अगर दुनिया में कोई ऐसा देश है जिसने सबसे ज्यादा अत्याचार किए हैं, तो वह अमेरिका है... 2003 में दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला ने जब यह बयान दिया था तब अमेरिका, इराक पर हमले की तैयारी कर रहा था. ताकत के मद में चूर अमेरिका पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि उसने अपने हितों के आगे दुनिया की कभी परवाह नहीं की. आज जब पश्चिम एशिया एक बार फिर गहरे संकट में है और ईरान को लेकर लगातार तनाव बढ़ रहा है. ऐसे माहौल में मंडेला के वे बयान प्रासंगिक लगते हैं, जिसमें उन्होंने साफ-साफ चेतावनी दी थी कि अमेरिका की एकतरफा सैन्य नीतियां दुनिया को बड़े विनाश की ओर ले जा सकती हैं.
नेल्सन मंडेला दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति या रंगभेद के खिलाफ संघर्ष करने वाले नेता भर नहीं थे. वह अमेरिका की विदेश नीति में दिखाई देने वाले दोहरे मापदंडों के मुखर आलोचक भी थे. उनका मानना था कि अगर कोई महाशक्ति अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को दरकिनार कर अपनी शक्ति के बल पर फैसले लेने लगे, तो उसका खामियाजा पूरी मानवता को भुगतना पड़ता है.
मंडेला ने उस समय कहा था कि अगर अमेरिका की एकतरफा नीतियों और सैन्य हस्तक्षेपों पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो पूरी दुनिया को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है. आज जब ईरान संकट ने पूरे क्षेत्र को अस्थिरता के भंवर में धकेल दिया है और व्यापक युद्ध की आशंका बार-बार जताई जा रही है, तब उनके ये शब्द कई लोगों को चेतावनी जैसे दिखाई देते हैं.
मंडेला का जिक्र इसलिए हो रहा है क्योंकि अगर आज वो जीवित होते तो 108 बरस के हो गए होते. संयुक्त राष्ट्र हर साल 18 जुलाई को नेल्सन मंडेला अंतरराष्ट्रीय दिवस के तौर पर मनाता है. जीवनभर रंगभेद से लड़ते रहे मंडेला ने अपनी जीवन के 27 साल जेल में गुजारे. उनका अमेरिका को लेकर रुख काफी मुखर और दो टूक था. वो अमेरिकी सरकार की विदेश नीति और उनकी साम्राज्यवादी सोच के खिलाफ थे.
2003 में जब अमेरिका, इराक पर हमले की तैयारी कर रहा था. दुनियाभर के देश सहमे हुए थे. उस दौर में नेल्सन मंडेला ने इंटरनेशनल विमेंस फोरम में खड़े होकर जो भाषण दिया था, उसने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा. उन्होंने बिना लाग-लपेट के सख्त लहजे में कहा था कि अगर दुनिया में कोई ऐसा देश है जिसने सबसे ज्यादा अत्याचार किए हैं, तो वह अमेरिका है. उन्हें बाकी दुनिया की कोई परवाह नहीं है.
मंडेला ने कहा कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का सम्मान सिर्फ तब तक करता है, जब तक उसके हित बाधित नहीं होते. जैसे ही कोई नियम उसके हितों के आड़े आता है, वह अराजक हो जाता है. आज, 2026 में भी अमेरिका की विदेश नीति को लेकर वही सवाल बार-बार उठ रहे हैं, जिनकी ओर नेल्सन मंडेला ने दो दशक पहले इशारा किया था. एक्सपर्ट्स का मानना है कि जब-जब अमेरिका के हित दांव पर होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय कानून और वैश्विक समझौते अक्सर उसके लिए महज औपचारिकताएं बनकर रह जाते हैं. मंडेला का मानना था कि अमेरिकी कूटनीति का केंद्र लोकतंत्र, मानवाधिकार या वैश्विक शांति नहीं, बल्कि अपने भूराजनीतिक और सामरिक हितों की रक्षा है.
रंगभेद की बेड़ियों से आजाद होने के बाद जब दक्षिण अफ्रीका ने अपनी विदेश नीति तय करनी शुरू की, तो अमेरिका ने मंडेला पर दबाव बनाया कि वे क्यूबा के फिदेल कास्त्रो और लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी से अपने संबंध तोड़ लें. अमेरिका का तर्क था कि ये देश आतंकवाद के समर्थक और अमेरिका के दुश्मन हैं लेकिन मंडेला कोई कठपुतली नेता नहीं थे. उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के सामने दो टूक कहा कि कोई भी देश यह तय नहीं कर सकता कि हमारा दोस्त कौन होगा. जब हम रंगभेद के खिलाफ अपने जीवन की सबसे अंधेरी लड़ाई लड़ रहे थे, तब क्यूबा और लीबिया हमारे साथ खड़े थे. उन्होंने हमें संसाधन दिए, हथियार दिए और नैतिक समर्थन दिया. उस वक्त अमेरिका कहां था? अमेरिका तो हमारी पार्टी को आतंकवादी संगठन बता रहा था.
मंडेला ने अमेरिका की इस सोच को पूरी तरह बेनकाब कर दिया था कि जो देश अमेरिका के हितों के खिलाफ है, उसे पूरी दुनिया को अपना दुश्मन मान लेना चाहिए. आज भी अमेरिका इसी नीति पर चल रहा है. वह दुनिया के बाकी देशों पर प्रतिबंधों के जरिए दबाव बनाता है कि वे ईरान या उसकी पसंद के विपरीत देशों से व्यापार बंद कर दें, भले ही इससे उन देशों की अपनी अर्थव्यवस्थाएं क्यों न तबाह हो जाएं. मंडेला ने इसी अमेरिकी दादागिरी को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया था.
मंडेला का मानना था कि दुनिया को किसी एक देश की लाठी से नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय नियमों और सामूहिक कूटनीति से चलना चाहिए. उन्होंने अमेरिका की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की थी कि वह संयुक्त राष्ट्र को अपनी जागीर समझता है.
मंडेला ने 2003 के अपने भाषण में अमेरिका की नस्लीय और वर्चस्ववादी मानसिकता पर चोट करते हुए सवाल उठाया था कि क्या अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र का सम्मान इसलिए नहीं कर रहा है क्योंकि उसके महासचिव एक अश्वेत हैं? उस समय संयुक्त राष्ट्र के महासचिव कोफी अन्नान थे. आज का ईरान संकट भी इसी अमेरिकी रवैये को झेल रहा है. जब भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय बातचीत और कूटनीति के जरिए किसी समझौते पर पहुंचता है. अमेरिका अपनी घरेलू राजनीति और साम्राज्यवादी सनक के कारण उस समझौते से पीछे हट जाता है. वह संयुक्त राष्ट्र की अपीलों को दरकिनार कर एकतरफा प्रतिबंध लगाता है और जब मन करे, सैन्य कार्रवाई शुरू कर देता है.
एक मौके पर नेल्सन मंडेला ने अमेरिकी परमाणु इतिहास का जिक्र करते हुए कहा था कि अमेरिका दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जिसने इंसानों पर परमाणु बम गिराए लेकिन आज वही देश पूरी दुनिया को परमाणु हथियारों के नाम पर डराता है और खुद को दुनिया का ठेकेदार समझता है.
मंडेला ने अमेरिका के इसी पाखंड और दोहरे चरित्र को उजागर करने के लिए उसके सबसे बड़े सहयोगी इजरायल का उदाहरण दिया था. उन्होंने अमेरिका को सीधा कटघरे में खड़ा करते हुए सवाल उठाया था कि अमेरिका आखिर इतना दोहरा रवैया क्यों दिखाता है? उसके चहेते दोस्त इजरायल के पास भी सामूहिक विनाश के हथियार मौजूद हैं, लेकिन वह अमेरिका का वफादार साथी है, इसलिए अमेरिकी हुकूमत कभी संयुक्त राष्ट्र से उसके हथियार नष्ट करने के लिए नहीं कहेगी. मंडेला ने साफ कर दिया था कि हथियारों का यह खौफ सिर्फ एक मुखौटा है, अमेरिका का असली निशाना तो इराक के तेल कुओं पर कब्जा करना था.
आज जब हम ईरान युद्ध के दुष्परिणामों को भुगत रहे हैं, तो मंडेला की इस बात की गहराई समझ में आती है. अमेरिका को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि होर्मुज के बाधित होने से एशिया और अफ्रीका के गरीब देशों में भुखमरी की नौबत आ जाएगी. उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि वैश्विक बाजारों में मची उथल-पुथल से करोड़ों लोगों की नौकरियां चली जाएंगी. उनके लिए यह सिर्फ एक सैन्य ऑपरेशन है, अपनी ताकत की एक और नुमाइश है. अमेरिकी नेतृत्व का यह कहना कि हम ईरान को पाषाण काल में भेज देंगे, उसी साम्राज्यवादी अहंकार की पराकाष्ठा है जिसके खिलाफ मंडेला जीवनभर लड़ते रहे. यह भाषा किसी लोकतांत्रिक देश की नहीं, बल्कि एक तानाशाह की सनक की है और इस दुनिया को किसी सुपरपावर की सनक के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता.
रितु तोमर