बचपन से लेकर बड़े हो जाने तक, जब कभी हम किसी मेले में गए होंगे. रिंग गेम वाली स्टॉल हमनें जरूर देखी होगी. कईयों ने तो इस पर जाकर अपने भाग्य भी आजमाए होंगे. इसमें होता ऐसा है कि एक चौकी या टेबल पर कुछ सामान रखे होते हैं. इनमें बिस्किट के डिब्बे, कोल्ड ड्रिंक की बोतल, परफ्यूम या डियो की बोतल, या फिर कैश भी रखा रहता है. सामने कुछ 3 या 4 फीट की ऊंचाई पर एक बांस बंधी होती है. फिर आपको कुछ रिंग दी जाती है. आपको इस बांस के ऊपर से लोहे की रिंग फेंककर किसी सामान या कैश को कैप्चर करना होता है.
अगर आपका निशाना सटीक रहा और आपने रिंग को सही- सही सामने रखी चौकी पर सजाए गए किसी भी एक समान या 100, 200 या 500 रुपये के नोट पर फेंककर उसे अच्छे रिंग में कैप्चर कर लेते हैं तो दुकानदार वो सामान आपको इनाम के तौर पर दे देता है और आप विजेता बन जाते हैं.
बस, विजेता बनने की इसी ललक में लोग आते हैं और अपने स्किल की आजमाइश करते हैं. 10, 20 और 50 बार रिंग फेंकने पर भी शायद ही कोई सामान रिंग में फंस पाता है. ऐसे में आप यह गेम तो नहीं जीत पाते, लेकिन दुकानदार की जेब जरूर भर जाती है. क्योंकि, हर बार जब आप रिंग फेंकने का चांस लेते हैं तो आपको उसके लिए पैसे देने होते हैं.
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नोएडा स्टेडियम में लगे रामलीला मेले में ऐसे ही एक रिंग स्टॉल पर मैं पहुंचा. स्टॉल चलाने वाले का नाम शंभू था. शंभू ने बताया कि 100 रुपये में 10 चांस यानी 10 रिंग मिलेंगे. इतने में अगर आपने कोई भी एक चीज में रिंग को अच्छे से फंसा लिया तो वो सामान आपकी हो जाएगी. 10 रिंग क्या 20 बार ट्राय करने पर भी शायद ही कुछ फंस पाता है. क्योंकि, दुकान चलाने वाले जिस ऊंचाई पर बांस बांधते हैं और रिंग फेंकने की जो शर्त होती है. उस ट्रिक से कभी भी रिंग किसी सामान पर सटीक नहीं बैठ पाती. वह उछल कर दूसरे तरफ गिर जाती है.
इस तरह लोग बार- बार अपनी किस्मत आजमाते हैं और रिंग स्टॉल वाले को पैसा देकर जाते हैं. जब मैंने शंभू से पूछा कि इस स्टॉल से रोज कितनी कमाई हो जाती है. इस पर शंभू ने बताया कि मेले में हर दिन 60- 70 लोग आते हैं. इनमें से कई तो दो- दो या तीन- तीन चांस लेते हैं. यानी 200 या 300 देकर 20 या 30 रिंग तक ट्राय करते हैं. ऐसे में हर दिन 8000 से 12000 रुपये कमाई हो जाती है.
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यहां भी दुकान खोलने के लिए ठेकेदार को कमाई का आधा हिस्सा देना पड़ता है. ठेकेदार कमाई का आधा लेकर मेले में 20 या 25 दिन के लिए दुकान लगाने की जगह दिलवा देता है. मेला में दुकान लगाने की यही फीस होती है.
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