दुनिया में एक बार फिर सुपर अल-नीनो की चर्चा तेज हो गई है. क्लाइेट वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इस बार अल-नीनो बहुत ताकतवर हुआ, तो आने वाले महीनों में कई देशों में रिकॉर्ड गर्मी, लंबे हीटवेव, सूखा, बाढ़ और जंगलों में आग जैसी घटनाएं बढ़ सकती हैं. यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे सिर्फ एक मौसम की घटना नहीं, बल्कि फ्यूचर के क्लाइमेट क्राइसेस की चेतावनी मान रहे हैं. उनका कहना है कि यह हमें यह समझने का मौका देगा कि अगर ग्लोबल वॉर्मिंग इसी रफ्तार से बढ़ती रही, तो साल 2035 के आसपास दुनिया का मौसम कैसा हो सकता है.
धरती का औसत तापमान पहले ही लगातार बढ़ रहा है. इंसानी गतिविधियों, खासकर कोयला, तेल और गैस जैसे फॉसिल फ्यूल के ज्यादा इस्तेमाल की वजह से पृथ्वी औद्योगिक दौर से पहले के मुकाबले करीब 1.4 डिग्री सेल्सियस गर्म हो चुकी है. ऐसे में अगर एक मजबूत सुपर अल-नीनो भी सक्रिय हो जाता है, तो उसका असर पहले की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है. यही कारण है कि दुनिया भर की मौसम एजेंसियां और वैज्ञानिक इस पर लगातार नजर बनाए हुए हैं.
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ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के हिसाब से, कोलंबिया यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट वैज्ञानिक मिंगफांग टिंग का कहना है कि आने वाला सुपर अल-नीनो हमें फ्यूचर के क्लाइमेट की एक झलक दिखा रहा है. उनके मुताबिक अगर दुनिया में ग्रीनहाउस गैसों का इमिशन इसी तरह जारी रहा, तो अगले कुछ वर्षों में जो मौसम सामान्य हो सकता है, उसका असर इस बार पहले ही महसूस होने लगेगा. इसलिए वैज्ञानिक इसे '2035 की दुनिया का ट्रेलर' मान रहे हैं.
इतिहास भी इस चिंता को मजबूत करता है. 1877 के आसपास आए बेहद ताकतवर अल-नीनो को दुनिया के सबसे विनाशकारी मौसमी घटनाओं में गिना जाता है. उसी दौरान दुनिया ने भीषण अकाल का सामना किया था. भारत, चीन, ब्राजील और अफ्रीका समेत कई इलाकों में पड़े उस अकाल में करीब 5 करोड़ लोगों की मौत हुई थी. बारिश नहीं हुई, फसलें सूख गईं और करोड़ों लोग भूख और बीमारी का शिकार हुए. वैज्ञानिक मानते हैं कि उस तबाही के पीछे अल-नीनो की बड़ी भूमिका थी.
आज हालात पहले से काफी अलग हैं. उस समय दुनिया की आबादी करीब डेढ़ अरब थी, जबकि आज यह 8 अरब से ज्यादा हो चुकी है मौसम का अनुमान लगाने के लिए सैटेलाइट, सुपर कंप्यूटर और मॉर्डन तकनीक मौजूद है, लेकिन दूसरी तरफ धरती पहले से कहीं ज्यादा गर्म भी हो चुकी है. इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर सुपर अल-नीनो बहुत मजबूत हुआ, तो उसका असर दुनिया के ज्यादा लोगों तक पहुंच सकता है.
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आखिर सुपर अल-नीनो होता क्या है?
अल-नीनो कोई नई मौसमीय घटना नहीं है. यह प्रशांत महासागर में बनने वाला एक प्राकृतिक चक्र है. सामान्य दिनों में समुद्र के ऊपर चलने वाली ट्रेड विंड्स गर्म पानी को पश्चिमी प्रशांत यानी इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की तरफ धकेलती रहती हैं. लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, तो वही गर्म पानी वापस महासागर के बीच और पूर्वी हिस्से की ओर फैलने लगता है. इससे समुद्र का तापमान बढ़ जाता है. वातावरण में ज्सादा गर्मी पहुंचने लगती है. यही बदलाव पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करता है.
इसी वजह से कुछ देशों में सामान्य से ज्यादा बारिश होती है, कुछ जगहों पर लंबे समय तक सूखा पड़ता है, कई इलाकों में तापमान नए रिकॉर्ड बनाता है. कहीं-कहीं जंगलों में आग लगने का खतरा बढ़ जाता है. अल-नीनो का असर सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के अलग हिस्सों में अलग रूप में दिखाई देता है.
