बीमार छात्र को पीठ पर उठाकर 6 KM पैदल चलीं स्कूल वार्डन, ऐसे बचाई जान

आंध्र प्रदेश में स्कूल वार्डन श्रीमती हेमा ने तेज बुखार से पीड़ित छात्र को अपनी पीठ पर उठाकर करीब 6 किलोमीटर तक जंगल और पहाड़ी रास्तों से पैदल चलकर अस्पताल पहुंचाया. उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है और लोग उनकी इंसानियत व समर्पण की जमकर तारीफ कर रहे हैं.

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 वार्डन हेमा को खुद छात्र को पीठ पर उठाकर करीब 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. ( Photo: ITG) वार्डन हेमा को खुद छात्र को पीठ पर उठाकर करीब 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. ( Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 1:40 PM IST

सोचिए, अगर कोई बच्चा अचानक बीमार पड़ जाए और आसपास न एंबुलेंस हो, न सड़क और न ही कोई गाड़ी. ऐसे समय में आप क्या करेंगे? आंध्र प्रदेश में एक स्कूल वार्डन ने वही किया, जिसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी. छात्र को तेज बुखार था, इसलिए उन्होंने बिना एक पल गंवाए उसे अपनी पीठ पर उठाया और करीब 6 किलोमीटर तक जंगल, पहाड़ और ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर पैदल चलकर अस्पताल पहुंचाया. उनकी इस इंसानियत और जिम्मेदारी ने हर किसी का दिल जीत लिया. स्कूल की वार्डन श्रीमती हेमा ने किसी मदद का इंतजार नहीं किया. उन्होंने खुद ही छात्र को अपनी पीठ पर उठाया और करीब 6 किलोमीटर तक पहाड़ों, जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से पैदल चलकर अस्पताल पहुंचाया.

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सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि हेमा अपनी पीठ पर बच्चे को लेकर बेहद सावधानी से कठिन रास्तों पर आगे बढ़ रही हैं. रास्ता आसान नहीं था. कहीं चढ़ाई थी, कहीं पत्थर और कहीं जंगल का रास्ता, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उनका एक ही मकसद था कि छात्र को जितनी जल्दी हो सके इलाज मिल जाए. बताया जा रहा है कि यह घटना आंध्र प्रदेश के एक दूरदराज के आदिवासी इलाके की है, जहां आज भी सड़क, एंबुलेंस और अन्य जरूरी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे इलाकों में बीमार व्यक्ति को अस्पताल तक पहुंचाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता. यही वजह है कि वार्डन हेमा को खुद छात्र को पीठ पर उठाकर करीब 6 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा.

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इस घटना का वीडियो आंध्र प्रदेश राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. शैलजा रायपति ने सोशल मीडिया पर शेयर किया. उन्होंने हेमा की जमकर तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने अपने कर्तव्य से बढ़कर काम किया है. उनका यह कदम केवल एक छात्र की जान बचाने की कोशिश नहीं था, बल्कि यह दिखाता है कि सच्ची जिम्मेदारी और इंसानियत कैसी होती है. हेमा के इस साहसिक कदम की हर तरफ सराहना हो रही है. लोग उन्हें एक ऐसी शिक्षिका और वार्डन बता रहे हैं, जिन्होंने साबित कर दिया कि बच्चों की सुरक्षा और देखभाल उनके लिए सबसे पहले है. कई लोगों ने कहा कि अगर हर सरकारी कर्मचारी अपने काम के प्रति इतनी ईमानदारी और संवेदनशीलता दिखाए, तो समाज में बड़ा बदलाव आ सकता है.

आसपास नहीं था कोई अस्पताल
हालांकि, इस घटना ने एक गंभीर सवाल भी खड़ा किया है. आखिर आज भी देश के कई आदिवासी और दूरदराज के इलाकों में ऐसी स्थिति क्यों है, जहां बीमार व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने के लिए किसी को कई किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है? अगर वहां बेहतर सड़कें, एंबुलेंस और स्वास्थ्य सुविधाएं होतीं, तो शायद हेमा को इतनी कठिन यात्रा नहीं करनी पड़ती. यह घटना हमें दो बड़ी बातें सिखाती है. पहली, इंसानियत और कर्तव्य की भावना किसी भी मुश्किल को छोटा बना सकती है. दूसरी, देश के दूरस्थ इलाकों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी बच्चे की जान केवल इसलिए खतरे में न पड़े क्योंकि समय पर अस्पताल पहुंचने का कोई साधन नहीं था.

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