फॉस्फोरस बम क्या है... लेबनान पर जिसका इस्तेमाल कर रहा इजरायल!

फॉस्फोरस बम सफेद फॉस्फोरस से बनता है, जो ऑक्सीजन से संपर्क में आते ही जलने लगता है. तब तक आग फैलाता रहता है जब तक पूरी तरह जल न जाए. इससे सांस की तकलीफ, त्वचा पर गहरे जलन, अंदरूनी अंगों को नुकसान और मौत हो सकती है. रिहायशी इलाकों में इसका इस्तेमाल युद्ध अपराध माना जाता है.

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रॉयटर्स के फोटोग्राफर मोहम्मद सलेम ने 2009 में गाजा पट्टी पर फॉस्फोरस बम फटने की तस्वीर ली थी. (Photo: Reuters) रॉयटर्स के फोटोग्राफर मोहम्मद सलेम ने 2009 में गाजा पट्टी पर फॉस्फोरस बम फटने की तस्वीर ली थी. (Photo: Reuters)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 09 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:47 PM IST

लेबनान में इजरायल के हमलों के दौरान फॉस्फोरस बम के इस्तेमाल के आरोप लग रहे हैं. कई रिपोर्ट्स और वीडियो में सफेद धुआं और तेज जलन दिखाई दे रही है, जिसे फॉस्फोरस बम से जोड़ा जा रहा है. फॉस्फोरस बम बहुत खतरनाक हथियार है, जो इंसानों, जानवरों और इमारतों को भयानक नुकसान पहुंचाता है. आइए समझते हैं कि फॉस्फोरस क्या होता है. फॉस्फोरस बम कैसे काम करता है. इससे क्या नुकसान होता है. इसका इस्तेमाल कब-कब किया गया.

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फॉस्फोरस क्या होता है?

फॉस्फोरस एक रासायनिक पदार्थ है जो मोम जैसा दिखता है. इसमें लहसुन जैसी तेज गंध होती है. यह ज्यादातर रंगहीन होता है लेकिन हल्का पीला भी दिख सकता है. यह बहुत ज्यादा रिएक्टिव होता है. हवा में ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही यह खुद-ब-खुद जलने लगता है. अगर हवा में नमी हो और तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा हो तो यह तुरंत जल उठता है. इसलिए इसे वैक्यूम कैनिस्टर में या पानी में डुबोकर रखा जाता है. यह ऑक्सीजन से तेजी से प्रतिक्रिया करता है. बहुत गर्मी पैदा करता है.

फॉस्फोरस बम क्या है और कैसे काम करता है?

फॉस्फोरस बम सफेद फॉस्फोरस (White Phosphorus) से बनाया जाता है. यह परमाणु बम की तरह व्यवहार करता है – जब तक फॉस्फोरस पूरी तरह जलकर खत्म नहीं होता, तब तक आग और तबाही फैलाता रहता है. धमाका होने पर फॉस्फोरस के छोटे-छोटे कण हवा में फैल जाते हैं. ये कण ऑक्सीजन के संपर्क में आते ही जलने लगते हैं. आसपास की सारी ऑक्सीजन को सोख लेते हैं. जहां भी ये कण गिरते हैं, वहां आग लग जाती है. यह आग पानी से नहीं बुझती क्योंकि फॉस्फोरस खुद ऑक्सीजन बनाता रहता है.

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फॉस्फोरस बम से होने वाले नुकसान

  • तुरंत ऑक्सीजन का स्तर बहुत कम हो जाता है, जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है.  
  • फॉस्फोरस के कण नाक, मुंह या त्वचा से शरीर में घुसते हैं तो अंदरूनी अंग जल जाते हैं.  
  • त्वचा पर लगने से तेज जलन होती है, गहरे घाव बनते हैं और कई बार मौत हो जाती है.  
  • इमारतें, पेड़-पौधे और सब कुछ जलकर राख हो जाता है.  
  • धुआं इतना घना होता है कि आंखों में जलन होती है और सांस बंद हो सकती है.  
  • लंबे समय तक घाव ठीक नहीं होते और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.

फॉस्फोरस बम का इस्तेमाल कहां-कहां होता है?

फॉस्फोरस बम का मुख्य इस्तेमाल धुआं (स्मोक स्क्रीन) बनाने में होता है ताकि दुश्मन को दिखाई न दे. लड़ाकू विमानों से फेंकने पर यह गर्मी पैदा करता है. दुश्मन की हीट-सीकिंग मिसाइलों को अपनी ओर खींच लेता है. इससे विमान बच जाता है. लेकिन अगर इसे रिहायशी इलाकों में फेंका जाए तो यह बहुत खतरनाक हो जाता है.

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इतिहास में कब-कब इस्तेमाल हुआ?

  • प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में बहुत इस्तेमाल हुआ.  
  • वियतनाम युद्ध में अमेरिका ने इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया.  
  • इराक युद्ध में अमेरिका ने फॉस्फोरस बम फेंके.  
  • अरब-इजरायल युद्धों में भी इसका इस्तेमाल हुआ.

अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है?

1977 के जेनेवा कन्वेंशन में सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया. 1997 में यह तय हुआ कि अगर रिहायशी इलाकों में इसका इस्तेमाल किया गया तो इसे रासायनिक हथियार माना जाएगा. रूस ने भी इस पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन युद्ध में धुआं बनाने के लिए इसका इस्तेमाल अभी भी वैध माना जाता है.

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फॉस्फोरस हथियार के अन्य रूप

फॉस्फोरस सिर्फ बम में ही नहीं इस्तेमाल होता. हैंड ग्रेनेड, ग्रेनेड लॉन्चर, टैंक के गोले, छोटे रॉकेट और मोर्टार से भी फेंका जा सकता है. इन्हें स्मोक या मार्कर राउंड्स कहते हैं. 

फॉस्फोरस बम बहुत खतरनाक है. इंसानों के लिए भयानक नुकसान पहुंचाता है. लेबनान में इसके इस्तेमाल के आरोपों से विवाद बढ़ रहा है. अंतरराष्ट्रीय संगठन इसकी जांच कर रहे हैं क्योंकि रिहायशी इलाकों में इसका इस्तेमाल युद्ध अपराध माना जा सकता है.

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