पृथ्वी बनी पांचाली... दुर्योधन-दुशासन बने इंसान, हो रहा है चीरहरण
2040-2050 तक कई शहरों में गर्मी इतनी जानलेवा हो जाएगी कि बिना कूलिंग के बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा. 2050 तक हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघलेंगे. 2100 तक 50-80% ग्लेशियर खत्म हो सकते हैं. नदियां सूखने लगेंगी. लाखों प्रजातियां विलुप्त होंगी. अगर तुरंत कार्रवाई नहीं हुई तो हम अपने बच्चों को प्रलय जैसी गर्मी, सूखा और पानी का संकट देंगे.
चलिए एक कहानी बताते हैं. ये मेटाफर में है. प्रकृति दो चीजों से बनी है- प्र यानी प्रो, कृति यानी क्रिएशन. कुल मिलाकर प्रोक्रिएशन. पर क्या हम उसे प्रोक्रिएट करने दे रहे हैं. हम तो उसे जीवन उत्पन्न करने से रोक रहे हैं. उसे बांझ बनाते जा रहे हैं. इन कामों में जब धन का दुरुपयोग करने वाले दुर्योधन जब दु-शासन के साथ मिलते हैं, तो द्रौपदी यानी पांचाली का चीर हरण करते हैं. पांचाली मतलब जिनके पांच पति थे. यहां पांचाली यानी पांच तत्वों से बने हम. अन्य जीव-जंतु. हमारी धरती. यानी हम इंसान ही दुर्योधन-दुशासन बनकर धरती की इज्जत लूट रहे हैं.
यह भी पढ़ें: ड्रग लॉर्ड के दरियाई घोड़ों को कोलंबिया सरकार ने दिया मारने का आदेश, अनंत अंबानी ने कही ये बात
धन और शासन के दुरुपयोग से आज लूट लो. खड़ी कर लो संपत्ति. लेकिन 20-25 साल बाद क्या होगा. जब अपने बच्चों के लिए खरीदी जमीन बाढ़ में या भूस्खलन में खत्म हो जाएगी. जिस लहलहाते खेतों और फार्म हाउस पर फूले नहीं समाते उसे सूरज से निकलती गर्म हवा खत्म कर देगी. आप खुद ही देख लो मौसम अपने तय समय पर नहीं है. पहले चार महीने के हर मौसम होते थे. अब गर्मी अप्रैल से शुरू होकर नवंबर तक जाती है.
चलिए आपको बताते हैं कि अगले 20-25 साल में क्या होने वाला है. ये सारी चीजें साइंटिफिक रिसर्च पर आधारित है.
आज ही दुनिया के कई शहरों में, खासकर ग्लोबल साउथ (गरीब देशों) में, गर्मी एक साइलेंट किलर बन चुकी है. अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट से तापमान 10 डिग्री तक बढ़ जाता है. काम करना, स्कूल जाना और अस्पताल पहुंचना मुश्किल हो रहा है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक शहरों में खतरनाक गर्मी से प्रभावित गरीबों की संख्या 700% बढ़ जाएगी. पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे.
यह भी पढ़ें: 4 करोड़ रुपये का हेलमेट है कमाल का, जमीन से आसमान तक दिखाता है सब नजारा
वैज्ञानिकों के अनुसार, कुछ उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में 2030-2040 तक साल के आधे दिनों में बाहर काम करना या निकलना बहुत खतरनाक हो जाएगा. 2050 तक गर्म इलाकों में extremely dangerous heat यानी चरम स्तर की खतरनाक गर्मी कई दिनों तक आम हो सकता है, जहां इंसान कुछ घंटों से ज्यादा बाहर नहीं रह सकता. यानी 51°C तक हीट इंडेक्स पहुंच जाएगा.
