इराक में 23 साल से चली आ रही अमेरिकी सैन्य मौजूदगी का अंत होने जा रहा है. 30 सितंबर तक उत्तरी कुर्दिस्तान क्षेत्र में बचे सैकड़ों अमेरिकी सैनिक पूरी तरह देश छोड़ देंगे. लेकिन ईरान समर्थित बागी मिलिशिया ने साफ चेतावनी दी है कि उनके बंदूक बोलते रहेंगे और तोपें गरजती रहेंगी.
2003 में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए अमेरिका ने इराक पर आक्रमण किया था. उसके बाद से देश में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी बनी रही. 2011 में अमेरिकी सैनिक वापस चले गए. लेकिन 2014 में इस्लामिक स्टेट (ISIS) जब इराक में कहर मचाने लगा तो इराकी सरकार को मजबूरन अमेरिकी सैनिकों को वापस बुलाना पड़ा.
लेकिन अब जबकि ISIS सिर्फ बिखरे स्लीपर सेल्स तक सीमित रह गया है. उसकी ताकत खत्म हो गई है, तो अमेरिका इराक से अपना बोरिया बिस्तर समेट रहा है और हथियार उठाकर लौट रहा है.
इराक से एयर डिफेंस हटा अमेरिका
पिछले साल अधिकांश ठिकानों से सैनिक निकल चुके थे. अब सिर्फ उत्तरी कुर्दिस्तान में बचे सैनिक 30 सितंबर तक निकल जाएंगे. उन्हें ज्यादातर जॉर्डन और क्षेत्र के अन्य देशों में भेजा जाएगा. इराक में लगे एयर डिफेंस सिस्टम भी हटाए जा रहे हैं.
इराकी सरकार ने अमेरिकी वापसी को बागियों के निरस्त्रीकरण से जोड़ रखा है. प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की सरकार का कहना है कि विदेशी सैनिकों के जाने के बाद किसी भी गैर-सरकारी समूह के पास हथियार रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा. लेकिन सबसे शक्तिशाली ईरान समर्थित हथियारबंद समूहों ने इससे इनकार कर दिया है.
हथियार सरेंडर करने का फैसला नहीं
कतैब हिजबुल्लाह, हरकत अल-नुजाबा और कतैब सय्यिद अल-शुहदा जैसे संगठन हथियार छोड़ने को तैयार नहीं है. एक मिलिशिया अधिकारी ने कहा, “हथियार सरेंडर करने का कोई फैसला नहीं है. हमने कोई हथियार नहीं सौंपा है. चर्चा हथियार नियंत्रित करने की होगी, समर्पण की नहीं.”
28 फरवरी को US और इज़राइल के ईरान पर हमला करने के बाद से ईरान के सपोर्ट वाले इराकी मिलिशिया ने इराक के अंदर और बाहर US से जुड़े टारगेट पर हमला किया है. उन्होंने सऊदी अरब पर हमला करने के लिए यमन के हूथी विद्रोहियों के साथ भी कोऑर्डिनेट किया है.
US और ईरान के बीच जंग तेज़ होने के साथ ही ऐसी कम ही उम्मीद है कि ईरान अपने पड़ोस इराक में अपनी ताकत कम होने देगा. इससे अमेरिकी अधिकारी परेशान हैं.
अमेरिकी सेना को इस बात की चिंता है कि इराकी मिलिशिया सऊदी अरब, जॉर्डन और इज़राइल समेत इलाके में दूसरी जगहों पर हमले कर सकती है, और साथ ही इराक में हूथी विद्रोही ताकतों की मौजूदगी को लेकर भी उन्हें फिक्र है.
इससे पहले हमलों के जवाब में अमेरिका ने कभी-कभी इराक में मिलिशिया के ठिकानों पर हमले किए हैं. वॉशिंगटन ने कुछ समूहों पर प्रतिबंध लगाए हैं और आगे और भी प्रतिबंध लगा सकता है.
30 सितंबर के बाद क्या होगा?
इराकी सरकार के अधिकारी इस बात पर साफ़ तौर पर कुछ नहीं कह पा रहे हैं कि क्या 30 सितंबर मिलिशिया (सशस्त्र समूहों) के हथियार छोड़ने की आखिरी तारीख है या सिर्फ़ बातचीत शुरू करने का समय।
इराकी विश्लेषक सज्जाद जियाद ने पिछले हफ़्ते अटलांटिक सेंटर थिंक टैंक के एक पैनल में कहा, "30 सितंबर तक किसी भी समूह से हथियार नहीं छुड़वाए जाएंगे." "मुझे लगता है कि जो कोई भी इराकी राजनीति पर नज़र रखता है, उसके लिए यह बात साफ़ है."
हालांकि कुछ कम असरदार मिलिशिया अपने हथियार सौंपने को तैयार हो गए हैं, लेकिन सबसे ताकतवर समूह जो ईरान के सबसे करीब हैं जैसे कि कताइब हिज़्बुल्लाह, हरकत अल-नुजाबा और कताइब सैयद अल-शुहादा ने हथियार छोड़ने की संभावना को खारिज कर दिया है या ऐसी शर्तें रखी हैं जिन्हें सरकार के लिए निकट भविष्य में पूरा करना मुश्किल है.
इन शर्तों में उत्तरी इराक में कुर्दिश पेशमर्गा सुरक्षा बलों को केंद्रीय सरकार की सेना के नियंत्रण में लाना और उस इलाके में मौजूद ईरानी कुर्दिश विद्रोही समूहों और कुर्दिस्तान वर्कर्स पार्टी (PKK) को बाहर निकालना शामिल है.
ईरान समर्थित इराकी मिलिशिया में से एक के अधिकारी ने कहा, "इन शर्तों को तय करने के बाद, बातचीत हथियारों को सौंपने के बजाय उन्हें नियंत्रित करने पर केंद्रित होगी." "गुटों के बीच हथियार सौंपने का कोई फ़ैसला नहीं हुआ है, और हमने कोई हथियार नहीं सौंपा है."
सरकार के एक अधिकारी ने कहा कि सरकार की रणनीति अभी सशस्त्र गुटों को इराकी सेना के नियंत्रण में लाने पर केंद्रित है. कई मिलिशिया पहले से ही 'पॉपुलर मोबिलाइज़ेशन फोर्सेज़' (PMF) का हिस्सा हैं, जो सशस्त्र समूहों का एक गठबंधन है और आधिकारिक तौर पर इराकी सशस्त्र बलों का हिस्सा है, हालांकि अलग-अलग मिलिशिया अक्सर अपनी मर्ज़ी से काम करते हैं.
अधिकारी ने कहा कि सरकार चाहती है कि सशस्त्र गुट मिसाइल और लंबी दूरी के विमान जैसे "अहम हथियार" PMF के केंद्रीय नेतृत्व को सौंप दें और अलग-अलग गुटों को भंग करके PMF और इराकी सेना की कमान के तहत लाया जाए.
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