क्रिकेट में टकराव नया नहीं है. कभी एक तीखी नजर, कभी शब्दों की गर्मी और कभी आमने-सामने आ जाने वाले खिलाड़ी... मुकाबले का रोमांच कई बार मैदान पर भावनाओं का तापमान भी बढ़ा देता है. 1991 में जमशेदपुर में दलीप ट्रॉफी फाइनल के दौरान रमण लांबा और राशिद पटेल के बीच हुई तनातनी हो या फिर 2026 में दलीप ट्रॉफी के दौरान वैभव सूर्यवंशी और तिलक वर्मा की नोकझोंक- दोनों घटनाओं ने पुराने क्रिकेट प्रेमियों को उन दिनों की याद दिला दी, जब मैदान पर भिड़ंत सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं रहती थी.
लेकिन क्रिकेट इतिहास के पन्ने पलटें तो एक ऐसा मुकाबला भी मिलता है, जहां तनाव ने सारी सीमाएं लांघ दी थीं. बात पहुंच गई थी बल्ले को हथियार की तरह इस्तेमाल करने तक. यह वही कुख्यात वाकया है, जिसने ऑस्ट्रेलिया के तेज गेंदबाज डेनिस लिली और पाकिस्तान के कप्तान जावेद मियांदाद को क्रिकेट इतिहास के सबसे चर्चित टकरावों में ला खड़ा किया.
और इस घटना की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रतिष्ठित विजडन क्रिकेटर्स' अल्मनैक, जिसे क्रिकेट की दुनिया में सम्मान का पर्याय माना जाता है, ने इसे टेस्ट क्रिकेट के इतिहास की सबसे अशोभनीय घटनाओं में शुमार किया.
विजडन की तारीफ बड़ी बात, आलोचना उससे भी भारी
क्रिकेट जगत में विजडन से तारीफ मिलना किसी तमगे से कम नहीं माना जाता. इसकी प्रसिद्ध पीली किताब यानी Wisden Almanack ने दशकों से क्रिकेट के अच्छे-बुरे हर दौर को दर्ज किया है. किसी खिलाड़ी के प्रदर्शन की प्रशंसा हो तो वह सम्मान की बात होती है, लेकिन विजडन के पन्नों में किसी घटना की कड़ी आलोचना दर्ज हो जाए तो उसका मतलब समझना मुश्किल नहीं.
1981 में पर्थ के मैदान पर जो हुआ, वह इसी दूसरी श्रेणी में आता है.
कप्तान मियांदाद के लिए आसान नहीं था ऑस्ट्रेलिया दौरा
अक्टूबर 1981 में पाकिस्तान की टीम तीन टेस्ट मैचों की सीरीज खेलने ऑस्ट्रेलिया पहुंची. कप्तानी जावेद मियांदाद के हाथों में थी. कप्तान के तौर पर यह उनकी पहली विदेश यात्रा थी, लेकिन हालात उनके पक्ष में नहीं थे.
टीम के भीतर ही सब कुछ ठीक नहीं था. कई वरिष्ठ खिलाड़ी मियांदाद को कप्तान बनाए जाने से खुश नहीं थे और अपना असंतोष जता चुके थे. विजडन ने भी उस दौर की टीम के बारे में लिखा कि मियांदाद को पूरी टीम का समर्थन हासिल नहीं था.
ऐसे माहौल में पहला टेस्ट पर्थ में शुरू हुआ... और वहां क्रिकेट ने धीरे-धीरे अपना खतरनाक रूप दिखाना शुरू कर दिया.
62 पर ढेर पाकिस्तान, लिली का कहर
13 से 17 नवंबर 1981 के बीच खेले गए पर्थ टेस्ट में ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में 180 रन बनाए. जवाब में पाकिस्तान की हालत बेहद खराब हो गई. पूरी टीम महज 62 रन पर ऑलआउट हो गई और एक समय उसके आठ विकेट सिर्फ 26 रन पर गिर चुके थे.
इस तबाही के पीछे दो गेंदबाज थे- डेनिस लिली और टेरी एल्डरमैन. लिली ने 5 विकेट लेकर पाकिस्तान की कमर तोड़ दी, जबकि एल्डरमैन ने चार विकेट झटके.,
ऑस्ट्रेलिया ने दूसरी पारी में 424/8 पर पारी घोषित की और पाकिस्तान के सामने 543 रनों का पहाड़ जैसा लक्ष्य खड़ा कर दिया.
लक्ष्य मुश्किल था, लेकिन पाकिस्तान के पास क्रीज पर जावेद मियांदाद थे.
