क्रिकेट के बल्लों से पहचान बनाने वाला मेरठ अब सिर्फ बैट बनाने वाले शहर के तौर पर नहीं जाना जाता. यहां की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री ने पिछले कुछ वर्षों में तेजी से विस्तार किया है. कभी चार-पांच इकाइयों से शुरू हुआ खेल सामान का कारोबार आज करीब 5 से 7 हजार छोटी-बड़ी यूनिटों तक पहुंच चुका है. मेरठ में बनने वाला खेल सामान देश के साथ-साथ दुनिया के कई देशों तक पहुंच रहा है. जनपद से खेल सामग्री का वार्षिक निर्यात करीब 975 करोड़ रुपये बताया गया है.
मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री का इतिहास करीब नौ दशक पुराना है. उद्योग विभाग के मुताबिक, वर्ष 1935 से 1940 के बीच कुछ परिवारों ने यहां फुटबॉल बनाने का काम शुरू किया था. इसके बाद 1947 में देश विभाजन के दौरान स्यालकोट और पेशावर आदि शहरों से विस्थापित होकर आए लोगों ने इस कारोबार को आगे बढ़ाया. धीरे-धीरे मेहनत, हुनर और नए प्रयोगों के दम पर मेरठ खेल सामग्री निर्माण का बड़ा केंद्र बन गया.
शुरुआती दौर में मेरठ का खेल उद्योग मुख्य रूप से क्रिकेट बैट और फुटबॉल तक सीमित था. समय के साथ कारोबार का दायरा लगातार बढ़ता गया. आज यहां क्रिकेट बैट, क्रिकेट बॉल और स्टंप्स के अलावा हॉकी स्टिक, फुटबॉल, वॉलीबॉल, कैरम बोर्ड, टेनिस रैकेट और बॉल भी तैयार किए जा रहे हैं. इसके अलावा खेलों के नेट, एथलेटिक उपकरण, प्रोटेक्टिव एसेसरीज, किट बैग, स्पोर्ट्स वियर, इंडोर गेम्स के सामान, बॉक्सिंग ग्लव्स, फिजिकल फिटनेस और जिम उपकरण तथा शटल कॉक का भी निर्माण हो रहा है.
चार-पांच इकाइयों से शुरू हुआ सफर
उद्योग विभाग के अनुसार, मेरठ में तैयार होने वाली खेल सामग्री की मांग विदेशों में भी है. यहां बने खेल उत्पाद ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, अमेरिका, वेस्टइंडीज, न्यूजीलैंड, जिम्बाब्वे, बांग्लादेश, जर्मनी, फ्रांस, श्रीलंका और रूस समेत कई देशों में भेजे जाते हैं. इस तरह मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री ने स्थानीय कारोबार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी जगह बनाई है.
बुची स्पोर्ट्स के मालिक चरणजीत भाटिया बताते हैं कि ओडीओपी योजना ने छोटे कारोबारियों के लिए कारोबार बढ़ाने के रास्ते आसान किए हैं. उनके मुताबिक, पहले मेरठ में सिर्फ चार-पांच स्पोर्ट्स यूनिट हुआ करती थीं, लेकिन अब छोटी-बड़ी मिलाकर करीब 5 से 7 हजार यूनिट संचालित हो रही हैं. इससे पता चलता है कि पिछले वर्षों में इस उद्योग का दायरा कितना तेजी से बढ़ा है.
चरणजीत भाटिया के मुताबिक, ओडीओपी के तहत छोटे कारोबारियों को लोन मिलने में आसानी हुई है. नई मशीनें लगाने पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी मिलने से उत्पादन क्षमता बढ़ाने में भी मदद मिली है. उन्होंने खुद भी सरकारी योजना का लाभ उठाया है. हाल ही में उन्होंने फाइबर-प्लास्टिक क्रिकेट बैट बनाने की मशीनें लगाई हैं. इससे पारंपरिक खेल सामग्री के साथ नई तकनीक से तैयार उत्पादों की दिशा में भी कारोबार आगे बढ़ रहा है.
बीडीएम स्पोर्ट्स के मालिक आदित्य महाजन का कहना है कि केंद्र और प्रदेश सरकार की खेलो इंडिया नीति ने मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को नई पहचान दिलाई है. पहले मेरठ मुख्य रूप से क्रिकेट बैट के लिए जाना जाता था, लेकिन अब यहां बैडमिंटन, टेनिस, टेबल टेनिस, कैरम बोर्ड, प्लास्टिक स्पोर्ट्स उत्पाद और दूसरी खेल सामग्री का भी बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा है.
आदित्य महाजन के मुताबिक, प्रदेश सरकार की ब्याज मुक्त ऋण योजना छोटे उद्योगों के लिए बड़ी राहत है. इससे कारोबारियों को अपने कारोबार का विस्तार करने और नई तकनीक अपनाने का अवसर मिल रहा है. सरकारी योजनाओं के सहयोग से छोटे कारोबारी भी अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.
मेरठ की स्पोर्ट्स इंडस्ट्री का असर सिर्फ कारखानों तक सीमित नहीं है. खेल सामग्री के उत्पादन से लेकर पैकिंग, पॉलिश, सिलाई, फिटिंग और किट तैयार करने तक कई तरह के काम होते हैं. इसके अलावा सप्लाई और परिवहन से जुड़े छोटे कारोबारी और श्रमिक भी इस उद्योग से जुड़े हैं. उद्योग के विस्तार के साथ इन क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर बढ़े हैं.
ओडीओपी योजना के जरिए स्थानीय उत्पादों को बाजार और ब्रांडिंग से जोड़ने पर भी जोर दिया गया है. इसका फायदा मेरठ के खेल उत्पादों को मिला है. अब इनकी पहचान सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है. अंतरराष्ट्रीय खरीदारों और बड़े ब्रांडों तक भी मेरठ के उत्पादों की पहुंच बनी है.
मेरठ के उद्यमी अब पारंपरिक हुनर के साथ आधुनिक मशीनों और तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं. इससे उत्पादन की गुणवत्ता और क्षमता दोनों में सुधार हुआ है. कारोबारियों का कहना है कि डिजाइन, गुणवत्ता, आधुनिक तकनीक, ब्रांडिंग और निर्यात पर लगातार ध्यान दिया जाए तो मेरठ वैश्विक स्पोर्ट्स गुड्स बाजार में अपनी हिस्सेदारी और बढ़ा सकता है.
अब 975 करोड़ रुपये का सालाना निर्यात
आज मेरठ सिर्फ क्रिकेट बैट बनाने वाला शहर नहीं है. यह बहुआयामी स्पोर्ट्स गुड्स हब के रूप में अपनी पहचान बना रहा है. सरकारी योजनाओं का सहयोग, उद्यमियों की मेहनत और स्थानीय कारीगरों का हुनर मिलकर इस उद्योग को आगे बढ़ा रहे हैं. देश के खेल मैदानों से लेकर विदेशों के स्टेडियम और प्रशिक्षण केंद्रों तक मेरठ में बने खेल उत्पाद पहुंच रहे हैं. यही वजह है कि करीब नौ दशक पहले शुरू हुआ यह कारोबार आज अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच चुका है और इसका वार्षिक निर्यात करीब 975 करोड़ रुपये है.
उस्मान चौधरी