पंद्रह साल बाद जिस बहन को छुड़ाकर घर लाया, वो अचानक फिर हुई गायब… भाई को आया एक फोन कॉल और जम गया खून

15 साल की लंबी तलाश के बाद अर्जुन अपनी बहन रजनी को घर वापस ले तो आया, लेकिन गांव की गरीबी, भूख और भाई-भाभी की लाचारी देखकर रजनी ने फिर से वही कदम उठा लिया, जिससे पूरा परिवार सहम गया.

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भाई की आंखों के सामने फिर कोठे पर लौट गई रजनी.(Photo: Representational) भाई की आंखों के सामने फिर कोठे पर लौट गई रजनी.(Photo: Representational)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 06 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 7:48 PM IST

रजनी के लौट आने के बाद भाई अर्जुन को पहली बार लगा था कि शायद उसकी जिंदगी का सबसे लंबा अंधेरा अब खत्म हो गया है. पंद्रह साल की तलाश, मजदूरी की रोटियां, फुटपाथ की रातें, आंसुओं से भरी सुबहें सब जैसे किसी मंजिल तक पहुंच गए थे. झोपड़ी भले टूटी हुई थी, लेकिन उसमें फिर से घर बसने लगा था.

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रजनी धीरे-धीरे सामान्य होने की कोशिश कर रही थी. वह सुबह जल्दी उठती, आंगन बुहारती, भाभी के साथ चूल्हे पर बैठती, बच्चों के बाल संवारती.बच्चे भी बुआ से लिपटते, उसकी गोद में सोते और उछलते. बच्चों का पिता अर्जुन भी बहन को यूं काम करते देखता तो उसकी आंखों में एक साथ खुशी और दर्द उतर आता.

कई बार वह चुपके से उसे देखता रहता. उसे लगता कि यह वही रजनी है जो कभी मिट्टी से गुड्डे बनाती थी, जो सपेरे के पीछे भागी थी, जो एक शाम घर नहीं लौटी थी. लेकिन समय सिर्फ चेहरे नहीं बदलता, आत्मा पर भी निशान छोड़ देता है.

रजनी अक्सर देर रात तक जागती रहती. कभी बाहर अंधेरे में ताकती, कभी बच्चों को सोते हुए देखती, कभी चुपचाप रो लेती. वह उस कच्चे मकान में कच्ची नींद ही सोती. भाभी ने कई बार पूछा भी, ''दीदी, कुछ सोच रही हो क्या?''

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वह बस मुस्कुरा देती.

''कुछ नहीं...''

लेकिन उसके भीतर बहुत कुछ था.

उसे बस्ती और घर की गरीबी चुभती थी.

टपकती छत, आधा पेट खाना, बच्चों की फटी कमीजें, ननकू के फटे हाथ, भाभी की सूनी आंखें- उसे लगता वह बोझ बन गई है.

एक दिन उसने देखा कि अर्जुन बच्चों के लिए पड़ोस की दुकान से सब्जी लाना चाहता था, लेकिन पैसे कम पड़ गए. उसने चुपचाप दुकान से उधार लिखवा लिया.

उस रात रजनी बहुत देर तक जागती रही. शायद उसी रात उसके भीतर कोई फैसला जन्म ले चुका था.

कुछ दिन बाद की बात है.

सुबह अभी पूरी तरह हुई भी नहीं थी. मुर्गे की पहली बांग सुनाई दी थी. अर्जुन की आंख खुली तो उसने देखा कि झोपड़ी का दरवाजा आधा खुला है. बच्चे और पत्नी गहरी नींद में हैं, मगर रजनी गायब है.

उसने करवट लेकर सोचा, ''शायद रजनी पानी भरने गई होगी...''

लेकिन कुछ देर बाद भी वह नहीं लौटी.

भाभी ने भी बाहर झांका.

घड़ा वहीं रखा था.

रजनी कहीं नहीं थी.

अर्जुन का दिल धक से रह गया.

वही डर, वही घबराहट, वही पंद्रह साल पुराना सन्नाटा जैसे अचानक लौट आया. उसने पुकारा- ''रजनी…''

उसने पूरे मोहल्ले में खोजा. तालाब, मंदिर, बस अड्डा, खेत... सब जगह भागा. लोग फिर इकट्ठा होने लगे.

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लेकिन इस बार अर्जुन की आंखों में सिर्फ डर नहीं था, एक अजीब-सी आशंका भी थी.

क्या वह फिर चली गई?

क्या कोई उसे फिर ले गया?