फिर मैदान पर हुआ कुछ ऐसा, जिसकी उम्मीद नहीं थी
पाकिस्तान ने 27 रनों पर दो विकेट गंवा दिए थे. इसके बाद मियांदाद क्रीज पर आए और मंसूर अख्तर के साथ पारी संभालने की कोशिश करने लगे. दोनों ने ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजों और लगातार बढ़ते दबाव का सामना किया.
लेकिन चायकाल से करीब 40 मिनट पहले माहौल अचानक बदल गया.
डेनिस लिली ने मियांदाद के खिलाफ एलबीडब्ल्यू की अपील की. अंपायर ने अपील ठुकरा दी. अगली गेंद पर मियांदाद आसान सिंगल लेने के लिए आगे बढ़े. तभी लिली उनसे टकरा गए.
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, लिली का बल्लेबाज के रास्ते में आना जानबूझकर किया गया लग रहा था. मियांदाद ने किसी तरह उन्हें रास्ते से हटाया और रन पूरा किया. मामला यहीं खत्म हो सकता था.
लेकिन लिली ने इसे खत्म नहीं होने दिया.
लिली का इशारा... और मियांदाद का बल्ला
नॉन-स्ट्राइकर छोर पर पहुंचे मियांदाद के पास लिली पहुंचे और उनके पैड पर लात मारकर इशारा किया कि गेंद यहीं लगी थी.
बस, इसके बाद मैदान का तापमान अचानक बढ़ गया.
मियांदाद आग बबूला हो गए. उन्होंने अपना बल्ला उठाया और उसे तलवार की तरह लहराते हुए लिली की तरफ दौड़ पड़े.
कुछ सेकेंड के लिए क्रिकेट का मैदान किसी खेल के मैदान जैसा नहीं, बल्कि दो खिलाड़ियों के बीच होने वाली सीधी भिड़ंत का अखाड़ा नजर आने लगा.
ऑस्ट्रेलियाई कप्तान ग्रेग चैपल ने बीच में आकर दोनों को अलग किया. लेकिन मामला अभी पूरी तरह शांत नहीं हुआ था. लिली कुछ दूरी पीछे जाने के बाद फिर मुड़े और मियांदाद की तरफ बढ़े.
एक बार फिर अंपायर टोनी क्राफ्टर और ग्रेग चैपल को बीच-बचाव करना पड़ा. किसी तरह ओवर पूरा हुआ और टकराव थमा.
लेकिन क्रिकेट इतिहास में वह दृश्य हमेशा के लिए दर्ज हो गया.
मैच ऑस्ट्रेलिया जीता, लेकिन चर्चा भिड़ंत की हुई
आखिरकार ऑस्ट्रेलिया ने पाकिस्तान को 286 रनों से हरा दिया. लेकिन मैच का सबसे यादगार हिस्सा स्कोरकार्ड नहीं था. चर्चा थी उस टकराव की, जिसने क्रिकेट को असहज कर दिया था.
लिली पर 200 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का जुर्माना लगाया गया, जिसे बाद में घटाकर 120 डॉलर कर दिया गया. साथ ही उन पर दो मैचों का प्रतिबंध भी लगाया गया. हालांकि वह सीरीज के बाकी दोनों टेस्ट खेले, लेकिन सजा के तौर पर उन्हें Benson & Hedges World Series Cup के दो कम महत्वपूर्ण वनडे मैचों से बाहर रखा गया.
और यही वह घटना थी, जिसे विजडन ने क्रिकेट के इतिहास के बेहद शर्मनाक प्रसंगों में जगह दी.
लांबा-पटेल से वैभव-तिलक तक... और फिर मियांदाद-लिली
आज 1991 के जमशेदपुर को याद करें तो रमण लांबा और राशिद पटेल की तनातनी सामने आती है. 2026 के दलीप ट्रॉफी में वैभव सूर्यवंशी और तिलक वर्मा की नोकझोंक दिखती है. दोनों घटनाएं अपने-अपने दौर की प्रतिस्पर्धा और खिलाड़ियों के जुनून की तस्वीर हैं.
लेकिन 1981 का पर्थ टेस्ट याद दिलाता है कि क्रिकेट में गर्मी और आक्रामकता जब नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो कहानी सिर्फ नोकझोंक की नहीं रह जाती.
लांबा-पटेल में तेवर थे, वैभव-तिलक में गर्मागर्मी दिखी... लेकिन मियांदाद-लिली के मामले में बात बल्ला उठने तक पहुंच गई थी.
शायद इसीलिए उस घटना को याद करते हुए एक बात साफ समझ आती है- क्रिकेट में मुकाबला जरूरी है, लेकिन उसकी मर्यादा उससे भी ज्यादा जरूरी. बल्ला रन बनाने के लिए है... किसी को मारने के लिए नहीं.
विश्व मोहन मिश्र