भारत ही नहीं, कई देशों में बन चुकी हैं The Kerala Story जैसी फिल्में, जानिए, क्या हुआ उनका हाल

द केरल स्टोरी लगातार धूप-छांव झेल रही है. कई राज्य इसे बैन कर चुके, तो कुछ ने टैक्स-फ्री कर दिया. डायरेक्टर सुदीप्तो सेन की मूवी उन औरतों की कहानी है जिन्हें धर्मांतरण के बाद सीरिया ले जाकर इस्लामिक स्टेट (ISIS) का हिस्सा बना दिया गया. इसकी स्टोरी लाइन ही बवाल की असल वजह है. वहीं दुनिया के कई हिस्सों में इसी मसले पर फिल्में बनकर रिलीज भी हो चुकी और कोई हाय-तौबा नहीं मचा.

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द केरला स्टोरी फिल्म पर राज्य अलग-अलग रिएक्शन दे रहे हैं. द केरला स्टोरी फिल्म पर राज्य अलग-अलग रिएक्शन दे रहे हैं.

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 10 मई 2023,
  • अपडेटेड 7:42 PM IST

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में द केरल स्टोरी पर बैन लग चुका. राज्य सरकारों ने कथित तौर पर शांति बनाए रखने के लिए फिल्म पर रोक लगाई. हो सकता है कि आने वाले दिनों में कई और राज्य भी इसपर रोक लगा दें. बैन के पीछे दलील दी जा रही है कि इसमें दिखाई गई बातें एक धर्म विशेष की इमेज खराब कर सकती हैं. वहीं फिल्म के डायरेक्टर सुदीप्तो सेन का कहना है कि मूवी में मजहब नहीं, बल्कि चरमपंथी सोच के खिलाफ बातें दिखाई गई हैं. ये तो हुई द केरल स्टोरी की बात, लेकिन कई देश इसी मुद्दे पर फिल्में और डॉक्युमेंट्री बनाकर दिखा भी चुके हैं. 

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क्यों और कैसे पश्चिम की लड़कियों को टारगेट करता था ISIS

असल में ISIS सिर्फ हथियारों के दम पर सबसे क्रूर आतंकी गुट नहीं बना, बल्कि इसके पीछे उसकी खास रणनीति थी. वो अपने पुरुष जेहादियों के लिए महिलाएं भी जुटाया करता था. ये सीरिया या इराक की औरतें तो होती ही थीं, साथ में वो खासतौर पर कम उम्र की पश्चिमी लड़कियों को टारगेट करता. 

इसके पीछे सोच ये थी कि कम उम्र लड़कियां ज्यादा से ज्यादा संतानें पैदा कर सकेंगी. ये संतानें जन्म से ही जेहादी सोच लिए होंगी और ट्रेनिंग में खास मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी. पश्चिम से इंपोर्ट हुई ये औरतें या तो किसी मिलिटेंट की पत्नी बना दी जातीं, या फिर वो यौन गुलाम की तरह जिंदगी जीती रहतीं.

 सांकेतिक फोटो (Unsplash)

कई संस्थाओं ने दिए आंकड़े

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साल 2019 में लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स की एक रिपोर्ट- फीमेल रेडिकलाइजेशन: व्हाई डू वीमन जॉइन आईएसआईएस में बताया गया कि सालभर पहले अमेरिकी, ब्रिटिश और यूरोपियन देशों के लगभग 41,500 लोगों ने आतंकी संगठन को जॉइन किया. इसमें पौने 5 हजार औरतें और लगभग इतने ही माइनर थे. इसमें यह भी माना गया कि असल संख्या इससे बहुत ज्यादा भी हो सकती है. 

इन महिलाओं को अक्सर पुरुष मिलिटेंट ही ट्रैप किया करते और सीरिया या इराक लाकर छोड़ देते थे. लगातार अमेरिका, फिनलैंड, स्वीडन, कनाडा और ब्रिटेन से लड़कियां आतंकियों के साथ भागने लगीं. ये मुद्दा संसद के अलावा फिल्म इंडस्ट्री की नजर से भी बचा नहीं रहा. एक के बाद एक कई फिल्में बनाई गईं. 