वैज्ञानिक समुद्र के तापमान में होने वाली बढ़ोतरी के आधार पर अल-नीनो की ताकत मापते हैं. जब समुद्र का तापमान सामान्य से काफी ज्यादा बढ़ जाता है और उसका असर वैश्विक स्तर पर महसूस होने लगता है, तब उसे सुपर अल-नीनो कहा जाता है. मौजूदा क्लाइमेट मॉडल बताते हैं कि इस बार सुपर अल-नीनो बनने की संभावना काफी ज्यादा मानी जा रही है.
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इस बार खतरा ज्यादा क्यों माना जा रहा है?
वैज्ञानिकों का कहना है कि चिंता सिर्फ अल-नीनो की नहीं है. असली चिंता यह है कि यह ऐसी धरती पर बन रहा है, जो पहले ही इंसानों की वजह से काफी गर्म हो चुकी है. पिछले कई दशकों से लगातार बढ़ रहे कार्बन इमिशन ने समुद्र और वातावरण दोनों का तापमान बढ़ा दिया है. ऐसे में अगर प्राकृतिक रूप से अल-नीनो भी ज्यादा गर्मी जोड़ता है, तो हीटवेव, सूखा और भारी बारिश जैसी घटनाएं पहले की तुलना में ज्यादा गंभीर हो सकती हैं.
1970 के बाद से दुनिया का औसत तापमान लगभग हर दशक बढ़ता रहा है. वहीं एक मजबूत अल-नीनो कुछ समय के लिए वैश्विक तापमान को और ऊपर ले जा सकता है. यही वजह है कि वैज्ञानिक इस बार के अल-नीनो को सिर्फ एक मौसम चक्र नहीं, बल्कि क्लाइमेट चेंज के साथ मिलकर बनने वाली बड़ी चुनौती मान रहे हैं.
2035 की झलक क्यों बता रहे हैं वैज्ञानिक?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि वैज्ञानिक बार-बार साल 2035 का जिक्र क्यों कर रहे हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि साल 2035 में बिल्कुल ऐसा ही मौसम होगा या कोई तय फ्यूचर सामने आ जाएगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इस बार सुपर अल-नीनो बेहद ताकतवर हुआ, तो वह हमें यह समझने का मौका देगा कि लगातार बढ़ती ग्लोबल वॉर्मिंग के बीच दुनिया का मौसम कितना तेजी से बदल सकता है.
पिछले कई दशकों से धरती लगातार गर्म हो रही है. अगर इसी रफ्तार से ग्रीनहाउस गैसों का इमिशन जारी रहा, तो अगले 8 से 10 साल में जिस तरह की मौसम होगा, उसकी झलक इस बार ही देखने को मिल सकती है. इसलिए वैज्ञानिक इस सुपर अल-नीनो को फ्यूचर की एक चेतावनी मान रहे हैं.
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उन्होंने यह भी साफ किया है कि हर अल-नीनो एक जैसा नहीं होता. हर बार समुद्र का तापमान, हवाओं की दिशा और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौसम का असर अलग हो सकता है. इसलिए किसी एक घटना को फ्यूचर की पूरी तस्वीर नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे यह जरूर समझा जा सकता है कि गर्म होती धरती पर मौसम कितना ज्यादा असामान्य हो सकता है.
क्या क्लाइमेट चेंज अल-नीनो को और ताकतवर बना रहा है?
यह सवाल वैज्ञानिकों के बीच भी चर्चा का विषय है. अभी तक ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं मिला है कि क्लाइमेट चेंज सीधे-सीधे अल-नीनो को पहले से ज्यादा मजबूत बना रहा है. लेकिन वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि क्लाइमेट चेंज उसके असर को जरूर ज्यादा गंभीर बना रहा है.
यानी अगर पहले किसी अल-नीनो के दौरान तापमान एक स्तर तक बढ़ता था, तो अब पहले से गर्म हो चुकी धरती पर वही घटना ज्यादा गर्मी पैदा कर सकती है. यही वजह है कि आज रिकॉर्ड हीटवेव, समुद्री गर्मी और एक्सट्रीम मौसम की घटनाएं पहले की तुलना में ज्यादा दिखाई दे रही हैं.
प्राकृतिक मौसम चक्र और इंसानों की वजह से बढ़ रही गर्मी, दोनों मिलकर कई बार हालात को और गंभीर बना देते हैं. इसलिए वैज्ञानिक अब केवल अल-नीनो को नहीं, बल्कि उसके साथ क्लाइमेट चेंज के संयुक्त असर को समझने की कोशिश कर रहे हैं.
