कोई भी काम शुरू करना हो तो सबसे पहले विघ्नहर्ता के रूप मे श्रीगणेश जी का स्मरण किया जाता है. तब हम उनकी पूजा करते हैं और भोग में उन्हें मोदक चढ़ाते हैं. मोदक को कभी-कभी लड्डू भी समझ लिया जाता है, लेकिन असली मोदक बूंदी या बेसन या मोतीचूर का लड्डू नहीं होता है. यह चावल के आटे से बने पेड़े में गुड़ और नारियल की भरावन से बना हुआ और भाप पर पका हुआ मिष्ठान्न होता है.
लेकिन गणेश जी सिर्फ मोदक प्रिय नहीं हैं, बल्कि वह तो कैंथ का फल और जामुन खाते हैं. उनके एक प्रसिद्ध मंत्र में इसका जिक्र मिलता है. जिसे अक्सर पूजा-पाठ के दौरान कई बार सुना गया होगा. लेकिन कभी इस मंत्र के शब्दों पर गौर किया है? इस छोटे से मंत्र में गणेश जी के स्वरूप और उनकी महिमा के साथ दो फलों का बाकायदा नाम लिया गया है. ये फल हैं कैथा और जामुन.
गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्॥
इसका सरल अर्थ है—गजमुख वाले वे देवता, जिनकी भूत और दूसरे गण सेवा करते हैं, जिन्हें कपित्थ यानी कैथा और जम्बू यानी जामुन के फल बहुत प्रिय हैं, जो देवी उमा के पुत्र हैं और शोक का नाश करने वाले हैं, ऐसे विघ्नेश्वर भगवान गणेश के चरण कमलों में मैं प्रणाम करता हूं.
अब सवाल उठता है कि गणेश जी की इस वंदना में आखिर कैथा और जामुन जैसे फलों का नाम क्यों आया? क्या इन फलों का संबंध केवल भगवान गणेश को लगाए जाने वाले भोग से है या इसके पीछे सेहत से जुड़ा भी कोई संकेत है?
गणेश जी और महाभारत के लेखन की कथा
इस सवाल को समझने से पहले गणेश जी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा को जानना जरूरी है. गणेशजी को महाभारत को लिखने वाला माना जाता है. उन्होंने महर्षि वेदव्यास से सुनकर, जैसा वह बोलते गए वैसा ही इसे लिखने का काम किया था. इस दौरान वह केवल लगातार लिखते रहे. बिना एक शब्द बोले और बिना अपनी जगह से हिले-डुले. गणेश जी ने इस तरह एकाग्र होकर महाभारत का लेखन किया. यहां इशारा लगातार और कई घंटों की सीटिंग पोजिशन की ओर है.
और यहीं से गणेश जी के श्लोक का एक दिलचस्प पक्ष सामने आता है. इस श्लोक में मिठाई, मोदक या लड्डू का नाम नहीं आता, जबकि लोकप्रिय मान्यता में इन्हें गणेश जी का प्रिय भोग माना जाता है. इसके बजाय मंत्र में स्पष्ट रूप से कपित्थ और जम्बू का उल्लेख है. कपित्थ को हिंदी में कैथा कहा जाता है, जबकि जम्बू का अर्थ जामुन है. दोनों ही भारत में प्राचीन समय से मिलने वाले फल हैं और आयुर्वेदिक परंपरा में भी इनका उल्लेख मिलता है.
यानी श्लोक केवल गणेश जी के रूप का वर्णन नहीं करता, बल्कि उनके प्रिय आहार के रूप में प्रकृति से मिलने वाले दो खास फलों को भी सामने रखता है.
कैथा- पेट के लिए महत्वपूर्ण फल
कैथा बाहर से बेहद कठोर और अंदर से मुलायम गूदे वाला फल है. भारतीय खानपान में इसकी चटनी और शर्बत से लेकर कई तरह के व्यंजन बनाए जाते रहे हैं. पारंपरिक चिकित्सा में भी कैथा का अलग महत्व रहा है. कैथा में फाइबर समेत कई पोषक तत्व पाए जाते हैं. पारंपरिक रूप से इसका इस्तेमाल पाचन से जुड़ी समस्याओं में किया जाता रहा है. यही वजह है कि गणेश जी के प्रिय फल के रूप में कैथा का जिक्र उसे संतुलित आहार के संदेश से भी जोड़ती हैं.
जामुन- स्वाद में कसैला, गुणों में खास
गणेश जी के श्लोक में दूसरा फल जम्बू यानी जामुन है. गर्मी और बरसात के मौसम में मिलने वाला यह फल भारतीय खानपान का पुराना हिस्सा है. जामुन में फाइबर और कई प्रकार के प्राकृतिक पौध यौगिक पाए जाते हैं. भारतीय पारंपरिक चिकित्सा में जामुन के फल और बीज का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है.
खासकर ब्लड शुगर या मधुमेह से जुड़े पारंपरिक उपचारों में जामुन के बीज का उल्लेख मिलता है. यही कारण है कि डायबिटीज को लेकर जामुन की चर्चा अक्सर होती है. लेकिन जामुन या उसके बीज को डायबिटीज की दवाओं का विकल्प नहीं माना जा सकता. इसे संतुलित आहार के एक हिस्से के रूप में ही देखना चाहिए.
यहां एक और बात गौर करने वाली है. आज गणेश जी के भोग की बात आते ही सबसे पहले मोदक और लड्डू याद आते हैं. लेकिन इस प्रसिद्ध ध्यान श्लोक में मोदक की जगह कैथा और जामुन का नाम लिया गया है.
यही बात इस श्लोक को और रोचक बनाती है. गणेश जी का स्वरूप भी अपने भीतर कई प्रतीक समेटे हुए माना जाता है, बड़ा मस्तक बुद्धि का, बड़े कान सुनने की क्षमता का और छोटी आंखें एकाग्रता का प्रतीक मानी जाती हैं. उसी तरह उनके आहार में कैथा और जामुन की उपस्थिति को प्रकृति और संतुलित भोजन से जोड़कर भी देखा जा सकता है.
विकास पोरवाल