मौत के बाद भी सरकारी दफ्तर का चक्कर! व्हाइटनर के चक्कर में 9 महीने अटका मां का डेथ सर्टिफिकेट

बांदा नगर पालिका में मां का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए एक व्यक्ति को करीब नौ महीने तक इंतजार करना पड़ा. आवेदन में व्हाइटनर और ओवरराइटिंग का हवाला देकर प्रमाण पत्र जारी नहीं किया गया. मामला स्थायी लोक अदालत पहुंचा तो नगर पालिका ने मई 2026 में प्रमाण पत्र जारी करने की संस्तुति कर दी. अदालत ने इसे विभागीय लापरवाही मानते हुए जिम्मेदार कर्मचारियों की पहचान कर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं.

Advertisement
डॉ ब्रह्मदत्त सिंह, वरिष्ठ सदस्य स्थाई लोक अदालत ने मामले की पूरी जानकारी दी  (Photo ITG) डॉ ब्रह्मदत्त सिंह, वरिष्ठ सदस्य स्थाई लोक अदालत ने मामले की पूरी जानकारी दी (Photo ITG)

सिद्धार्थ गुप्ता

  • बांदा ,
  • 02 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 8:34 AM IST

यूपी के बांदा में नगर पालिका का एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है. यहां एक महिला का मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने में नगर पालिका को करीब नौ महीने लग गए. वजह भी ऐसी बताई गई कि मामला अदालत तक पहुंच गया. नगर पालिका ने मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं करने के पीछे आवेदन में व्हाइटनर लगाने और ओवरराइटिंग होने का हवाला दिया. साथ ही, महिला की मृत्यु से जुड़े पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने की बात भी कही. लेकिन जब स्थायी लोक अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान नगर पालिका से जवाब तलब किया और दस्तावेज मांगे, तो कहानी में नया मोड़ आ गया.

Advertisement

अदालत की सख्ती के बीच नगर पालिका ने मई 2026 में मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी करने की संस्तुति कर दी. इसके बाद प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया गया. अब अदालत ने इस पूरे मामले को विभागीय लापरवाही मानते हुए जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी की पहचान कर उनके खिलाफ विधिक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं. अदालत ने यह भी जानना चाहा कि जब पहले आवेदन में कमियां बताई जा रही थीं, तो बाद में उन्हीं परिस्थितियों में प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया कैसे पूरी हो गई.

मां की मौत के बाद प्रमाण पत्र के लिए भटकता रहा परिवार

मामले की जानकारी देते हुए स्थायी लोक अदालत के वरिष्ठ सदस्य डॉ. ब्रह्मदत्त सिंह ने बताया कि एक व्यक्ति ने अपनी मां का मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए अगस्त 2025 में बांदा नगर पालिका में आवेदन किया था. आवेदन के साथ जरूरी दस्तावेज भी लगाए गए थे. इसमें शपथपत्र, गवाहों के विवरण और आधार कार्ड समेत निर्धारित सरकारी प्रक्रिया से जुड़े कागजात शामिल थे. परिवार को उम्मीद थी कि आवेदन और दस्तावेजों की जांच के बाद जल्द ही मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर दिया जाएगा. नगर पालिका की ओर से जांच-पड़ताल भी की गई, लेकिन प्रमाण पत्र जारी नहीं हुआ. आवेदक को प्रमाण पत्र नहीं मिलने से परेशानी का सामना करना पड़ा. इसके बाद उसने कानूनी रास्ता अपनाने का फैसला किया. अक्टूबर 2025 में आवेदक ने स्थायी लोक अदालत में वाद दायर कर दिया. अदालत में मामला पहुंचने के बाद सुनवाई शुरू हुई और नगर पालिका प्रशासन से जवाब मांगा गया.

