ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम क्यों खास है? लंबे समय तक इनकार और अब भारत से डील तक कैसे पहुंची बात

ऑस्ट्रेलिया का विशाल उच्च-गुणवत्ता यूरेनियम भारत के बढ़ते न्यूक्लियर कार्यक्रम के लिए जरूरी है. एनपीटी पर हस्ताक्षर न करने के कारण लंबा इनकार 2014 के समझौते के बाद समाप्त हुआ, जो रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करता है.

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ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम खास होने की वजह वहां के सरकार की पॉलिसी है. सिक्योरिटी है. (Photo:PTI/ITG ) ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम खास होने की वजह वहां के सरकार की पॉलिसी है. सिक्योरिटी है. (Photo:PTI/ITG )

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 10 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 12:01 PM IST

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति का मुद्दा दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो रहा है. ऑस्ट्रेलिया दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार रखने वाला देश है, लेकिन लंबे समय तक भारत को इसकी आपूर्ति से इनकार करता रहा. 2014 के समझौते ने इस राह को खोल दिया. 

ऑस्ट्रेलिया दुनिया के कुल ज्ञात रिकवरेबल यूरेनियम भंडार का करीब 28-30 प्रतिशत हिस्सा रखता है. यह मात्रा अन्य किसी भी देश से ज्यादा है. मुख्य रूप से साउथ ऑस्ट्रेलिया के ओलंपिक डैम, नॉर्दर्न टेरिटरी के रेंजर और जाबिलुका तथा वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया के खदानों में यह पाया जाता है. 

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ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम की गुणवत्ता भी बेहतर मानी जाती है. अयस्क अक्सर हाई-ग्रेड होता है, जिससे निकालना आर्थिक रूप से फायदेमंद है. इसमें अशुद्धियां कम होती हैं, जो न्यूक्लियर फ्यूल बनाने के लिए उपयुक्त है. स्थिर राजनीतिक माहौल, मजबूत लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय गैर-प्रसार नीतियों का पालन करने वाला देश होने के कारण ऑस्ट्रेलिया को सुरक्षित आपूर्तिकर्ता माना जाता है. 

ये यूरेनियम 238 की 10 ग्राम की पट्टी है. (Photo: Wikipedia)

कई अन्य यूरेनियम उत्पादक देशों में राजनीतिक अस्थिरता या सुरक्षा जोखिम होते हैं, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में ऐसा नहीं है. यह विश्वसनीयता इसे खास बनाती है. रासायनिक रूप से यह सामान्य प्राकृतिक यूरेनियम है – ज्यादातर U-238 और थोड़ी मात्रा में U-235.  

भारत को ऑस्ट्रेलिया से यूरेनियम क्यों चाहिए?

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भारत के पास यूरेनियम के भंडार सीमित हैं और वे भी ज्यादातर कम-ग्रेड के हैं. देश का परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम, खासकर प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर्स (PHWR) को स्थिर यूरेनियम सप्लाई की जरूरत होती है. भारत न्यूक्लियर पावर को बढ़ाकर 22 गीगावॉट या उससे ज्यादा करने का लक्ष्य रखता है. घरेलू उत्पादन वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ है. 

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ऑस्ट्रेलिया से आयात ऊर्जा सुरक्षा के लिए जरूरी है. रूस, कजाकिस्तान जैसे सीमित स्रोतों पर निर्भर रहना जोखिम भरा है. ऑस्ट्रेलिया बड़ा और भरोसेमंद स्रोत प्रदान करता है. 2008 के भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील और एनएसजी वेवर के बाद भारत कई देशों से समझौते कर रहा है. ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम IAEA सुरक्षा उपायों वाले रिएक्टर्स को ईंधन दे सकता है. 

आर्थिक रूप से सस्ता और विश्वसनीय ईंधन बिजली की लागत कम करता है. भारत के नेट-जीरो लक्ष्यों में मदद करता है. रणनीतिक रूप से यह क्वाड भागीदारी को मजबूत करता है. भारत का तीन-चरणीय परमाणु कार्यक्रम थोरियम पर आधारित आत्मनिर्भरता का लक्ष्य रखता है, लेकिन शुरुआती चरणों में यूरेनियम की जरूरत बनी रहेगी.

