Sawan 2026: शिवलिंग पर मांस चढ़ाकर जूठे जल से जलाभिषेक! कहानी शिवजी के अनोखे भक्त की

कन्नप्पा के शिवजी के पूजन के लिए कोई खास सामग्री उपलब्ध नहीं थी. उसका पूरा जीवन शिकार पर ही निर्भर था और वही उसकी सबसे प्रिय चीज थी. इसलिए अपने शिकार का सबसे अच्छा हिस्सा वह उस शिवलिंग को अर्पित कर देता था. उसके पास पानी रखने के लिए कोई पात्र नहीं था. इसलिए वो अपने मुंह में पानी भरकर लाता था और उसी से शिवलिंग का अभिषेक करता था.

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कन्नप्पा दक्षिण भारत के जंगलों में रहने वाला एक शिकारी था. उसका पूरा जीवन जंगलों के बीच गुजरा. इसलिए उसे न तो शास्त्रों की जानकारी थी और न ही मंत्रों व पूजा की विधियों से वो अवगत था. (प्रतीकात्मक तस्वीर) कन्नप्पा दक्षिण भारत के जंगलों में रहने वाला एक शिकारी था. उसका पूरा जीवन जंगलों के बीच गुजरा. इसलिए उसे न तो शास्त्रों की जानकारी थी और न ही मंत्रों व पूजा की विधियों से वो अवगत था. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 02 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:20 AM IST

भगवान शिव का प्रिय श्रावण मास चल रहा है. 3 अगस्त यानी कल सावन का पहला सोमवार भी है. इस दिन भगवान शिव के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ेगी. हर जगह 'हर-हर महादेव' का जयकारा गूंजेगा. भगवान शिव का गंगाजल, दूध और पंचामृत से अभिषेक किया जाएगा. श्रद्धालु भांग, धतूरा, बेलपत्र और शमीपत्र अर्पित कर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार ये सभी वस्तुएं भगवान शिव को अत्यंत प्रिय हैं. 

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क्या आप भगवान शिव के परम भक्त कनप्पा नायनार के बारे में जानते हैं, जिसकी पूजा का तौर-तरीके आम लोगों से बहुत अलग थे. और भगवान शिव ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे दर्शन भी दिए थे. आज भी लोग उन्हें भगवान शिव के सबसे महान भक्तों में गिनते हैं. उनकी पूजा का तरीका सामान्य धार्मिक रीति-रिवाजों से बिल्कुल अलग था, लेकिन उनके मन में भगवान के प्रति अटूट प्रेम, पूर्ण समर्पण और निष्कपट भाव था.

कौन थे कन्नप्पा नायनार?
कन्नप्पा दक्षिण भारत के जंगलों में रहने वाला एक शिकारी था. उसका पूरा जीवन जंगलों के बीच गुजरा. इसलिए उसे न तो शास्त्रों की जानकारी थी और न ही मंत्रों व पूजा की विधियों से वो अवगत था. हालांकि, भगवान शिव के प्रति उनकी आस्था इतनी गहरी थी कि वह किसी भी औपचारिक नियम से कहीं अधिक प्रभावशाली बन गई. उनकी भक्ति का आधार केवल सच्चा प्रेम और पूर्ण विश्वास था.

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शिव भक्ति की शुरुआत कैसे हुई?
पौराणिक कथा के अनुसार, एक दिन कन्नप्पा शिकार की तलाश में जंगल पहुंचा. वहां उसकी नजर एक शिवलिंग पर पड़ी. उसे देखते ही उनके मन में यह भावना जागी कि यह कोई साधारण पत्थर नहीं, बल्कि किसी दिव्य शक्ति का स्वरूप है. उसने निश्चय किया कि अब वो रोज उस शिवलिंग की सेवा करेगा. पूजा की विधि का ज्ञान न होने के कारण कनप्पा ने अपने सरल भाव से ही भगवान शिव की आराधना आरंभ कर दी.

कन्नप्पा की अनोखी पूजा
कन्नप्पा के शिवजी के पूजन के लिए कोई खास सामग्री उपलब्ध नहीं थी. उसका पूरा जीवन शिकार पर ही निर्भर था और वही उसकी सबसे प्रिय चीज थी. इसलिए अपने शिकार का सबसे अच्छा हिस्सा वह उस शिवलिंग को अर्पित कर देता था. और बचाकुचा खुद खा लेता था. उसके पास पानी रखने के लिए कोई पात्र नहीं था. इसलिए वो अपने मुंह में पानी भरकर लाता था और उसी से शिवलिंग का अभिषेक करता था. प्रतिदिन वे अपने हाथों से शिवलिंग और उसके आस-पास की सफाई भी करते थे. परंपरागत दृष्टि से उसकी पूजा असामान्य थी, लेकिन उसमें छल, दिखावा या स्वार्थ का कोई स्थान नहीं था.

जब भगवान शिव ने ली भक्ति की परीक्षा
एक बार कन्नप्पा ने देखा कि शिवलिंग की एक आंख से रक्त बह रहा है. अपने आराध्य को पीड़ा में देखकर उन्होंने बिना किसी संकोच के अपनी एक आंख निकालकर शिवलिंग पर अर्पित कर दी. कुछ ही क्षण बाद शिवलिंग की दूसरी आंख से भी रक्त बहने लगा. तब कन्नप्पा ने दूसरी आंख भी अर्पित करने का निश्चय किया.

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दूसरी आंख निकालने से पहले उसने अपने पैर से उस स्थान को चिह्नित किया, ताकि दृष्टि समाप्त होने के बाद भी सही स्थान पर आंख अर्पित कर सके. जैसे ही वो अपनी दूसरी आंख निकालने लगा, उसी क्षण भगवान शिव स्वयं प्रकट हो गए. महादेव ने उसे ऐसा करने से रोक लिया और उसकी अद्वितीय भक्ति से प्रसन्न होकर उसे अपना परम भक्त स्वीकार किया. साथ ही, उन्हें मोक्ष का वरदान भी प्रदान किया.

आज भी जीवित है इस भक्ति की स्मृति
आंध्र प्रदेश के प्रसिद्ध श्रीकालहस्ती मंदिर का संबंध कन्नप्पा नायनार की इस अमर कथा से जोड़ा जाता है. आज भी लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान शिव और उनके परम भक्त कन्नप्पा को श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं. यह कथा बताती है कि भगवान शिव के लिए बाहरी आडंबर से अधिक महत्व सच्चे मन, निष्कपट प्रेम और अटूट समर्पण का होता है.

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