इजरायल के रॉकेट से सस्ती, रेंज दोगुनी, रास्ते में दिशा बदलती है... अब और घातक हुई पिनाका

पिनाका LRGR एक ही लॉन्चर से 120 किमी रेंज हासिल कर चुका है. बेहतर प्रोपलेंट, INS+GPS गाइडेंस और कंट्रोल फिन्स से उड़ान में मैन्यूवर कर सटीक हमला करता है.

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नई पिनाका LRGR खुद टारगेट के हिसाब से दिशा बदल सकती है. (File Photo: DRDO) नई पिनाका LRGR खुद टारगेट के हिसाब से दिशा बदल सकती है. (File Photo: DRDO)

शिवानी शर्मा / ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 10 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 10:55 AM IST

भारतीय सेना की तोपखाने की ताकत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने वाला पिनाका मल्टी-बैरेल रॉकेट लॉन्चर सिस्टम अब और ज्यादा खतरनाक हो गया है. पुराने पिनाका मार्क-2 रॉकेट की तुलना में मार्क-3 लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट (LRGR) लगभग दोगुनी दूरी तक सटीक हमला कर सकता है. यह एक ही लॉन्चर ट्यूब से छोड़ा जाता है, फिर भी 120 किलोमीटर तक मार कर सकता है.  

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पिनाका LRGR की रेंज मार्क-2 से लगभग दोगुनी क्यों है? मुख्य वजह है बेहतर प्रोपलेंट, ऑप्टिमाइज्ड डिजाइन और गाइडेंस किट का सही इस्तेमाल. पुराने अनगाइडेड रॉकेट्स में ईंधन की ऊर्जा सीमित होती थी. वे उड़ान में बिना किसी सुधार के सीधे जाते थे, जिससे रेंज और सटीकता दोनों प्रभावित होती थी.

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LRGR में हाई-एनर्जी कंपोजिट सॉलिड फ्यूल का इस्तेमाल किया गया है, जो ज्यादा समय तक लगातार थ्रस्ट देता है. रॉकेट का बॉडी डिजाइन लंबा और एयरोडायनामिक रूप से बेहतर बनाया गया है, जिससे हवा का प्रतिरोध कम होता है. यह ज्यादा दूर तक जा पाता है. 

महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रॉकेट उसी 214mm या संबंधित ट्यूब से लॉन्च होता है, जिससे पुराने पिनाका लॉन्च होते थे. यानी लॉन्चर में कोई बड़ा बदलाव नहीं करना पड़ता. इससे लॉजिस्टिक्स आसान रहता है. ज्यादा एनर्जी वाला प्रोपलेंट और बेहतर वजन-बैलेंस के कारण रॉकेट ऊंचाई पर चढ़कर लंबी दूरी तय करता है. परीक्षणों में यह 120 किमी तक पहुंचा और 60 किमी की न्यूनतम रेंज पर भी सटीक हिट किया. 

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गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम: सटीकता की कुंजी

LRGR को मार्क-2 से अलग बनाने वाला सबसे बड़ा फर्क है इसका नेविगेशन, गाइडेंस और कंट्रोल किट. इसमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) और सैटेलाइट नेविगेशन (GPS या भारतीय NAVIC) का कॉम्बिनेशन है. लॉन्च के बाद रॉकेट अपना रास्ता खुद चेक करता रहता है. अगर कोई हवा का झोंका या छोटी गलती हो तो मिड-कोर्स में सुधार करता है. 

टर्मिनल फेज में सटीक टारगेट हिट के लिए एडजस्टमेंट्स होते हैं. इससे CEP (सर्कुलर एरर प्रोबेबल) बहुत कम हो जाता है, यानी रॉकेट टारगेट से महज कुछ मीटर की दूरी पर गिरता है. अनगाइडेड रॉकेट्स में सैकड़ों मीटर की त्रुटि हो सकती थी, लेकिन गाइडेड वर्जन युद्धक्षेत्र में हाई वैल्यू टारगेट्स जैसे कमांड पोस्ट, एम्यूनिशन डंप या ट्रूप कंसंट्रेशन को सटीक निशाना बना सकता है. 

