ईरान के घातक हमलों से US के 13 बेस बर्बाद! तेहरान का दावा- सैनिक होटलों में जाकर छिपे

मुख्य सैन्य ठिकानों के तबाह होने और असुरक्षित होने की वजह से, हजारों अमेरिकी सैनिक अब पूरे इलाके में बिखर गए हैं. इनमें से कुछ को तो इतनी दूर भेज दिया गया है कि वे अब यूरोप में ठिकाना बनाए हुए हैं, वहीं जो सैनिक अभी भी मिडिल ईस्ट में मौजूद हैं, उन्हें मजबूरन अपने पुराने बेस छोड़कर दूसरी जगहों से काम करना पड़ रहा है.

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अबू धाबी के अल धाफरा एयर बेस से उड़ान भरता एक F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान (File Photo: Reuters) अबू धाबी के अल धाफरा एयर बेस से उड़ान भरता एक F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान (File Photo: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 26 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 11:11 PM IST

मिडिल ईस्ट में चल रही ईरान और अमेरिका की इस जंग ने अब एक ऐसा मोड़ ले लिया है, जिसकी कल्पना शायद खुद पेंटागन ने भी नहीं की होगी. एक हालिया रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. खबर है कि ईरान ने अपनी मिसाइलों और ड्रोन्स से मिडिल ईस्ट में मौजूद कम से कम 13 अमेरिकी सैन्य ठिकानों का वो हाल किया है कि वहां अब रहना मुश्किल है. दुनिया की सबसे ताकतवर मानी जाने वाली फौज को अपने उन अभेद्य किलों को छोड़ना पड़ा है, जिन्हें बनाने में दशकों लग गए थे. अब हालात ये हैं कि अमेरिकी सैनिकों को मजबूरी में शहरों के बीच बने होटलों और आम दफ्तरों में पनाह लेनी पड़ रही है.

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द न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, इस पूरे घटनाक्रम ने युद्ध के मैदान की तस्वीर ही बदल दी है. अधिकारी अब इस लड़ाई को एक रिमोट वॉर यानी दूर बैठकर लड़ी जाने वाली जंग कह रहे हैं. असल में हुआ ये है कि ईरान के सटीक हमलों की वजह से अमेरिका के जो मुख्य बेस थे, वे अब या तो पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुके हैं या फिर इतने असुरक्षित हो गए हैं कि वहां रुकना मौत को दावत देने जैसा है. हजारों अमेरिकी सैनिकों को वहां से जल्दबाजी में हटाया गया है. कुछ को तो सुरक्षित रखने के लिए सीधे यूरोप भेज दिया गया, लेकिन जो अभी भी मिडिल ईस्ट के मोर्चे पर डटे हैं, वे अपने असली बेस से नहीं बल्कि आम नागरिक इलाकों के होटलों से अपना काम चला रहे हैं.

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कुवैत से कतर तक हुआ नुकसान?

इसे आप एक तरह का 'मिलिट्री वर्क फ्रॉम होम' भी कह सकते हैं. कल्पना कीजिए कि एक तरफ जंग छिड़ी है और दूसरी तरफ जमीन पर लड़ने वाली फौज टुकड़ों में बिखर कर अलग-अलग जगहों से रिमोटली काम करने को मजबूर है. कुवैत, कतर और बहरीन जैसे देशों में अमेरिका के जो बड़े ठिकाने थे, वे अब सुनसान पड़े हैं. कुवैत के पोर्ट शुआइबा और अली अल सलेम एयर बेस पर तो इतना भीषण हमला हुआ कि वहां सेना का एक बड़ा रणनीतिक सेंटर ही खत्म हो गया. इस हमले में 6 अमेरिकी सैनिकों की जान भी गई है. कतर के अल उदीद एयर बेस का जो रडार सिस्टम पूरे इलाके पर नजर रखता था, उसे भी ईरान ने काफी नुकसान पहुंचाया है.

क्या अब अमेरिका की सैन्य ताकत को लग गई है बड़ी चोट?

अब सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि क्या एक आम होटल या ऑफिस से वो मारक क्षमता हासिल की जा सकती है, जो एक हाई-टेक सैन्य बेस से होती है? जानकारों का कहना है कि आप रातों-रात किसी भी इमारत में कंट्रोल रूम तो खड़ा कर सकते हैं, लेकिन वहां वो सुरक्षा और तकनीक नहीं मिल सकती जो एक असली बेस में होती है. रिटायर्ड एयरफोर्स विशेषज्ञों का मानना है कि आप होटल की छत पर वो सीक्रेट और भारी-भरकम उपकरण नहीं फिट कर सकते, जो दुश्मन की मिसाइलों को ट्रैक कर सकें. हालांकि, अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ का दावा कुछ और ही है. उनका कहना है कि इन दिक्कतों के बावजूद उनके हमले और तेज हुए हैं और अमेरिका अब तक ईरान के 7,000 से ज्यादा ठिकानों को धूल चटा चुका है.

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जंग की संवेदनशीलता इतनी बढ़ गई है कि अब सैटेलाइट तस्वीरों पर भी पहरा लगा दिया गया है. 'प्लैनेट लैब्स' जैसी बड़ी कंपनियों ने ईरान और उसके आसपास के इलाकों की ताजा तस्वीरें दिखाने पर पाबंदी लगा दी है. उन्हें डर है कि उनकी तस्वीरों का इस्तेमाल करके ईरान के लड़ाके अमेरिकी सैनिकों की नई लोकेशन, यानी उन होटलों और दफ्तरों को ट्रैक कर सकते हैं जहां वे अभी ठहरे हुए हैं. इसी बीच ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने भी एक शातिर चाल चली है. उन्होंने वहां के आम लोगों से अपील की है कि वे अमेरिकी सैनिकों की नई छिपने वाली जगहों की जानकारी उन्हें दें. ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि जो भी अमेरिकी फौज को अपने यहाँ जगह देगा, उसे अंजाम भुगतना पड़ेगा.

वहीं, ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अरागची ने भी बड़ा हमला बोला है. उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिकी सैनिक जंग शुरू होते ही अपने बेस छोड़कर होटलों और दफ्तरों में जा छिपे हैं. अरागची ने कहा, 'अमेरिका वहां के आम नागरिकों को ह्यूमन शील्ड (मानव ढाल) की तरह इस्तेमाल कर रहा है.' उन्होंने खाड़ी देशों के होटलों से अपील की है कि वे अमेरिकी फौजियों को कमरे न दें, क्योंकि इससे वहां ठहरे आम लोगों की जान को खतरा हो सकता है.
 

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इस पूरी स्थिति ने अब वॉशिंगटन और ट्रंप प्रशासन की रणनीतियों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या अमेरिका ने ईरान के इस पलटवार को हल्के में ले लिया था? रिपोर्ट कहती है कि जंग भड़कने से पहले न तो वहां से राजनयिकों को हटाया गया और न ही आम अमेरिकियों को इलाके में जाने से मना किया गया. आज वही ठिकाने, जो कभी अमेरिका की ताकत हुआ करते थे, ईरान की मिसाइल रेंज में होने के कारण सबसे बड़ी कमजोरी साबित हो रहे हैं. भले ही पेंटागन कह रहा हो कि वे पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन हकीकत यही है कि अपनी जमी-जमाई जगह छोड़कर होटलों से जंग लड़ना किसी भी सेना के लिए एक बड़ा मानसिक और रणनीतिक झटका है. अब देखना ये है कि अमेरिका इस रिमोट वॉर के जरिए कैसे पलटवार करता है.

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