आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर दुनियाभर में बहस जारी है. कई लोगों का मानना है कि आने वाले समय में AI इंसानों की नौकरियां छीन लेगा और वर्कप्लेस पर उनकी जगह ले सकता है. दूसरी ओर, आए दिन ऐसी खबरें भी सामने आती हैं कि AI की एंट्री के बाद कई IT कंपनियों में छंटनी हुई है. दुनिया भर की कंपनियां अपने वर्क मॉडल बदल रही हैं. अब वे कर्मचारियों को नई स्किल सिखाने के बजाय AI पर ज्यादा निवेश कर रही हैं. इन तमाम आशंकाओं के बीच सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, जो AI को बिल्कुल अलग नजरिए से देखता है. इसमें एक टेक प्रोफेशनल ने AI को अपनी नौकरी का सबसे बड़ा सहारा बताया है.
इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए इस वीडियो में टेकी सिमरन भल्ला मजाकिया अंदाज में कहती हैं कि अगर ChatGPT नहीं होता, तो शायद उनके लिए ऑफिस का काम संभालना मुश्किल हो जाता.
'AI नहीं होता तो मेरी नौकरी भी नहीं होती'
वीडियो में सिमरन कहती हैं, "लोग कहते हैं AI तुम्हारी नौकरी खा जाएगा, AI बहुत खतरनाक है और तुम्हें नौकरी से निकाल दिया जाएगा. लेकिन सच तो यह है कि AI की वजह से ही मेरी नौकरी बची हुई है. शुक्र है कि हमारे ऑफिस में AI का इस्तेमाल जरूरी कर दिया गया, वरना ChatGPT के बिना मेरा काम ही नहीं हो पाता. वह आगे कहती हैं कि मैं AI की वजह से अपनी नौकरी में टिकी हूं. AI मेरी नौकरी नहीं खा रहा, बल्कि उसे बचा रहा है. मैं पूरी तरह AI सपोर्टर हूं.
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प्रोफेशनल्स बोले- 'AI गया तो हम भी गए'
सिमरन का वीडियो देखते ही देखते वायरल हो गया. कमेंट सेक्शन में कई लोगों ने माना कि वे भी रोजमर्रा के काम के लिए AI टूल्स पर काफी हद तक निर्भर हो चुके हैं. एक यूजर ने लिखा कि अगर AI चला गया, तो मैं भी गया.
कुछ लोगों ने यह भी मजाक किया कि अगर यह वीडियो ऑफिस तक पहुंच गया, तो शायद बॉस भी जान जाएंगे कि कर्मचारी AI पर कितना निर्भर हो चुके हैं.
क्या जरूरत से ज्यादा AI पर निर्भर होना इंसानों की सीखने की क्षमता को कमजोर कर रहा है?
इस विषय पर कई रिसर्च सामने आई हैं. हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि AI लोगों की स्किल पूरी तरह कम कर रहा है, लेकिन कई अध्ययनों में पाया गया है कि AI पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता (Over-reliance) से क्रिटिकल थिंकिंग, याददाश्त और समस्या सुलझाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.
क्या कहती हैं रिसर्च?
2025 में जर्नल Societies में प्रकाशित एक अध्ययन में 666 प्रतिभागियों पर शोध किया गया. इसमें पाया गया कि AI टूल्स का अधिक इस्तेमाल 'कॉग्निटिव ऑफलोडिंग' (यानी सोचने या याद रखने का काम AI पर छोड़ देना) बढ़ाता है, जिससे लोगों की क्रिटिकल थिंकिंग क्षमता कमजोर पड़ सकती है. हालांकि स्टडी में यह भी कहा कि AI का संतुलित उपयोग और बेहतर शिक्षा इस प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं.
वहीं, MIT Media Lab के एक स्टडी में प्रतिभागियों से AI की मदद से और बिना AI के निबंध लिखवाए गए. स्टडी में पाया गया कि AI का इस्तेमाल करने वाले समूह में दिमाग की सक्रियता (Neural Engagement), याददाश्त और मौलिक सोच अपेक्षाकृत कम थी. हालांकि यह अध्ययन सीमित प्रतिभागियों पर किया गया था और इसके निष्कर्षों की पुष्टि के लिए आगे भी शोध जारी है.
विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
शिक्षा और तकनीक के विशेषज्ञों का मानना है कि AI को 'को-पायलट' (सहायक) की तरह इस्तेमाल करना चाहिए, 'ऑटो-पायलट' यानी पूरी तरह उसके भरोसे नहीं. अगर आप पहले खुद सोचते हैं और फिर AI से मदद लेते हैं, तो आपकी सीखने और समस्या सुलझाने की क्षमता बेहतर हो सकती है. लेकिन अगर हर काम AI पर छोड़ दिया जाए, तो समय के साथ अपनी सोचने-समझने और निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ने का खतरा बढ़ सकता है.
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