क्या ऑस्ट्रेलिया का यूरेनियम कुछ स्पेशल है?

रासायनिक या आइसोटोपिक रूप से ऑस्ट्रेलियाई यूरेनियम अन्य देशों के समान ही है. कोई विशेष न्यूक्लियर गुण नहीं है. लेकिन व्यावहारिक रूप से यह खास है. विशाल भंडार (लगभग 16.7 लाख टन), आसान निकासी, कम अशुद्धियां और आपूर्ति की विश्वसनीयता इसे आकर्षक बनाती है. 

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भारत जैसे देश के लिए जो बड़े पैमाने पर न्यूक्लियर विस्तार कर रहा है, ऐसे स्थिर सोर्स की अहमियत बहुत ज्यादा है. दुनिया में यूरेनियम की मांग बढ़ रही है. स्वच्छ ऊर्जा के रूप में न्यूक्लियर पावर की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है. ऑस्ट्रेलिया इस मांग को पूरा करने में बड़ा खिलाड़ी है.

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लंबे इनकार से 2014 के समझौते तक की यात्रा

1974 के पोखरण-1 परमाणु परीक्षण के बाद ऑस्ट्रेलिया समेत कई पश्चिमी देश भारत से सतर्क हो गए. 1978 में ऑस्ट्रेलिया ने सख्त नीति अपनाई कि केवल एनपीटी (न्यूक्लियर नॉन-प्रोलिफरेशन ट्रीटी) पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को ही यूरेनियम बेचा जाएगा. भारत एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहता था क्योंकि उसे इसे भेदभावपूर्ण मानता था. 

1998 के पोखरण-2 परीक्षणों के बाद भी स्थिति कड़ी रही. 2007 में जॉन हॉवर्ड की सरकार ने भारत को यूरेनियम बेचने की अनुमति दी, लेकिन 2007-2010 के आसपास लेबर पार्टी की सरकार ने फिर इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि बिना एनपीटी पर हस्ताक्षर किए यूरेनियम नहीं मिलेगा. 

2008 का भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर समझौता और एनएसजी वेवर गेम चेंजर साबित हुआ. भारत ने सिविल और मिलिट्री कार्यक्रम अलग किए और सिविल सुविधाओं को IAEA सुरक्षा में रखा. 2014 में टोनी एबॉट की भारत यात्रा के दौरान सिविल न्यूक्लियर कोऑपरेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर हुए. ऑस्ट्रेलिया पहले गैर-एनपीटी देश के रूप में भारत को यूरेनियम बेचने वाला बना. 2015 में माल्कम टर्नबुल के समय इसे लागू किया गया. 

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इस बदलाव के पीछे भारत का मजबूत गैर-प्रसार रिकॉर्ड, चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ क्वाड जैसी रणनीतिक साझेदारी और ऑस्ट्रेलिया का निर्यात बढ़ाने का अपना हित था. अब आपूर्ति सख्त IAEA निगरानी में होती है और मिलिट्री उपयोग की कोई गुंजाइश नहीं है.

रणनीतिक और आर्थिक महत्व

यह समझौता केवल ईंधन की आपूर्ति नहीं है. यह भारत-ऑस्ट्रेलिया संबंधों को नई ऊंचाई देता है. दोनों देश इंडो-पैसिफिक में शांती और स्थिरता चाहते हैं. न्यूक्लियर एनर्जी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. घरेलू उत्पादन लगभग 400-500 टन सालाना है, जबकि जरूरत हजारों टन में है. ऑस्ट्रेलिया के पास 2040-47 तक भारत की बढ़ती मांग को पूरा करने की क्षमता है. इससे भारत की बिजली सस्ती और स्वच्छ बनेगी. साथ ही, तकनीकी सहयोग बढ़ेगा.

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