भारत में मॉनसून सिर्फ बारिश का मौसम नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की जिंदगी और अर्थव्यवस्था का आधार है. फिर भी यह आज भी एक बड़ी रहस्यमयी व्यवस्था बना हुआ है. वैज्ञानिक जानते हैं कि मॉनसून आएगा, लेकिन कहां, कितनी और किस समय बारिश होगी, यह अब भी मुश्किल से समझ में आता है.
पिछले कुछ सालों में मॉनसून का मिजाज तेजी से बदल रहा है. कभी भारी बारिश और बाढ़ तो कभी सूखा. इस अनिश्चितता ने खेती, प्रशासन और आम जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है.
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उत्तराखंड सरकार ने 2022 में एक अहम आदेश जारी किया था. मुख्य सचिव से लेकर जिलाधिकारियों तक पूरे मॉनसून सीजन में किसी को छुट्टी नहीं लेने दी जाएगी. यह आदेश साफ बताता है कि अब मॉनसून और आपदा एक-दूसरे के पर्याय बन गए हैं. भूस्खलन, बादल फटना और अचानक बाढ़ की घटनाएं बढ़ गई हैं.
पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में हालात बिगड़े. उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में 2022 तक 20 जुलाई में सिर्फ 3.2 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य 142.7 मिलीमीटर होती है. यानी 98 प्रतिशत कमी. धान की रोपाई बुरी तरह प्रभावित हुई. वहीं असम, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में बाढ़ ने तबाही मचाई. एक तरफ सूखा तो दूसरी तरफ बाढ़- यही मॉनसून की नई बेईमानी है.
भारत के दो मॉनसून सिस्टम
भारत में मुख्य रूप से दो मॉनसून आते हैं. सबसे महत्वपूर्ण है दक्षिण-पश्चिम मॉनसून जो जून में केरल से शुरू होकर पूरे देश में फैलता है. यह अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नम हवाएं लाता है. यह भारत की कुल बारिश का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा लाता है.
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दूसरा है पूर्वोत्तर या शीतकालीन मॉनसून जो सितंबर-अक्टूबर में आता है. यह मुख्य रूप से तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल के कुछ हिस्सों में बारिश करता है. IMD के अनुसार मॉनसून 1 जून को केरल पहुंचता है. 17 सितंबर को राजस्थान से विदाई लेता है. लेकिन वास्तविकता में यह समय अक्सर बदल जाता है.
मॉनसून कैसे बनता है?
मॉनसून का मतलब है हवाओं का रिवर्सल यानी दिशा बदलना. मार्च में सूर्य उत्तर की ओर बढ़ता है. भारतीय उपमहाद्वीप गर्म होता है और कम दबाव क्षेत्र बनता है. दक्षिणी गोलार्द्ध से नम हवाएं आकर इंटर ट्रॉपिकल कन्वर्जेंस जोन (ITCZ) बनाती हैं. ये हवाएं मुड़कर दक्षिण-पश्चिम दिशा से भारत की ओर आती हैं.
तिब्बत का पठार गर्म होकर पंप की तरह काम करता है. यह महासागरों से नमी खींचता है. भारी बारिश कराता है. वैज्ञानिकों के अनुसार भारतीय मॉनसून की शुरुआत करीब 8 करोड़ साल पहले हुई थी, लेकिन आधुनिक रूप 2 करोड़ साल पहले तिब्बत पठार के ऊंचे उठने के बाद बना.
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मॉनसून को प्रभावित करने वाले बड़े कारक
मॉनसून को कई वैश्विक घटनाएं प्रभावित करती हैं...
इनके अलावा हिमालय, पश्चिमी घाट जैसे पहाड़ भी मॉनसून को जटिल बनाते हैं. मौसम वैज्ञानिक अब भी इन सभी कारकों को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं.
मॉनसून की ऐतिहासिक यात्रा
मॉनसून शब्द अरबी भाषा के मौसिम से आया है, जिसका मतलब मौसम है. प्राचीन काल से नाविक इन हवाओं का इस्तेमाल व्यापार के लिए करते थे. अरब के अल-मसूदी ने 10वीं शताब्दी में इसे वैज्ञानिक रूप से समझाया. 1686 में एडमंड हेली ने बताया कि जमीन और समुद्र के तापमान का अंतर मॉनसून का मुख्य कारण है.
भारत में चातक पक्षी की कथा प्रसिद्ध है. आज भी प्रवासी पक्षी मॉनसूनी हवाओं का सहारा लेकर हजारों किलोमीटर यात्रा करते हैं. 2019 में एक मंगोलियाई कुकू पक्षी ने 40,000 किलोमीटर की यात्रा कर भारत में सबसे ज्यादा समय मॉनसून सीजन में बिताया.
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जलवायु परिवर्तन के कारण मॉनसून और भी अनिश्चित हो गया है. कभी अचानक भारी बारिश तो कभी लंबा सूखा. किसान, नीति-निर्माता और वैज्ञानिक सब परेशान हैं. भारत में मॉनसून सचमुच 'वित्त मंत्री' की भूमिका निभाता है. अच्छा मॉनसून अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है तो खराब मॉनसून सूखा, महंगाई और संकट लाता है.
8 करोड़ साल पुरानी यह व्यवस्था आज भी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बनी हुई है. बेहतर मौसम पूर्वानुमान, जल संरक्षण, फसल बीमा और जलवायु अनुकूल खेती ही इस चुनौती से निपटने का रास्ता हैं. मॉनसून हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाने की सीख देता है. अगर हम इसे समझकर चले तो यह वरदान बनेगा, वरना अभिशाप.
आजतक साइंस डेस्क