प्रशांत महासागर के अंदर कुछ ऐसा हो रहा है, जिसे लेकर दुनिया भर के वैज्ञानिक अलर्ट हो गए हैं. समुद्र के भीतर करीब 14,500 किलोमीटर लंबी गर्म पानी की एक विशाल लहर लगातार आगे बढ़ रही है. यह लहर इंडोनेशिया से निकलकर धीरे-धीरे दक्षिण अमेरिका की तरफ बढ़ रही है. इसी बदलाव के बाद अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA ने 11 जून को अल-नीनो की वापसी की पुष्टि की है.
सबसे हैरानी की बात यह है कि इस लहर को किसी जहाज या इंसान ने नहीं देखा. इसे अंतरिक्ष में मौजूद NASA के सेंटिनल-6 माइकल फ्रेलिच सैटेलाइट ने रिकॉर्ड किया. वैज्ञानिकों ने देखा कि जहां-जहां समुद्र के अंदर गर्म पानी पहुंचा, वहां समुद्र की सतह करीब 15 सेंटीमीटर तक ऊपर उठ गई. इसी बदलाव से पता चला कि समुद्र के भीतर बड़ी हलचल चल रही है.
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अब सवाल है कि अल-नीनो आखिर होता क्या है? आसान भाषा में समझें तो यह समुद्र और मौसम में होने वाला एक प्राकृतिक बदलाव है. आमतौर पर प्रशांत महासागर की हवाएं गर्म पानी को इंडोनेशिया की तरफ धकेलती रहती हैं. इससे दक्षिण अमेरिका के तट के पास ठंडा पानी ऊपर आता रहता है. लेकिन जब ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या दिशा बदल लेती हैं, तो गर्म पानी वापस पूर्व की ओर बढ़ने लगता है. यही अल-नीनो कहलाती है.
क्या होता है केल्विन वेव?
वैज्ञानिक इस गर्म पानी की लहर को 'केल्विन वेव' कहते हैं. गर्म पानी ठंडे पानी की तुलना में ज्यादा जगह घेरता है, इसलिए समुद्र की सतह थोड़ी ऊपर उठ जाती है. यही वजह है कि सैटेलाइट इस बदलाव को आसानी से पकड़ लेते हैं.
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार अल-नीनो काफी मजबूत हो सकता है. NOAA के मुताबिक करीब 63 प्रतिशत संभावना है कि प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा बढ़ सकता है. अगर ऐसा हुआ तो यह 1997 और 2015 जैसे ताकतवर अल नीनो की तरह असर दिखा सकता है.
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अल-नीनो से भारत के लिए क्या खतरे?
भारत के लिए भी यह चिंता की बात है, क्योंकि मजबूत अल-नीनो का असर अक्सर मॉनसून पर पड़ता है. कई बार इसकी वजह से बारिश कम हो जाती है, जिससे खेती और जल संकट जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं. हालांकि, मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि हिंद महासागर की दूसरी मौसमी परिस्थितियां इसके असर को कुछ हद तक कम भी कर सकती हैं.
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस साल के आखिर तक अल-नीनो पूरी तरह सक्रिय हो सकता है. इसलिए दुनिया भर की मौसम एजेंसियां समुद्र के अंदर हो रहे इस बदलाव पर लगातार नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि इसका असर सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ सकता है.
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