बेटा नहीं था, इसलिए बेटी को बनाया उत्तराधिकारी... 10 साल की भाविका कंवर का हुआ 'पाग दस्तूर', हाथ में थमाई गई तलवार

राजस्थान में सदियों पुरानी सामाजिक रूढ़ियों को बदले जाने का सिलसिला जारी है. अब नागौर में भी 10 साल की बेटी भाविका कंवर को उसके दिवंगत पिता की जगह 'पाग दस्तूर' की रस्म निभाकर पगड़ी पहनाई गई. पुत्र न होने की स्थिति में अमूमन किसी को गोद (दत्तक पुत्र) लेकर यह रस्म पूरी की जाती थी.

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चार पीढ़ियों बाद 5वीं पीढ़ी की पहचान बनी बेटी.(Photo:ITG) चार पीढ़ियों बाद 5वीं पीढ़ी की पहचान बनी बेटी.(Photo:ITG)

केशा राम गढ़वार

  • नागौर (मेड़ता सिटी),
  • 27 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 4:36 PM IST

राजस्थान की पुरानी परंपराओं को तोड़ते हुए एक परिवार ने लैंगिक समानता की अनूठी मिसाल पेश की है. नागौर के सुरियास गांव में 10 साल की बेटी भाविका कंवर को पारिवारिक पगड़ी पहनाकर उत्तराधिकारी बनाया गया है.

दरअसल, सुरियास गांव निवासी कानसिंह राठौड़ का बीते 15 जुलाई को गंभीर बीमारी के चलते असमय निधन हो गया था. उनके परिवार में उनकी इकलौती संतान 10 वर्षीय पुत्री भाविका कंवर है. रविवार को दिवंगत कानसिंह के बारहवें की रस्म के बाद जब पाग दस्तूर की परंपरा पर विचार-विमर्श शुरू हुआ, तो परिवार के वरिष्ठ जनों मामा शंकरसिंह राजावत और महावीर सिंह सिंगोद ने घर की महिलाओं से राय ली.

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परिवार की महिलाओं का साहसिक फैसला
कानसिंह की मां और पत्नी ने साफ शब्दों में कहा, ''जब बेटी ही हमारे परिवार की इकलौती संतान है, तो उसके होते हुए किसी अन्य को उत्तराधिकारी बनाने का कोई औचित्य ही नहीं है.''

महिलाओं के इस रुख का ननिहाल और पीहर दोनों पक्षों ने खुले दिल से समर्थन किया और 10 वर्षीय भाविका कंवर को पारंपरिक पगड़ी पहनाकर 'पाग दस्तूर' की रस्म पूरे मान-सम्मान से संपन्न कराई.

चार पीढ़ियों बाद 5वीं पीढ़ी की पहचान बनी बेटी
इस परिवार का इतिहास भी अपने आप में अनोखा रहा है. पिछले चार पीढ़ियों से इस परिवार में सिर्फ एक ही पुत्र जन्म लेता आया था. पड़दादा भीमसिंह, दादा उदयसिंह, पितामह भगवानसिंह और पिता कानसिंह. चारों पीढ़ियों में इकलौते पुत्रों के क्रम के बाद, कानसिंह के निधन पर परिवार की पांचवीं पीढ़ी की उम्मीदें और कुल की पहचान अब उनकी इकलौती बेटी भाविका कंवर से जुड़ गई हैं.

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इस मौके पर कुन्दनसिंह, छोटूसिंह सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण और सामाजिक जन मौजूद रहे. सभी ने परिवार के इस निर्णय की सराहना करते हुए इसे समाज के लिए एक नया संकेत बताया. ग्रामीणों ने कहा कि इस कदम से समाज में यह मजबूत संदेश गया है कि वंश, सम्मान और पारिवारिक जिम्मेदारियों को आगे बढ़ाने में बेटियां बेटों से किसी भी मायने में कम नहीं हैं. 

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