‘रावण की पूजा करते हैं, हमारा गांव भी सोने की लंका जैसा समृद्ध’, 350 साल पुरानी परंपरा

दशहरे के दिन देशभर में रावण के पुतले का दहन किया जाता है. लेकिन अकोला जिले की पातुर तहसील के सांगोला गांव में तस्वीर बिल्कुल अलग है. यहां रावण का पुतला नहीं जलता, बल्कि दस सिरों वाले दशानन की पूजा होती है. गांव के लोग रावण को अपना ग्राम देवता और रक्षक मानते हैं.

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करीब 350 साल से चल रही इस परंपरा में आज भी पूरा गांव शामिल होता है. (Photo: ITG) करीब 350 साल से चल रही इस परंपरा में आज भी पूरा गांव शामिल होता है. (Photo: ITG)

धनंजय साबले

  • अकोला,
  • 19 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:04 PM IST

20 अक्टूबर को दशहरा है. दशहरा आते ही देशभर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं. बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है. लेकिन महाराष्ट्र के अकोला में एक ऐसा गांव भी है, जहां दशहरे पर रावण को जलाया नहीं जाता, बल्कि सिर झुकाकर उसकी पूजा की जाती है. यहां रावण कोई खलनायक नहीं, बल्कि ग्राम देवता के रूप में पूजे जाते हैं. गांव वालों का विश्वास है कि सोने की लंका के राजा रावण की आराधना से उनका गांव भी सोने जैसा समृद्ध हुआ है. करीब 350 साल से चली आ रही इस परंपरा में आज भी पूरा गांव शामिल होता है. आइए जानते हैं कि अकोला के सांगोला गांव के लोग क्यों रावण को अपना रक्षक मानते हैं.

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देश में रावण दहन और सांगोला में रावण पूजन
दशहरे के दिन पूरे देश में रावण के पुतले का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है. लेकिन अकोला जिले की पातुर तहसील के सांगोला गांव में तस्वीर बिल्कुल अलग है. यहां रावण का पुतला नहीं जलता, बल्कि दस सिरों वाले दशानन की पूजा होती है. गांव के लोग रावण को अपना ग्राम देवता और रक्षक मानते हैं. यहां दशहरे के दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, जिसमें पूरे गांव के लोग शामिल होते हैं. इतना ही नहीं, सालभर भी इस प्रतिमा की नियमित पूजा होती है और महिलाएं भी श्रद्धापूर्वक आराधना में हिस्सा लेती हैं.

350 साल पुरानी परंपरा की कहानी
सांगोला में रावण की पूजा की परंपरा करीब 350 साल पुरानी बताई जाती है. स्थानीय मान्यता के मुताबिक, गांव में एक ऋषि महाराज रहा करते थे, जिन्हें ग्रामीण अपना श्रद्धास्थान मानते थे. कहा जाता है कि ऋषि महाराज ने अपने अंतिम समय में ऐसी प्रतिमा स्थापित करने की बात कही, जिसमें दस बिंदु या चिह्न हों. लेकिन मूर्तिकार ने दस मुखों वाली प्रतिमा बना दी, जो रावण जैसी दिखाई देती थी.

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जब इस प्रतिमा को बैलगाड़ी से गांव लाया जा रहा था, तो बैलगाड़ी गांव की सीमा पार नहीं कर सकी. ग्रामीणों ने इसे दैवी संकेत माना और उसी स्थान पर प्रतिमा स्थापित कर दी. तभी से दशमुखी रावण को ग्राम देवता मानकर पूजने की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है. यह गांव की लोकमान्यता है जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी ग्रामीण आगे बढ़ाते आ रहे हैं.

‘हमारा गांव भी सोने की लंका जैसा समृद्ध’
रावण के परम भक्त ज्ञानेश्वर महाराज धाकरे का कहना है कि गांव में रावण की पूजा उसके चरित्र के हर पहलू का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति उसकी भक्ति, आराधना और साधना के सम्मान में की जाती है. उनका कहना है कि रावण सोने की लंका का राजा था. गांव वाले उसकी पूजा करते हैं और उनका विश्वास है कि उनका गांव भी सोने जैसा सुखी और समृद्ध हुआ है. ग्रामीण इस समृद्धि को रावण महाराज की कृपा से जोड़कर देखते हैं.

आस्था, परंपरा और ग्रामीणों का विश्वास
ग्रामीणों का मानना है कि जबसे रावण महाराज की पूजा की परंपरा शुरू हुई, गांव सुख-समृद्धि से जुड़ा रहा है. वे रावण को अपना रक्षक मानते हैं और कहते हैं कि उसकी आराधना से गांव पर संकट नहीं आता है. दशहरे के दिन विशेष पूजा के दौरान ग्रामीण एकजुट होकर अपनी परंपरा निभाते हैं. महिलाओं की भागीदारी भी इस धार्मिक परंपरा का अहम हिस्सा होती है.

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