स्वीडिश फिल्म में सीरिया के सबसे डरावने कैंप की कहानी

साल 2021 में आई स्वीडिश डॉक्युमेंट्री फिल्म सबाया में इस्लामिक स्टेट के सबसे क्रूर चेहरे को दिखाया गया. इसके डायरेक्टर होगिर हिरोरी थे. फिल्म सीरिया के एक कैंप अल-हॉक के इर्द-गिर्द घूमती है. ISIS के दौर में इस कैंप में गुलाम बनाई जा चुकी औरतें रखी जाती थीं. ये सेक्स स्लेव होतीं, जो उत्तरी इराक से उठाई गई थीं. पतियों-पिताओं को मारने के बाद इस्लामिक स्टेट ने हजारों औरतों से रेप किया और उन्हें कैंप में कैद कर दिया. इन्हीं गुलामों को बचाने के लिए एक ग्रुप ने रेस्क्यू कैंपेन चलाया. सबाया में इन सबका जिक्र था, लेकिन सबसे ज्यादा जोर धर्मांतरण और जबरन आतंक का हिस्सा बनाए जाने पर था. 

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स्वीडन की डॉक्युमेंट्री सबाया का एक दृश्य. 

इस्लामिक कट्टरता पर बनी फिल्म

नब्बे के दशक में आई फिल्म 'नॉट विदाउड माई डॉटर' को इस कड़ी की सबसे पुरानी फिल्म माना जा सकता है, हालांकि ये इस्लामिक स्टेट की बजाए इस्लामिक चरमपंथ पर फोकस करती है. इसमें एक अमेरिकी महिला और उसकी बेटी की कहानी है, जो ईरान में ट्रैप्ड हो जाती हैं. ईरान मूल का पति अमेरिका से झूठे वादे करके पत्नी-बेटी को साथ ले जाता है, जहां से उन्हें वापस नहीं लौटने दिया जाता. यहां तक कि नौ साल का होने पर बेटी की जबरन शादी की बात तक होने लगती है. ऐसे में मां किस तरह की धार्मिक कट्टरता झेलते हुए अपनी बच्ची को बचा पाती है, इसमें यही दिखाया गया है. सच्ची घटना पर आधारित मूवी को काफी सराहा गया था. 

लव-ट्रैप से ISIS तक का रास्ता

फ्रांसीसी फिल्म 'हैवन विल वेट' लव जेहाद और धर्मांतरण के मुद्दे पर बनी थी. इसमें दिखाया गया कि कैसे टीन एज लड़कियों को बाकायदा योजना बनाकर फंसाया जाता, और फिर इस्लामिक स्टेट में शामिल कर लिया जाता है. इसमें प्यार और स्वर्ग की गारंटी जैसे टर्म्स भी सुनाई पड़ते हैं. मूवी का ओरिजिनल नाम नाम ली सिएल अतेंद्रा था.

इस वेब सीरीज में दिखाया गया एक्सट्रीम पक्ष

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नेटफ्लिक्स पर लगभग दो साल पहले खलीफा वेब सीरीज आई थी. इसमें ब्रिटेन में रहती तीन लड़कियों की सच्ची कहानी है, जो मिलिटेंट्स के प्यार में आकर इस्लामिक स्टेट का हिस्सा बनने को तैयार हो जाती हैं. बाद में आतंक का चेहरा देखने के बाद वे वहां से भागने की कोशिश करती हैं. फिल्म में ये तक दिखाया गया है कि किस तरह लड़कियों को सुसाइड बॉम्बिंग के लिए इस्तेमाल होता है.

वेब सीरीज खलीफा में ब्रेनवॉश को खुलकर दिखाया गया. 