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दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में क्या असर दिख सकता है?
सुपर अल-नीनो का असर पूरी दुनिया में एक जैसा नहीं होता. कुछ देशों में सामान्य से ज्यादा बारिश होती है तो कुछ जगहों पर लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है. कई इलाकों में रिकॉर्ड हीटवेव चल सकती है, जबकि कहीं अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है.
पिछले बड़े अल-नीनो के दौरान दुनिया के कई हिस्सों में एक साथ भीषण गर्मी दर्ज की गई थी. इसी तरह अलग-अलग देशों में मौसम की अधिक घटनाएं भी देखने को मिली थीं. उदाहरण के तौर पर ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ीं, अमेरिका के कैलिफोर्निया में भारी बारिश और बाढ़ देखने को मिली, पूर्वी अफ्रीका के कुछ हिस्सों में बाढ़ का खतरा बढ़ा और ऑस्ट्रेलिया के पास मौजूद ग्रेट बैरियर रीफ में समुद्र के गर्म होने की वजह से कोरल ब्लीचिंग की घटनाएं सामने आईं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले समय में अगर सुपर अल-नीनो मजबूत होता है, तो दुनिया के अलग हिस्सों में ऐसी घटनाएं फिर से देखने को मिल सकती हैं. हालांकि उनका समय और तीव्रता पहले से बताना आसान नहीं है.
भारत के लिए क्यों बढ़ जाती है चिंता?
भारत में अल-नीनो का सबसे ज्यादा असर मॉनसून को लेकर देखा जाता है. अल-नीनो के दौरान मॉनसून सामान्य से कमजोर रहा है. कुछ राज्यों में बारिश कम हुई है. हालांकि मौसम वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि हर बार ऐसा होना जरूरी नहीं है, क्योंकि हिंद महासागर की स्थिति और दूसरे मौसमी सिस्टम भी मॉनसून पर असर करते हैं.
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इसके बावजूद अगर सुपर अल-नीनो मजबूत होता है, तो देश के कई हिस्सों में गर्मी ज्यादा समय तक रह सकती है. कुछ इलाकों में बारिश की कमी और कुछ जगहों पर कम समय में बहुत ज्यादा बारिश जैसी स्थिति भी बन सकती है. इसका असर खेती, जल स्रोतों और बिजली की मांग पर भी पड़ सकता है.
भारत जैसे देश में जहां करोड़ों लोगों की आजीविका खेती पर निर्भर है, वहां मौसम में बड़ा बदलाव सीधे किसानों और खाद्य उत्पादन को प्रभावित कर सकता है. यही वजह है कि भारतीय मौसम विभाग समेत दुनिया की कई एजेंसियां लगातार प्रशांत महासागर के तापमान और अल-नीनो की स्थिति पर नजर रखती हैं.
क्या दुनिया पहले से बेहतर तैयार है?
1877 के मुकाबले आज दुनिया के पास मॉर्डन तकनीक है. सैटेलाइट, सुपर कंप्यूटर और मौसम के एडवांस मॉडल कई महीने पहले तक अल-नीनो बनने के संकेत दे सकते हैं. सरकारें पहले से चेतावनी जारी कर सकती हैं और आपदा से निपटने की तैयारी भी बेहतर तरीके से कर सकती हैं.
लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि सिर्फ बेहतर तकनीक काफी नहीं है. अगर ग्रीनहाउस गैसों का इमिशन लगातार बढ़ता रहा, तो फ्यूचर में ऐसी घटनाओं का असर और गंभीर हो सकता है. इसलिए मौसम की निगरानी के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन कम करना और क्लाइमेट चेंज की रफ्तार रोकना भी उतना ही जरूरी है.
सुपर अल-नीनो कोई नई प्राकृतिक घटना नहीं है, लेकिन इस बार इसे लेकर चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि यह पहले से गर्म हो चुकी धरती पर असर दिखाएगा. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह आने वाले वर्षों की क्लाइमेट को समझने का मौका भी हो सकता है. अगर दुनिया क्लाइमेट चेंज की रफ्तार को कम करने में सफल नहीं होती, तो आज जो रिकॉर्ड गर्मी, हीटवेव, सूखा और बाढ़ असामान्य लग रहे हैं, वे फ्यूचर में और आम हो सकते हैं. इसलिए एक्सपर्ट्स इसे सिर्फ मौसम की खबर नहीं, बल्कि आने वाले समय के लिए एक गंभीर चेतावनी मान रहे हैं. रिपोर्टः साक्षी प्रजापति
आजतक साइंस डेस्क