भारत इस साल मौसम की बड़ी चुनौती का सामना करने जा रहा है. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में अल-नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है. यह साल के अंत तक बनी रह सकती है. WMO के अनुसार जून से अगस्त 2026 के दौरान 80 प्रतिशत और नवंबर तक 90 प्रतिशत से अधिक संभावना है कि अल-नीनो सक्रिय रहेगा.
यह प्राकृतिक जलवायु घटना भारत के मॉनसून, तापमान और कृषि को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है. IMD ने पहले ही मॉनसून को औसत से कम रहने का पूर्वानुमान दिया है. अल-नीनो इसे और बदतर बना रहा है.
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WMO के अनुसार इस बार जुलाई और अगस्त में देश के कई हिस्सों में बारिश सामान्य से 50 से 70 प्रतिशत कम हो सकती है. उत्तरी, उत्तर-पश्चिमी, पश्चिमी और दक्षिण भारत में तापमान औसत से ज्यादा रहने की संभावना 60-70 प्रतिशत है.
NASA के सैटेलाइट तस्वीरों ने भी पुष्टि की है कि ट्रॉपिकल पैसिफिक में गर्म पानी फैल रहा है. ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ने और समुद्र तल ऊंचा होने से अल-नीनो की शुरुआत साफ दिख रही है. तीन साल की ला-नीना के बाद अब अल-नीनो लौट रहा है, जो मौसम को और अनिश्चित बना रहा है.
WMO और BoM की चेतावनी: मॉनसून पर गहरा संकट
WMO के मुताबिक दक्षिण एशिया में इस सीजन बारिश सामान्य से कम होने की आशंका है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने भी मॉनसून को औसत से कम रहने का अनुमान लगाया है. जून 2026 तक देश में पहले ही 40-46 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज हो चुकी है. अल-नीनो के कारण नमी वाली हवाएं कमजोर पड़ रही हैं, जिससे मध्य भारत, महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में सूखे की स्थिति बन सकती है.
ऑस्ट्रेलिया के ब्यूरो ऑफ मीटियोरॉलजी (BoM) के अनुसार नीनो 3.4 इंडेक्स में तेज वृद्धि हुई है. समुद्री तापमान बढ़ने के साथ हवाएं और बादल भी बदल रहे हैं, जो अल-नीनो की पुष्टि करते हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि यह मध्यम से मजबूत अल-नीनो बन सकता है.
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भीषण लू और गर्मी का प्रकोप
WMO ने जून से अगस्त के बीच दुनिया भर में औसत से ज्यादा तापमान की चेतावनी दी है. भारत में उत्तरी, मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में लू की लंबी अवधि और तीव्रता बढ़ने की आशंका है. बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश पहले से ही 45 डिग्री से ऊपर तापमान झेल रहे हैं.
जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार अल-नीनो के दौरान गर्म हवा ज्यादा नमी सोख लेती है, जिससे जहां बारिश होती है वहां भारी बारिश होती है, लेकिन बड़े इलाको सूखे और गर्मी में रह जाते हैं. WMO की महासचिव सेलेस्टे साउलो ने कहा है कि सरकारों को सूखा, भारी बारिश और लू के लिए तैयार रहना चाहिए.
भारतीय ओशन डाइपोल (IOD) की भूमिका
अल-नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कभी-कभी पॉजिटिव IOD कम कर सकता है. लेकिन फिलहाल IOD न्यूट्रल स्थिति में है. अगर IOD पॉजिटिव होता है तो मॉनसून को कुछ सहारा मिल सकता है, लेकिन अभी तक इसकी कोई पक्की संभावना नहीं है. दोनों सिस्टम की ताकत और समय पर नजर रखना जरूरी है.
कृषि, जल संसाधन और अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
भारत में कम बारिश से खरीफ फसलें (धान, मक्का, सोयाबीन आदि) बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं. जलाशयों का स्तर गिरेगा, बिजली उत्पादन कम होगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ेगा. 1972, 2009 और 2015 जैसे अल-नीनो वर्षों में भारत को भारी आर्थिक नुकसान हुआ था.
सरकार को सूखा तैयारी, जल प्रबंधन, फसल बीमा और जल संरक्षण पर तुरंत काम करना चाहिए. किसानों को सूखा प्रतिरोधी बीज और वैकल्पिक फसलें अपनाने की सलाह दी जा रही है.
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जलवायु परिवर्तन के साथ अल-नीनो का खतरा बढ़ रहा है
वैश्विक तापमान बढ़ने से अल-नीनो जैसी घटनाएं ज्यादा तीव्र और बार-बार हो रही हैं. NASA के सैटेलाइट डेटा दिखाते हैं कि समुद्र गर्म हो रहे हैं, जिससे मौसम के एक्स्ट्रीम वेदर इवेंट बढ़ रहे हैं. यूरोपीय स्पेस एजेंसी के माप भी समुद्री तापमान में तेज वृद्धि दर्ज कर रहे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर योजना बनाना बहुत जरूरी है. प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना, जल संरक्षण अभियान चलाना और किसानों को सहायता देना चाहिए. आम लोगों को पानी की बचत, गर्मी से बचाव और फसल विविधीकरण पर ध्यान देना चाहिए.
2026 का अल-नीनो भारत के लिए बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है. WMO, NASA, BoM और IMD की चेतावनियां साफ हैं – कम बारिश, लंबी लू और सूखे का खतरा. अगर समय रहते तैयारी की गई तो नुकसान को कम किया जा सकता है. आने वाले महीने तय करेंगे कि भारत इस चुनौती से कैसे निपटता है.
आशुतोष मिश्रा