दोपहर तक वह पसीने से तर, धूल से लथपथ लौट रहा था कि तभी उसकी जेब में रखा पुराना मोबाइल कांपा.

स्क्रीन पर नाम चमका-

जीजी

अर्जुन के हाथ कांप गए.

उसने तुरंत कॉल उठाई.

''हेलो… जीजी… मिल गई क्या?''

उधर कुछ पल सन्नाटा सा रहा.

फिर जीजी की भारी आवाज आई-

''अर्जुन … संभलकर सुनना.''

उसका गला सूख गया.

जीजी बोलीं-

''अभी कांच बाजार की मालकिन का फोन आया था…''

अर्जुन की सांस अटक गई.

''वह कह रही थी- ''जीजी, मुझसे कुछ मत कहिए… रजनी खुद वापस काम पर आ गई है.''

मोबाइल अर्जुन के हाथ में था, लेकिन जैसे उसके शरीर से खून उतर गया हो.

वह वहीं सड़क किनारे बैठ गया.

आंखें खुली थीं, पर सामने कुछ दिखाई नहीं दे रहा था.

पंद्रह साल की तलाश…

मां-बाप की मौत…

जीजी की मदद…

बहन की वापसी…

सब कुछ जैसे एक झटके में ढह गया.

उधर, जीजी भी स्तब्ध थीं. उन्होंने जिंदगी में बहुत लड़कियों को दलदल से निकाला था, लेकिन यह पहली बार था कि कोई लड़की खुद वापस उसी अंधेरे में लौट गई थी.

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''मैं ऑफिस से निकल रही हूं,'' जीजी बोलीं, ''तुम शहर पहुंचो...''

शाम तक अर्जुन शहर पहुंच गया.

कांच बाजार की गलियां फिर उसके सामने थीं.

वही लाल बल्ब.

वही तंग सीढ़ियां.

वही भारी हवा जिसमें पसीना, धुआं और टूटे सपनों की गंध घुली रहती थी.

इस बार उसके कदम और भी भारी थे.

जीजी पहले से वहां थीं.उनके चेहरे पर चिंता थी, आंखों में थकान.

''चलो... उन्होंने धीमे से कहा.

दोनों ऊपर चढ़े.

हर सीढ़ी अर्जुन को किसी फांसी की ओर ले जाती महसूस हो रही थी.

कमरे का दरवाजा खुला.

रजनी अंदर बैठी थी.

साफ साड़ी पहने, बाल बंधे हुए, चेहरे पर अजीब-सी शांति.

उसे देखकर अर्जुन टूट पड़ा.

''तू फिर यहां क्यों आ गई, रजनी?''

उसकी आवाज रोने से भर गई.

रजनी ने आंखें झुका लीं.

कुछ पल कमरे में सन्नाटा रहा.

फिर उसने धीरे-धीरे कहना शुरू किया-

''भइया… गांव का घर मुझसे देखा नहीं जाता.''

अर्जुन ने सिर उठाया.

''क्या मतलब?''

''तुम दिन-रात मेहनत करते हो. भाभी आधा पेट खाती है. बच्चे उधार की कॉपियों से पढ़ते हैं. ऊपर से मैं…''

उसकी आवाज कांप गई.

''मैं तुम्हारे घर पर बोझ बन गई हूं.''

''चुप! अर्जुन लगभग चीख पड़ा और बोला- ''तू बोझ नहीं है...''

रजनी की आंखों से आंसू बह निकले.

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''बोझ नहीं तो क्या हूं? पंद्रह साल बाद लौटी हूं. खाली हाथ. टूटी हुई. तुम्हारे पास मुझे देने के लिए प्यार है, लेकिन पेट प्यार से नहीं भरता भइया.''

अर्जुन सिर पकड़कर बैठ गया.

जीजी स्तब्ध थीं.

रजनी आगे बोली-

''मैंने वहां देखा… बच्चे दूध को तरस रहे हैं. भाभी अपनी साड़ी छिपाकर पहनती है. तुम खुद भूखे रहकर उन्हें खिलाते हो. और मैं? मैं बैठकर तुम्हारी कमाई खाऊं?''

''तो इसका मतलब यह है कि तू फिर उसी नरक में जीएगी?''

रजनी ने पहली बार उसकी आंखों में देखा.

''नरक तो मैं जी चुकी हूं.''

कमरे में सन्नाटा जम गया.

''अब कम से कम कुछ कमा तो सकती हूं.''

अर्जुन ने रोते हुए कहा- ''मैं और मेहनत करूंगा.''

