कत्लेआम का शौकीन वो तानाशाह, जिसकी वजह से अमीर हिंदुस्तानियों को रातोरात एक सूटकेस लेकर भागना पड़ा

अफ्रीकी देश युगांडा में 60 के दशक में भारतीय कारोबारियों का रुतबा था. देश की इकनॉमी उनके भरोसे चलती थी. यही बात वहां के तानाशाह ईदी अमीन को पसंद नहीं आई. उसने न सिर्फ हिंदुस्तानियों को बाहर भेजा, बल्कि अपने ही लोगों को मरवाने लगा. अमीन का राज छिनने के बाद देश में जहां-तहां सामूहिक कब्रें मिलीं, जिसमें किसी के सिर तो किसी के हाथ-पैर गायब थे.

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70 के दशक में युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन की बर्बरता की आज भी बातें होती हैं. (Getty Images) 70 के दशक में युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन की बर्बरता की आज भी बातें होती हैं. (Getty Images)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 फरवरी 2023,
  • अपडेटेड 1:00 PM IST

युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने अपनी तानाशाही के दौरान भारतीय मूल के करीब 80 हजार लोगों को देश से बाहर चले जाने का फरमान सुना दिया. हर परिवार को, चाहे वो जितना ही बड़ा हो, सिर्फ दो सूटकेस और 50 पाउंड ले जाने की इजाजत थी. ये वो परिवार थे, जिनके पास अरबों-खरबों की दौलत थी, लेकिन आनन-फानन उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा. आज ही का दिन था, जब ईदी अमीन ने खुद को युगांडा का भगवान घोषित किया और उसके बाद से दमन का जो दौर चला, उसके ढेर सारे राज काफी बाद में खुले. 

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किताब में उस दौर का हिसाब-किताब
उनके समय में देश के हेल्थ मिनिस्टर रह चुके नेता हेनरी क्येम्बा ने एक किताब लिखी. 'स्टेट ऑफ ब्लड- द इनसाइड स्टोरी ऑफ ईदी अमीन' में बताया गया है कि अमीन की हुकूमत जाने के बाद देश में कई जगहों पर सामूहिक कब्रें मिलीं. जिनके बारे में माना जाता था कि ये अमीन की ही करतूत है. ज्यादातर के ऑर्गन्स गायब थे. ऐसा क्यों था, ये किसी को नहीं पता, लेकिन शक की सुई अमीन की तरफ घूमी कि उसने ही फौज को इस बर्बरता का आदेश दिया होगा. 

युगांडा में हिंदुस्तानी मूल के लोग कैसे पहुंचे
19वीं सदी के आखिर में अफ्रीका के इस हिस्से पर ब्रिटेन का राज हो चुका था. अब नस्लवादी अंग्रेजी हुकूमत सीधे-सीधे अफ्रीकी लोगों से घुलना-मिलना चाहती नहीं थी, तो उसने एशियाई मूल के लोगों को वहां लाकर बसाना शुरू कर दिया. इनमें भारतीय भी थे, जिनका काम था अंग्रेजों और अफ्रीकी लोगों के बीच कड़ी का काम करना. इसके बदले में अंग्रेज उन्हें कारोबार करने की इजाजत देते थे. लेकिन इसी में वे बुरे फंसने लगे. युगांडा के लोग हिंदुस्तानी लोगों से भी शासक की तरह नफरत करते. वे मानते थे कि हमारे यहां आकर ये लोग हमारी जमीनों और बिजनेस पर कब्जा कर रहे हैं. 

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भारतीयों को कहा जाता था ब्राउन मास्टर
साठ के दशक में युगांडा ब्रिटेन से आजाद हो गया लेकिन यहीं से हिंदुस्तानियों की मुश्किलें बढ़ने लगीं. दोनों समुदायों के बीच कड़वाहट काफी बढ़ चुकी थी. न भारतीय मूल के लोग अफ्रीकी लोगों से घुल-मिल सके, न ही मूल अफ्रीकी लोगों को भारतीय पसंद थे. भारतीयों को वहां व्यंग्य और डर से ब्राउन मास्टर कहा जाता. बिजनेस में भी भारतीयों का रुतबा लगातार बढ़ रहा था, जिससे युगांडा में गुस्सा और बढ़ा. उन्हें लगता था कि आजादी के बाद भी वे गुलाम के गुलाम ही रहे. यहीं पर पिक्चर में ईदी अमीन आए.

