Hindu Dharam: सनातन धर्म और हिंदू शास्त्रों में पत्नी को पति की वामांगी कहा गया है, जिसका अर्थ होता है शरीर का बायां हिस्सा. लेकिन अक्सर लोगों में यह उलझन रहती है कि क्या हर शुभ कार्य में पत्नी को हमेशा बाईं ओर (Left side) ही बैठना चाहिए? ज्योतिष, शास्त्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसके बेहद स्पष्ट और सटीक नियम बताए गए हैं. अलग-अलग कार्यों की प्रकृति के हिसाब से पत्नी के बैठने की दिशा बदल जाती है. आइए पंडित अरविंद शुक्ला से जानते हैं इससे जुड़े महत्वपूर्ण नियम.
कब किस ओर बैठना चाहिए?
पंडित अरविंद शुक्ला के अनुसार, कर्मों को दो भागों में बांटा गया है मिश्रित व सांसारिक कार्य और दैवीय व पूजा-पाठ के कार्य. इसी आधार पर बैठने की दिशा तय होती है.
1. दाईं ओर बैठने के नियम
जब भी कोई शुभ, धार्मिक, दैवीय या मांगलिक कार्य हो रहा हो, तो पत्नी को पति के दाईं ओर बैठना चाहिए. इसके अंतर्गत निम्नलिखित कार्य आते हैं.
यज्ञ और हवन- किसी भी प्रकार के धार्मिक यज्ञ या अनुष्ठान में.
पूजा-पाठ और संकल्प- भगवान की कथा, सत्यनारायण व्रत की पूजा या किसी शुभ कार्य का संकल्प लेते समय.
विवाह संस्कार- विवाह के समय जब फेरे होते हैं, तो शुरुआती वचनों तक कन्या दाईं ओर ही बैठती है.
ब्राह्मण भोज व दान- किसी को दान देते समय या ब्राह्मणों के पैर धोते समय.
शास्त्रों का तर्क- धार्मिक और मांगलिक कार्यों में 'सव्य' (दाहिना भाग) प्रधान होता है. दाहिने भाग को सकारात्मक ऊर्जा और देवताओं का वास माना जाता है, इसलिए शुभ संकल्प लेते समय पत्नी का दाईं ओर होना अनिवार्य है.
2. बाईं ओर (Left Side) बैठने के नियम
सांसारिक, पारिवारिक और कुछ विशेष परिस्थितियों में पत्नी को पति के बाईं ओर (Left side) बैठना चाहिए. इसके अंतर्गत निम्नलिखित बातें आती हैं:
भोजन करते समय: पति-पत्नी जब साथ में भोजन कर रहे हों.
सोते समय: शयन कक्ष में सोते समय पत्नी को हमेशा पति के बाईं ओर सोना चाहिए.
यात्रा के समय: किसी यात्रा पर प्रस्थान करते समय या सवारी पर बैठते समय.
लोकाचार और सामाजिक कार्यक्रम: किसी सामान्य सामाजिक समारोह या सभा में बैठते समय.
शास्त्रों में वर्णित श्लोक
स्कंद पुराण और अन्य शास्त्रों में एक बेहद प्रसिद्ध श्लोक है जो इस नियम को पूरी तरह स्पष्ट करता है.
"विवाहे सग्रहे चैव भोजने शयने तथा।
वामपार्श्वे भवेद् भार्या दक्षिणो यज्ञकर्मणि॥"
अर्थ: विवाह के समय (फेरों के बाद गृह प्रवेश के वक्त), यात्रा (सग्रह) में, भोजन करते समय और सोते समय पत्नी को बाईं ओर होना चाहिए. जबकि यज्ञ, हवन, पूजा-पाठ और मांगलिक कर्मों में पत्नी को दाईं ओर बैठना चाहिए.
ऐसा करने के पीछे का कारण क्या है?
ऊर्जा का संतुलन (अर्धनारीश्वर रूप): भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप में माता पार्वती उनके बाईं ओर विराजमान हैं, जो शक्ति और सांसारिक सृजन का प्रतीक हैं. बाईं ओर का हिस्सा प्रेम, दया और ममता (चंद्र स्वर) को दर्शाता है, जबकि दाहिना हिस्सा क्रियाशीलता, नियम और पराक्रम (सूर्य स्वर) को दर्शाता है.
पूजा की पूर्णता: शास्त्रों के अनुसार, पति द्वारा किए गए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान का फल तब तक पूरा नहीं होता है, जब तक पत्नी उसमें शामिल न हो. दाईं ओर बैठकर जब पत्नी पति के दाहिने हाथ को स्पर्श करके संकल्प दिलाती है, तो वह पूजा पूर्ण मानी जाती है.
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