इस मूवी पर हुआ था हंगामा

'रसीबा: द डार्क विंड' एक इराकी फिल्म थी, जिसे कुर्दिश डायरेक्टर हुसैन हसन ने निर्देशित किया. इसमें यजीदी मूल की महिला की सच्ची कहानी है, जिसे इराक में गुलाम बनाकर इस्लामिक स्टेट के मिलिटेंट्स के हवाले कर दिया गया. कई सारे अवॉर्ड्स पाने वाली इस फिल्म के बारे में कह सकते हैं कि इसपर थोड़ा हंगामा मचा था, लेकिन धर्म या धर्म विशेष की भावनाओं को चोट पहुंचाने को लेकर नहीं. दर्शक परेशान हो गए थे कि इस्लामिक स्टेट उनकी औरतों को कितनी तकलीफ दे रहे हैं. गुस्साई ऑडियंस ने इसी बात पर हंगामा किया था, लेकिन फिल्म पर बैन नहीं लगा.यहां हम दोहरा दें कि इनमें से किसी भी फिल्म पर बैन नहीं लगा, जबकि हमारे यहां राज्य या तो पाबंदी लगा चुके, या उसकी मांग कर रहे हैं. 

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हमारे यहां कब लगता है बैन?

1952 के सिनेमैटोग्राफ अधिनियम के तहत केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ये काम करता है. उसके पास ताकत होती है कि वो किसी फिल्म में काटछांट करके कई सीन्स, डायलॉग्स हटा सके. यहां तक सेंसर अगर चाहे तो किसी फिल्म को रोक भी सकता है लेकिन इसके लिए कई पैमाने हैं. जैसे अगर कोई मूवी देश की एकता और शांति के लिए खतरा है तो बोर्ड उसे बेहिचक बैन कर सकता है. इसी तरह फिल्म में कुछ ऐसा हो, जो लोगों में क्राइम के लिए दिलचस्पी बढ़ाए या क्राइम के लिए उकसाए तो भी सेंसर किया जा सकता है. राज्य सरकार खुद भी ये फैसला ले सकती है. 

फ्रेंच फिल्म 'हैवन विल वेट' का एक दृश्य. 

विदेशों में कैसे काम करता है सेंसर बोर्ड? 

सेंसर बोर्ड अमेरिका में भी काम करता है और यूके में भी. अमेरिका में मोशन पिक्चर एसोसिएशन (MPA) फिल्मों को रेट और क्लासिफाई करता है. वहीं, यूके में ब्रिटिश बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (BBFC) काम संभालता है. दोनों जगहों पर कुछ हेरफेर के साथ नियम वही हैं. 

- फिल्म अगर सांस्कृतिक, साहित्यिक या किसी भी ढंग से अश्लील है तो उसपर बैन लगाया जा सकता है. पोर्न फिल्में अलग श्रेणी में आती हैं, जिसक अलग दर्शक होते हैं. 

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- अगर फिल्म में फैक्ट से छेड़छाड़ हो, जैसे इतिहास में कोई बदलाव दिखे, या किसी महान हस्ती की जिंदगी के बारे में गलत दिखाया जाए तब भी बैन लग सकता है. 

- देश की सुरक्षा पर खतरा हो सकती फिल्म को कोई भी देश किसी हाल में रिलीज नहीं होने देता. जैसे अगर किसी फिल्म से सेंसिटिव मिलिट्री जानकारी लीक होती दिखे, या क्लासिफाइड जानकारी पब्लिक डोमेन में आ जाए तो भी बैन तय है.

- मूवी अगर कॉपीराइट के नियमों को तोड़ती दिख रही हो तो भी सेंसर उसे रोक देता है. इसमें कुछ सीन भी हो सकते हैं, या फिर डायलॉग भी. इनमें बदलाव के बाद फिल्म रिलीज हो सकती है. 

- यूनाइटेड किंगडम में उन फिल्मों पर भी पाबंदी लग सकती है, जो किसी भी तरह से आतंकवाद या आतंकियों को सही बताए. जैसे कहा जाए कि किसी खास हालात का शिकार होकर फलां ने आतंकी चोला पहन लिया, तो ये दलील यूके में नहीं चलेगी.

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