शारदीय नवरात्र का महापर्व कल से शुरू हो रहा है. नवरात्र साल में चार बार आते हैं- माघ, चैत्र, आषाढ़ और आश्विन. मान्यता है कि नवरात्र से वातावरण के तमस का अंत होता है और सात्विकता की शुरुआत होती है. मन में उल्लास, उमंग और उत्साह की वृद्धि होती है. दुनिया में सारी शक्ति, नारी या स्त्री स्वरूप के पास ही है. इसलिए इसमें देवी की उपासना का विधान बताया गया है. नवरात्र के नौ दिनों में देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा जाती है. हर स्वरूप से विशेष तरह का वरदान मिलता है. साथ ही ग्रहों की बाधा समाप्त होती है. इस बार नवरात्र का पावन पर्व 11 अक्टूबर से लेकर 19 अक्टूबर तक रहेगा. नवरात्र पर्व की शुरुआत प्रतिपदा तिथि पर घटस्थाना यानी कलश स्थापना के साथ होती है. आइए
शारदीय नवरात्र 2026 तिथि
हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर 2026 को रात 9 बजकर 19 मिनट पर शुरू होगी और 11 अक्टूबर को रात 9 बजकर 30 मिनट तक रहेगी. उदया तिथि की मान्यता के अनुसार, शारदीय नवरात्र का शुभारंभ 11 अक्टूबर से होगा. इसी दिन मां शैलपुत्री की आराधना के साथ कलश स्थापना की जाएगी.
कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त
शारदीय नवरात्र की शुरुआत प्रतिपदा तिथि पर घटस्थापना के साथ होती है. इस बार घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 11 अक्टूबर को सुबह 6:19 बजे से लेकर सुबह 10:12 बजे तक रहेगी. जो लोग इस शुभ घड़ी में घटस्थापना न कर पाएं वो अभिजीत मुहूर्त में सुबह 11:44 बजे से लेकर दोपहर 12:30 बजे तक भी घटस्थापना कर सकते हैं.
राहुकाल में न करें घटस्थापना
ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, राहुकाल को शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता. 11 अक्टूबर को राहुकाल शाम 04:34 बजे से लेकर शाम 6:01 बजे तक रहेगा. इस अवधि में पूजा-पाठ या मांगलिक कार्यों से बचने की सलाह दी जाती है. इसलिए नवरात्रि की पूजा के लिए समय तय करते हुए राहुकाल का ध्यान रखें.
कलश की स्थापना कैसे करें?
घटस्थापना के लिए सबसे पहले घर की उत्तर पूर्व या पूर्व दिशा में एक चौकी स्थापित करें. इस पर लाल कपड़ा बिछाएं. उसके ऊपर मां की मूर्ति या चित्र स्थापित करें. फिर चौकी के बगल में एक मिट्टी का कलश स्थापित करें. कलश में जल और एक सिक्का डालें. कलश के मुख पर मौली से बंधा हुआ नारियल रखें. इस नारियल पर लाल चुनरी भी बांधें. कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते बांधना भी शुभ होता है. इसके बाद इस कलश को देवी की चौकी के पास स्थापित कर दें. कलश की स्थापना के साथ एक अखंड दीपक भी जला दें.
कलश स्थापना के समय करें इस मंत्र का जाप
“ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।
मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
कुक्षौ तु सागराः सप्त सप्तद्वीपा च मेदिनी।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः॥
अङ्गैश्च सहिता सर्वे कलशतु समागिताः।।”
घटस्थापना और पूजन सामग्री
मिट्टी या तांबे का कलश, साफ जल, एक सिक्का, अक्षत, नारियल, आम के पत्ते, दो साबुत सुपारी, दो इलायची, हल्दी की एक गांठ, लकड़ी की चौकी, लाल वस्त्र, लाल कलावा या मौली, दो साबुत लौंग और नारियल और उस पर बांधने के लिए छोटी लाल चुनरी, धूप, दीप, घी, फल, मिठाई और जौ बोने का पात्र.
इस बार किस वाहन पर सवार होकर आ रहीं देवी?
हर बार देवी का आगमन किसी विशेष वाहन पर होता है. इससे आने वाले समय के बारे में अनुमान लगाया जाता है. इस बार देवी का आगमन हाथी पर हो रहा है. यह सम्पन्नता, समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है. लोगों के जीवन में शांति और आनंद आएगा. देवी जब हाथी पर सवार होकर आती हैं तो इसे धन-धान्य में वृद्धि और आर्थिक स्थिरता का प्रतीक भी माना जाता है.
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