2040-2060 तक: गर्मी का सबसे खतरनाक दौर
2040 के आसपास कई शहरों (खासकर भारत, पाकिस्तान, अफ्रीका) में हीटवेव इतनी लंबी और तेज होंगी कि बिना एसी या कूलिंग के बाहर निकलना जानलेवा हो जाएगा. बाहर काम करने वाले मजदूर. स्कूल जाने वाले बच्चे, बुजुर्ग और गरीब सबसे पहले शिकार होंगे. अगर उत्सर्जन नहीं रोका गया तो 2050 तक गर्मी की वजह से लाखों मौतें आम हो जाएंगी. बिजली संकट, प्रदूषण, भुखमरी और पलायन बढ़ेगा. कोई भी शहर, आग के समंदर जैसे लगेंगे जहां सांस लेना भी मुश्किल होगा.
यह भी पढ़ें: भारत गर्मी से जूझ रहा, चीन बाढ़ से... क्विंगझाऊ-ग्वागंशी में सड़कें-गाड़ियां डूबीं, मौसम में इतना अंतर कैसे
ग्लेशियर पिघलने और नदियां सूखने का समय
ICIMOD रिपोर्ट्स के अनुसार, हिमालय के ग्लेशियर 2050 तक पीक वॉटर यानी अधिकतम पिघलाव तक पहुंचेंगे. इसके बाद पानी कम होने लगेगा. 2100 तक अगर ग्लोबल वार्मिंग 2-3°C बढ़ गई तो हिमालय के 50-75% ग्लेशियर पिघल सकते हैं. कुछ अध्ययनों में 80% तक का अनुमान है. इससे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, सिंधु जैसी नदियों में गर्मियों का पानी बहुत कम हो जाएगा. कई नदियां सूखने लगेंगी, जिससे सूखा, भूजल की कमी और खेती का संकट आएगा.
प्रजातियों का विलुप्त होना
बढ़ते तापमान, ग्लेशियर पिघलने और मौसम के बदलाव से कई पेड़-पौधे और जानवरों की प्रजातियां 2050-2100 के बीच खत्म हो जाएंगी. हिमालयी जैव विविधता और समुद्री जीव-जंतु सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे. मेगा अल-नीनो (2026-27) जैसे घटनाक्रम इससे और तेजी ला रहे हैं.
पृथ्वी पर प्रलय जैसा माहौल कब?
प्रलय जैसा माहौल इस सदी के अंत तक बन सकता है, लेकिन अगर उत्सर्जन तेजी से कम नहीं हुआ तो यह 20-30 साल पहले यानी 2070-2080 तक भी पहुंच सकता है.
यह भी पढ़ें: पानी के लिए पहले दो परिवार लड़े, फिर पूरा इलाका, आखिर में सेना को उतरना पड़ा... 42 मौतों से दहल उठा ये देश
हम अपने बच्चों को क्या देंगे - प्रलय या खूबसूरत प्रकृति?
विश्व बैंक की हैंडबुक, ICIMOD की चेतावनियां और वैज्ञानिक रिपोर्ट्स साफ कह रही हैं कि अभी भी समय है. अगर हम तुरंत कार्रवाई करें - ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर, सस्टेनेबल कूलिंग, वाटर मैनेजमेंट, उत्सर्जन कम करना और क्षेत्रीय सहयोग - तो हम अपने बच्चों को खूबसूरत, ठंडी और पानी से भरपूर प्रकृति दे सकते हैं. लेकिन अगर हम इग्नोर करते रहे तो हम उन्हें प्रलय - जहरीली गर्मी, सूखी नदियां, सूने जंगल और अस्त-व्यस्त दुनिया देंगे.
2040-2050 सबसे निर्णायक दशक है. अगर अब नहीं जागे तो 2100 तक पृथ्वी हमारे बच्चों के लिए रहने लायक नहीं बचेगी. फैसला हमारे हाथ में है - प्रलय लाने वाला दुर्योधन-दुशासन बनना है या जीवन की उत्पत्ति करने वाली प्रकृति. इज्जत लूटने वाला बनना है या सम्मान देने वाला.
ऋचीक मिश्रा