ममता बनर्जी की टीएमसी में बगावत और उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में टूट के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी को लेकर नए सियासी दावे किए जा रहे हैं. सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर और यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य दोनों कह रहे हैं कि समाजवादी पार्टी के कई सांसद और नेता पार्टी छोड़ सकते हैं.
ओमप्रकाश राजभर और केशव मौर्य के बाद सवाल उठने लगे हैं कि क्या समाजवादी पार्टी में भी वैसी ही टूट संभव है जैसी महाराष्ट्र में शिवसेना (यूबीटी) और पश्चिम बंगाल में टीएमसी के सांसदों ने अपना अलग गुट बना लिया है.
हालांकि, मौजूदा राजनीतिक हालात और संसदीय गणित को देखें तो समाजवादी पार्टी में लोकसभा सांसदों की बड़ी टूट की संभावना बेहद कठिन नजर आती है. यही वजह है कि राजभर के दावे की हवा सपा के दो सांसदों ने निकाल दी है.
राजभर और केशव मौर्य का दावा
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बुधवार को कहा कि बहुत जल्द सपा में भी टूट होने जा रही है. सपा के महासचिव रामगोपाल यादव ने अमित शाह को एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने उन सांसदों का नाम भी दिया है, जो भाजपा में शामिल होंगे. इतना ही नहीं गुरुवार को दोबारा से राजभर ने कहा कि सपा के बागियों का नेतृत्व 'बागी बलिया' का लाल करेगा. इस तरह से उनका इशारा सपा सांसद सनातन पांडेय के ऊपर था.
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने दावा किया है कि सपा के 25-26 सांसद अभी टूटने को तैयार हैं, लेकिन हम तोड़ नहीं रहे हैं. हमें पता है कि 2027 चुनाव के बाद वो खुद ही टूटकर चले जाएंगे. उन्होंने कहा कि सपा का संचालन, अखिलेश की साइकिल नहीं कर सकती है. वो साइकिल सैफई जा सकती है सत्ता के गलियारे में नहीं चल सकती है. इस तरह राजभर के बाद केशव मौर्य ने साफ कह दिया है कि सपा के सांसद बीजेपी के संपर्क में है.
सपा में टूट क्यों आसान नहीं है
अखिलेश यादव को भले ही सियासत विरासत में मिली है, लेकिन 2024 में पार्टी को कमबैक कराकर अपना लोहा मनवा लिया. लोकसभा चुनाव 2024 में समाजवादी पार्टी ने 37 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. यह जीत केवल सपा के संगठनात्मक नहीं थी, बल्कि अखिलेश यादव के नेतृत्व की भी बड़ी राजनीतिक स्वीकृति मानी गई.
सपा के अधिकांश सांसद पहली बार जीतकर संसद पहुंचे हैं और उनकी राजनीतिक पहचान सीधे अखिलेश यादव और सपा के चुनावी प्रतीक से जुड़ी हुई है. यही वजह है कि सांसदों के बड़े समूह के एक साथ अलग होने की संभावना सीमित दिखाई देती है.
भारत के दल-बदल विरोधी कानून के तहत किसी भी संसदीय दल में वैध विभाजन के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का साथ होना जरूरी है. सपा के 37 लोकसभा सांसदों के मामले में इसका मतलब है कि लगभग 25 सांसदों को एक साथ अलग होना पड़ेगा. सपा में इतना बड़ी संख्या में सांसदों को बागवत की राह पर ले जाना बेहद मुश्किल माना जा रहा है.
सपा के 37 सांसद हैं, उसमें पांच सपा अखिलेश यादव के परिवार से हैं. अखिलेश और उनकी पत्नि डिंपल यादव सांसद हैं. इसके अलावा धर्मेंद्र यादव, आदित्य यादव और प्रतीक यादव सांसद हैं. इसी तरह चार मुस्लिम सांसद हैं. इसके अलावा सपा के टिकट पर जीतने वाले ज्यादातर सांसद दलित और ओबीसी समुदाय से हैं, जिन्हें अखिलेश ने खुद राजनीति में स्थापित किया है. यही वजह है कि उनका सपा के साथ छोड़कर जाना किसी अन्य दल में मुश्किल है.