ब्रिटेन से आजादी के बाद युगांडा काफी सारी राजनैतिक-आर्थिक अस्थिरता से गुजरता रहा. सांकेतिक फोटो (Getty Images)

अमीन ने कर दिया तख्तापलट
युगांडा के एक इस्लामिक कबीले से जुड़े अमीन सेना में रसोइये का काम करते. अपने भारी-भरकम शरीर और तानाशाही अंदाज के चलते जल्द ही प्रमोशन पाते हुए वे सेनाध्यक्ष बन गए. तब राष्ट्रपति मिल्टन ओबोटे का कार्यकाल था. सरकार करप्शन के आरोपों से घिरी हुई थी. इधर सेना में भारी लोकप्रिय हो चुके अमीन ने मौके का फायदा उठाया और तख्तापलट कर दिया. सेना के कुक से वे युगांडा के राष्ट्रपति बन चुके थे. 

भारतीयों को मिला अल्टीमेटम
अपने लोगों की भावनाएं समझते हुए अमीन ने रातोरात एशियाई मूल, खासकर हिंदुस्तानियों को देशनिकाला दे दिया. कॉलेज में पढ़ने वाले भारतीयों को डराने के लिए सेना के टैंक भेजे जाने लगे. वहां भारी बूट पहने अफ्रीकी सैनिक लोगों को डराते और अपने देश लौटने के लिए धमकाते. बिजनेस डूबने लगे. अगस्त 1972 में अमीन ने भारतीयों को देश खाली करने के लिए 3 महीने का नोटिस दे दिया. साथ में ये आदेश भी कि वे सिर्फ 2 सूटकेट और 50 पाउंड साथ ले जा सकते हैं. लोग दशकों की अपनी मेहनत को यूं ही छोड़कर भागने लगे. बहुत से लोगों ने कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में शरण ली. इसके बाद भारतीय व्यावसायियों से खाली हुए देश की इकनॉमी एकदम से चरमरा गई. 

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पहली बार बिना तैयारी के कारोबार संभालते मूल निवासियों को समझ नहीं आया कि उसे चलाना कैसे है. उन्हें ये भी नहीं पता था कि किसी चीज को कितने में खरीदा या बेचा जाना चाहिए. तो जल्द ही सारी व्यवस्था ध्वस्त होने लगी. तब युगांडा के मूल निवासियों ने एक और तरीका निकाला. वे कबीलाई प्रथा के मुताबिक पार्टियां देने लगे, जिसमें सबको ये भी न्यौता रहता कि वे अपनी पसंद की चीज मुफ्त में ले जा सकते हैं. 

यहीं से अमीन के खिलाफ लोगों में गुस्सा भी भड़कने लगा
पैसे थे, लेकिन किसी को उसका इस्तेमाल नहीं पता था. महंगाई बढ़ने लगी. लोग भूखों मरने लगे. लोगों के गुस्से को कुचलने के लिए इस तानाशाह ने नया रूप लिया. वो अपने ही लोगों की हत्याएं करवाने लगा. स्टेट ऑफ ब्लड में जिक्र है कि कैसे अमीन ने 5 लाख से भी ज्यादा देशवासियों को मरवा दिया ताकि जनता चुप रहना सीख सके. 

अमीन पर ढेरों किस्से, जिनका जिक्र अलग-अलग किताबों में
उनके कार्यकाल के दौरान युगांडा में भारतीय राजदूत मदनजीत सिंह ने अपनी किताब 'ईदी अमीन मॉनस्टर रेजीम' में इस अफवाह को हवा दी कि शायद ये तानाशाह शवों का खून पीने की आदत रखता था. किताब में बताया गया है कि कैसे अमीन के घर का एक कमरा हमेशा बंद रहता था. सिर्फ अमीन उसमें जाते. एक बार किसी तरह अमीन की पांचवीं पत्नी सारा क्योलाबा को भीतर गई तो उसे अपने पूर्व प्रेमी का कटा हुआ सिर वहां मिला.

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निजी मामलों में अमीन को काफी क्रूर और राग-रंग का शौकीन बताया जाता. आधिकारिक तौर पर 5 शादियां कर चुके इस तानाशाह के ढेरों प्रेमिकाएं भी थीं, जिनसे काफी सारी संतानें भी थीं. हालांकि इस बात का कभी पुख्ता प्रमाण नहीं मिल सका. 

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