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उड़ान में मैन्यूवर कैसे करता है LRGR?

लंबी दूरी की उड़ान में कई फैक्टर्स जैसे हवा, पृथ्वी की घुमाव, छोटी-मोटी गणितीय गलतियां प्रभाव डालती हैं. बिना सुधार के रॉकेट टारगेट से भटक सकता है. इसलिए इसमें एयरोडायनामिक कंट्रोल फिन्स या कैनार्ड्स लगाए गए हैं. ये मूवेबल कंट्रोल सरफेसेज रॉकेट के नोज या बॉडी पर होते हैं, जो कंप्यूटर के सिग्नल पर एंगल बदलते हैं.

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इससे रॉकेट पिच यॉ और रोल कंट्रोल कर पाता है. INS/GPS डेटा के आधार पर फ्लाइट कंप्यूटर लगातार कैलकुलेशन करता है. फिन्स को एडजस्ट करता है. नतीजा: प्लान्ड इन-फ्लाइट मैन्यूवर्स, ट्रैजेक्टरी करेक्शन और टेक्स्टबुक प्रिसीजन से टारगेट हिट. 

कैनार्ड्स या फॉरवर्ड फिन्स की खासियत है कि वे तेज रिस्पॉन्स देते हैं, खासकर हाई स्पीड पर. पीछे के स्टेबलाइजर फिन्स के साथ मिलकर ये रॉकेट को स्टेबल और मैन्यूवरेबल बनाते हैं. यही वजह है कि लंबी उड़ान के बावजूद सटीकता बनी रहती है. यह टेक्नोलॉजी रॉकेट को सिर्फ गोला नहीं, बल्कि स्मार्ट हथियार बनाती है.

एक ही लॉन्चर से कई वैरिएंट: लॉजिस्टिक्स का कमाल

LRGR की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इसे मौजूदा पिनाका लॉन्चर (टाट्रा ट्रक पर माउंटेड) से ही फायर किया जा सकता है. सेना को नया लॉन्चर खरीदने या ट्रेनिंग देने की जरूरत नहीं. एक लॉन्चर से मार्क-1, मार्क-2, ER और अब LRGR-120 तक के रॉकेट छोड़े जा सकते हैं. इससे फील्ड में फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ती है और खर्च बचता है. 

DRDO ने इसे शूट एंड स्कूट के लिए परफेक्ट बनाया है. लॉन्च के बाद लॉन्चर तुरंत पोजीशन बदल सकता है, क्योंकि दुश्मन काउंटर-फायर से बचना जरूरी है. 12 रॉकेट्स को 44 सेकंड में फायर करने की क्षमता के साथ LRGR बैटलफील्ड को बदल सकता है.

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पिनाका LRGR 120 किमी रेंज के साथ यह दुश्मन की गहराई में हमला कर सकता है, बिना एयरक्राफ्ट या महंगे मिसाइलों के. खासकर सीमा पर जहां तेज रिस्पॉन्स चाहिए, यह गेम चेंजर साबित होगा. कारगिल युद्ध में पिनाका ने अपनी उपयोगिता साबित की थी, अब गाइडेड वर्जन इसे और प्रभावी बनाएगा. ऑपरेशन सिंदूर में भी इसने पाकिस्तान में तबाही मचाई.

DRDO का दावा है कि यह इजरायली EXTRA सिस्टम से सस्ता (लगभग 40% कम) पड़ेगा, जिससे बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव होगा. म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड और सोलार ग्रुप जैसे कंपनियां उत्पादन बढ़ा रही हैं. भविष्य में Pinaka Mk-IV (300 किमी) जैसे वैरिएंट भी आ सकते हैं. हालांकि चुनौतियां भी हैं. इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग से बचाव, बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन, टारगेटिंग इंटेलिजेंस (ड्रोन्स और सैटेलाइट्स) और वॉरहेड ऑप्शन्स को मजबूत करना होगा. 

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