ममता-उद्धव से अखिलेश कितने अलग
शिवसेना (यूबीटी) और टीएमसी के उदाहरण अलग थे. टीएमसी की टूट की बड़ी वजह बंगाल में सत्ता परिवर्तन था. ममता बनर्जी की सत्ता से बाहर होते ही पार्टी में बगावत शुरू हो गई है. इसके अलावा टीएमसी के ज्यादातर बागी सांसदों की नाराजगी अभिषेक बनर्जी को लेकर थी. वहीं, शिवसेना (यूबीटी) में टूट की बड़ी वजह संख्या का कम होना. उद्धव के 9 लोकसभा सांसद थे, जिनमें से 6 सांसद बागी हुए हैं और वे एकनाथ शिंदे के साथ गए हैं.
एकनाथ शिंदे पहले उद्धव के साथ रह चुके हैं और 2022 में बगावत कर ही सत्ता में आए थे. एकनाथ शिंदे ने खुद को स्थापित किया है, जिसके चलते उद्धव ठाकरे का साथ छोड़कर उनके सांसद चले गए. एकनाथ शिंदे अपने दल में शक्ति केंद्र बन चुके थे. समाजवादी पार्टी में फिलहाल अखिलेश यादव के सामने ऐसा कोई समानांतर शक्ति केंद्र नजर नहीं आता, जो सांसदों के बड़े समूह को अपने साथ ले जा सके.
सपा का राजनीतिक ढांचा भी अन्य क्षेत्रीय दलों से अलग है. पार्टी का मूल वोट बैंक और संगठनात्मक नियंत्रण काफी हद तक अखिलेश यादव के नेतृत्व पर केंद्रित है. 2017 के पारिवारिक विवाद के बाद अखिलेश ने संगठन पर अपनी पकड़ और मजबूत की थी. तब भी पार्टी में बड़ा संकट आया था, लेकिन अंततः अधिकांश नेता और कार्यकर्ता उनके साथ ही खड़े रहे.
शिवपाल यादव 2018 में अखिलेश यादव से अलग होकर अपनी राजनीतिक ताकत देख चुके हैं. बाद में अखिलेश यादव को ही अपना नेता मान लिया था. सपा में कोई दूसरा नेता नहीं है, जो अखिलेश के कद के बराबर खड़ा हो सका. यही वजह है कि सपा के एक-दो नेता और सांसद पार्टी छोड़ सकते हैं, लेकिन समूह बनाकर बड़ी संख्या में पाला बदलना आसान नहीं है.
राजभर-केशव के बयान रणनीति का हिस्सा
ओम प्रकाश राजभर और केशव प्रसाद मौर्य के बयान सिर्फ राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं. भाजपा और उसके सहयोगी दल विपक्षी एकता को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि समाजवादी पार्टी खुद को 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मुख्य चुनौती के रूप में स्थापित करना चाहती है. ऐसे में राजभर और केशव सपा के भीतर असंतोष की चर्चाएं राजनीतिक दबाव बनाने का माध्यम भी हो सकती हैं.
हालांकि, राजनीति में कभी भी संभावनाओं से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता. यदि भविष्य में नेतृत्व, टिकट वितरण या राजनीतिक दिशा को लेकर गंभीर मतभेद उभरते हैं तो कुछ नेताओं का दल बदलना संभव है. लेकिन सांसदों के बड़े समूह के एक साथ पार्टी छोड़ने और संसदीय दल में औपचारिक टूट होने की संभावना फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आती है.
राजभर और केशव के दावों से सियासी हलचल जरूर पैदा हुई है, लेकिन मौजूदा संख्या बल, दल-बदल कानून और अखिलेश यादव की संगठनात्मक पकड़ को देखते हुए समाजवादी पार्टी में टीएमसी, शिवसेना या एनसीपी जैसी सांसदों की बड़ी टूट आसान नहीं दिखती है.
कुबूल अहमद