेत्रीय सुरक्षा पर मंडराया संकट
 हाल के दिनों में हूतियों ने सऊदी अरब के हवाई अड्डों, सैन्य ठिकानों और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने के कई दावे किए हैं. दूसरी ओर, सऊदी नेतृत्व वाला गठबंधन मिसाइलों और ड्रोन को रोकने की कार्रवाई की जानकारी देता रहा है.

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यदि इन हमलों की पुष्टि होती है, तो यह मिडिल ईस्ट में एक बार फिर से बड़े सैन्य संघर्ष और ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीर संकट का संकेत हो सकता है. हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब के आर्थिक और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता प्रभावित होती है. फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस घटनाक्रम पर कड़ी नजर रखी जा रही है.

हूती विद्रोही कौन हैं और सऊदी अरब को क्यों बनाते हैं निशाना?
हूती यमन का एक सशस्त्र राजनीतिक आंदोलन है, जिसे अंसार अल्लाह के नाम से भी जाना जाता है. यह मुख्य रूप से यमन के उत्तरी हिस्से में सक्रिय है और राजधानी सना समेत देश के बड़े भूभाग पर इसका नियंत्रण है. इस आंदोलन की धार्मिक जड़ें जैदी शिया समुदाय से जुड़ी हैं. हालांकि, हूतियों और सऊदी अरब के बीच संघर्ष को केवल शिया-सुन्नी टकराव के रूप में देखना सही नहीं होगा. इसके पीछे सत्ता पर नियंत्रण, क्षेत्रीय प्रभाव और सुरक्षा से जुड़े कई कारण हैं.

हूती विद्रोहियों का आरोप है कि यमन में सऊदी अरब के सैन्य हस्तक्षेप और प्रतिबंधों की वजह से आम लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है. दूसरी ओर, सऊदी अरब हूतियों को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा मानता है. हूतियों की ओर से सऊदी क्षेत्र में मिसाइल और ड्रोन हमलों के दावे भी इसी टकराव का हिस्सा हैं. हवाई अड्डों, सैन्य ठिकानों और तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की ऐसी घोषणाएं सऊदी अरब की सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भी चिंता बढ़ाती हैं.

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ईरान की क्या है भूमिका?
यमन के संघर्ष में ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है. ईरान को हूती विद्रोहियों का प्रमुख क्षेत्रीय समर्थक माना जाता है. उस पर हूतियों को हथियार, सैन्य प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने के आरोप लगते रहे हैं. इस समर्थन ने हूतियों की मिसाइल और ड्रोन क्षमता बढ़ाने में भूमिका निभाई है. हालांकि, हूतियों के अपने राजनीतिक और स्थानीय हित भी हैं, इसलिए उन्हें पूरी तरह ईरान के इशारे पर काम करने वाला संगठन मानना सही नहीं होगा.

दरअसल, ईरान और सऊदी अरब के बीच पश्चिम एशिया में राजनीतिक और सामरिक प्रभाव बढ़ाने को लेकर लंबे समय से प्रतिस्पर्धा रही है. सऊदी अरब हूतियों की बढ़ती सैन्य क्षमता को अपनी सीमाओं, हवाई अड्डों और तेल प्रतिष्ठानों के लिए खतरे के रूप में देखता है. वहीं, ईरान का समर्थन हूतियों की क्षेत्रीय स्थिति मजबूत करने में मदद करता है.

इस तरह यमन का गृहयुद्ध केवल देश के भीतर सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता भी जुड़ गई है. यही वजह है कि यमन में होने वाली सैन्य गतिविधियों का असर सऊदी अरब की सुरक्षा और व्यापक पश्चिम एशिया के हालात पर भी पड़ता है.

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