रजनी हल्का-सा मुस्कुराई.वह मुस्कान खुशी की नहीं, हार की थी.

''तुमने कितनी मेहनत कर ली भइया? रिक्शा खींचा, बोरे ढोए, फुटपाथ पर सोए… और क्या करोगे?''

उसके शब्द तीर की तरह लगे.

जीजी ने धीरे से कहा-

''रजनी, जिंदगी सिर्फ पैसे का नाम नहीं है.''

रजनी ने उनकी ओर देखा.

''जीजी, आपने मुझे वहां से निकाला, मैं आपका एहसान कभी नहीं भूलूंगी. लेकिन गांव जाकर समझ आया कि कुछ औरतें दलदल में इसलिए नहीं रहतीं कि उन्हें वह जगह पसंद है… बल्कि इसलिए रहती हैं क्योंकि बाहर की दुनिया उन्हें जीने लायक जमीन नहीं देती.''

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जीजी चुप हो गईं.

यह तर्क नहीं, एक जली हुई जिंदगी की गवाही थी.

अर्जुन फूट-फूटकर रो पड़ा.

''मां-बाप तेरे लिए मर गए रजनी… मैं तुझे फिर यहां नहीं छोड़ सकता…''

रजनी भी रोने लगी.

वह भाई के पास आई, उसके पैरों के पास बैठ गई.

''भइया, मैं भागकर नहीं आई. सोचकर आई हूं.''

''मत जा…''

''अगर मैं लौट गई तो तुम मुझे खिलाओगे. बच्चे कम खाएंगे. भाभी और झुकेगी. और मैं हर दिन मरूंगी.''

''और यहां?''

रजनी ने आंखें बंद कर लीं.

''यहां शायद मैं धीरे-धीरे पत्थर बन जाऊंगी.''

उस जवाब ने कमरे की हवा तक भारी कर दी.

जीजी ने पहली बार खुद को असहाय महसूस किया.

वे कानून जानती थीं, लड़ाई लड़ना जानती थीं, छापे पड़वाना जानती थीं. लेकिन किसी इंसान को उसकी अपनी टूटी हुई इच्छा से कैसे बचाया जाए- यह कोई कानून नहीं सिखाता.

बहुत देर तक तीनों चुप बैठे रहे.

नीचे बाजार का शोर चल रहा था. कहीं हंसी, कहीं गाली, कहीं हारमोनियम की आवाज.

ऊपर एक भाई अपनी बहन को बचाना चाहता था.

एक बहन अपने भाई को गरीबी से बचाना चाहती थी.

और एक औरत यानी जीजी समझ रही थी कि इस दुनिया में सबसे खतरनाक कैद कभी-कभी दीवारों की नहीं, मजबूरियों की होती है.

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रात गहरा चुकी थी.

अर्जुन उठ खड़ा हुआ.

उसके पैर लड़खड़ा रहे थे.

उसने रजनी की ओर देखा.

''चलती है?''

रजनी की आंखें भर आईं.

लेकिन उसने सिर धीरे से न में हिला दिया.

अर्जुन जैसे भीतर से ढह गया.

उसने कांपते हाथों से बहन के सिर पर हाथ रखा.

''खुश रहना…''

यह कहते हुए उसकी आवाज टूट गई.

रजनी ने उसका हाथ पकड़ लिया और पहली बार बच्चे की तरह फूट पड़ी.

जीजी ने मुंह फेर लिया.

अर्जुन सीढ़ियां उतरने लगा.

हर सीढ़ी पर उसे लगा जैसे वह अपनी बहन को नहीं, खुद को पीछे छोड़ता जा रहा है.

नीचे पहुंचकर उसने आखिरी बार ऊपर देखा.

लाल रोशनी में खिड़की पर एक परछाईं खड़ी थी.

शायद रजनी.

शायद उसकी किस्मत.

उस रात अर्जुन गांव नहीं लौटा.

वह शहर की सुनसान सड़क पर बहुत देर तक चलता रहा.

आसमान में बादल थे.

हल्की बारिश शुरू हो गई.

और उसे लगा-

पंद्रह साल पहले जिस बरसाती शाम उसकी बहन उससे बिछड़ी थी, शायद वह शाम अभी तक खत्म ही नहीं हुई है. यह भी पढ़ें: पंद्रह साल तक चली खोज... पहचान छिपाकर रिक्शा खींचा, बोरे ढोए और आखिरकार 'बदनाम गली' से बहन को बचा लाया भाई

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