Advertisement

व्हाइटनर और ओवरराइटिंग का दिया हवाला

सुनवाई के दौरान नगर पालिका की ओर से जो जवाब दिया गया, उसने मामले को चर्चा में ला दिया. पालिका प्रशासन ने बताया कि आवेदन पत्र में व्हाइटनर का इस्तेमाल किया गया था और कुछ जगहों पर ओवरराइटिंग भी थी. इसके अलावा, मृत्यु का पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई. नगर पालिका के इस जवाब के बाद अदालत ने मामले से संबंधित दस्तावेज और साक्ष्य तलब किए. सवाल यह था कि क्या आवेदन में बताई गई कमियों के आधार पर इतने लंबे समय तक मृत्यु प्रमाण पत्र रोकना उचित था? यदि आवेदन में खामियां थीं, तो क्या आवेदक को समय रहते इसकी जानकारी देकर उन्हें दूर करने का अवसर दिया गया था? मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने नगर पालिका प्रशासन से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि आखिर प्रमाण पत्र जारी करने में इतनी देरी क्यों हुई.

मई 2026 में अचानक पूरी हो गई प्रक्रिया

मामले में सुनवाई आगे बढ़ने के दौरान मई 2026 में नगर पालिका ने एसडीएम को रिपोर्ट भेजी. इस रिपोर्ट में आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने की बात कहते हुए मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने की संस्तुति की गई. इसके बाद प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया गया. यह घटनाक्रम अदालत के सामने एक अहम सवाल लेकर आया. जब नगर पालिका पहले आवेदन में व्हाइटनर, ओवरराइटिंग और मृत्यु के साक्ष्य की कमी का हवाला देकर प्रमाण पत्र जारी नहीं कर रही थी, तो बाद में ऐसा क्या हुआ कि प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया पूरी हो गई? क्या पहले बताई गई कमियां दूर की गई थीं या फिर विभागीय स्तर पर कोई ऐसी लापरवाही हुई, जिसके चलते आवेदक को महीनों तक परेशान होना पड़ा? अदालत ने अपने आदेश में इस विरोधाभास को गंभीरता से लिया. करीब नौ महीने तक मृत्यु प्रमाण पत्र जारी नहीं होने को विभागीय लापरवाही मानते हुए जिम्मेदार लोगों की भूमिका की जांच के निर्देश दिए.

Advertisement

अनैतिक तरीके से पैसे मांगने की शिकायत का भी जिक्र

मामले में आवेदक की ओर से अनैतिक तरीके से धन की मांग किए जाने की मौखिक शिकायत का भी उल्लेख किया गया. अदालत ने इस पहलू को भी गंभीरता से लेते हुए नगर पालिका प्रशासन को जिम्मेदार कर्मचारी की पहचान कर उसके खिलाफ विधिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया है. हालांकि, धन की मांग से जुड़ा आरोप अभी जांच का विषय है. अदालत के आदेश का मुख्य जोर इस बात पर है कि मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने में हुई देरी और विभागीय लापरवाही की जिम्मेदारी तय की जाए. किसी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ दोष सिद्ध होने की बात फिलहाल सामने नहीं आई है. 

स्थायी लोक अदालत ने दिए जांच और कार्रवाई के आदेश

बांदा की स्थायी लोक अदालत की पीठ ने इस मामले में वाद स्वीकार करते हुए नगर पालिका परिषद के अधिशासी अधिकारी को स्पष्ट निर्देश दिए हैं. पीठ में अध्यक्ष विवेक कुमार, वरिष्ठ सदस्य डॉ. ब्रह्मदत्त सिंह और सदस्य शिवांगी शुक्ला शामिल थे. अदालत ने कहा कि मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने में हुई विभागीय लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी को चिह्नित किया जाए. इसके बाद पूरे मामले की जांच कर नियमानुसार विधिक कार्रवाई की जाए. नगर पालिका प्रशासन को कार्रवाई की जानकारी अदालत को भी देनी होगी. अदालत के इस आदेश के बाद अब नगर पालिका प्रशासन के सामने यह स्पष्ट करने की जिम्मेदारी है कि आवेदन मिलने के बाद से प्रमाण पत्र जारी होने तक की प्रक्रिया में कहां और किस स्तर पर देरी हुई. साथ ही, यह भी जांच का विषय होगा कि आवेदक की ओर से लगाए गए दस्तावेजों की जांच समय पर क्यों नहीं की गई और अगर कोई कमी थी तो उसका निस्तारण पहले क्यों नहीं हुआ.

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »