भारत की कृषि व्यवस्था आज जलवायु परिवर्तन की मार झेल रही है. बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश, सूखा और बाढ़ जैसी घटनाएं फसल उत्पादन को नुकसान पहुंचा रही हैं. क्लाइमेट ट्रेंड्स की नई रिपोर्ट के अनुसार देश को हर साल करीब 13 अरब अमेरिकी डॉलर का खाद्य नुकसान उठाना पड़ रहा है. यह नुकसान मुख्य रूप से कमजोर भंडारण, परिवहन और कोल्ड चेन व्यवस्था के कारण हो रहा है. छह राज्यों में सूखे की घोषणा हो चुकी है.
इससे किसानों की आय, खाद्य उपलब्धता और बाजार की कीमतें प्रभावित हो रही हैं. जलवायु परिवर्तन का असर अब सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रह गया है. यह पूरी खाद्य आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहा है और आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी बोझ बढ़ा रहा है.
रिपोर्ट ‘फ्रॉम रिस्क टू रेजिलिएंस: क्लाइमेट चेंज, इकोलॉजी एंड द फ्यूचर ऑफ इंडियन एग्रीकल्चर’ में बताया गया है कि अत्यधिक गर्मी और चरम मौसमी घटनाएं फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को और बढ़ा रही हैं. दिल्ली की आजादपुर मंडी का उदाहरण इस संकट को साफ दिखाता है.
वर्ष 2024 भारत का अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा. उस दौरान एक फल विक्रेता को एक ही दिन में एक लाख रुपये से ज्यादा का नुकसान हुआ क्योंकि आम अत्यधिक गर्मी के कारण जल्दी खराब हो गए. सामान्य दिनों में दो दिन तक टिकने वाले फल एक दिन में ही नष्ट हो गए.
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क्लाइमेट ट्रेंड्स की रिसर्च लीड डॉ. पलक बल्यान के अनुसार एक-तिहाई फल और सब्जियां उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही खराब हो जाती हैं. गर्मी से दूध उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है. मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है.
सूखा, पशुधन और भंडारण की समस्या
देश के छह राज्यों में सूखा घोषित होने के बावजूद अन्य क्षेत्रों में भी हालात बेहतर नहीं हैं. सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के डॉ. जीवी रामंजनयुलु के अनुसार एक ही राज्य के अलग-अलग इलाकों में सूखे की तीव्रता अलग हो सकती है. पिछले कई दशकों का अनुभव बताता है कि यह संकट लंबे समय तक बना रह सकता है.
अत्यधिक गर्मी के कारण हर साल करीब 2,661 करोड़ रुपये का दूध उत्पादन नुकसान हो रहा है. यह लगभग 18 लाख टन दूध के बराबर है. देश की 40 प्रतिशत पशुधन आबादी चरम मौसम के प्रति संवेदनशील है. कमजोर कोल्ड चेन के कारण फल-सब्जियों का 40 प्रतिशत और अनाज का 5-6 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद हो जाता है.
केवल चार प्रतिशत ताजा उपज को ही कोल्ड स्टोरेज की सुविधा मिल पाती है. 20 मिलियन हेक्टेयर से ज्यादा कृषि भूमि बाढ़, सूखा और अन्य आपदाओं से प्रभावित हुई है. पिछले तीन दशकों में रासायनिक उर्वरकों की खपत दोगुने से ज्यादा हो गई है. 1990 में प्रति हेक्टेयर 73.5 किलोग्राम से बढ़कर 2023 में 199 किलोग्राम हो गई.
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वायु प्रदूषण से होने वाले फसल नुकसान से करीब 9.4 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता था. कृषि क्षेत्र भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 13.7 प्रतिशत योगदान देता है. क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला के अनुसार अल नीनो कमजोर मिट्टी और गिरते भूजल स्तर पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है. इसका असर खेतों से आगे बाजार, खाद्य कीमतों और महंगाई तक पहुंच रहा है.
समाधान और विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मौसम पूर्वानुमान पर्याप्त नहीं है. बेहतर भंडारण, कृषि विस्तार सेवाएं, बाजार पहुंच और टिकाऊ खेती में निवेश जरूरी है. जैविक खेती, फसल विविधीकरण, मौसम आधारित बीमा और पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत बनाने की जरूरत है.
पूर्व कृषि सचिव टी. नंदकुमार ने नीतिगत जोखिमों पर ध्यान देने और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की बात कही. मौसम वैज्ञानिकों ने सूखा प्रतिरोधी फसलों और सिंचाई सुविधाओं पर जोर दिया. रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जोखिम बढ़ने के बाद भरपाई करने के बजाय पहले से जोखिम कम करने वाली नीतियों में निवेश करना होगा. मिट्टी और जल संरक्षण, आधुनिक तकनीक तथा किसानों को समय पर सहायता उपलब्ध कराना आवश्यक है ताकि भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.
आशुतोष मिश्रा