नीतीश के आने के बाद बिहार में NDA की मुश्किलें और बढ़ीं, BJP को लेने के देने पड़ सकते हैं

नीतीश कुमार के एनडीए में शामिल होने के बाद बीजेपी जितनी मजबूत हुई है उतनी ही बिहार में उसकी परेशानियां भी बढ़ गईं हैं. जनता के नाराज होने की बात तो छोड़िए साथी दलों की डिमांड पूरा करना हो गया है मुश्किल.

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बिहार में एनडीए के घटक दल नीतीश के आने से चिंतित बिहार में एनडीए के घटक दल नीतीश के आने से चिंतित

संयम श्रीवास्तव

  • नई दिल्ली,
  • 30 जनवरी 2024,
  • अपडेटेड 6:27 PM IST

बिहार में जेडीयू के मुखिया और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के एनडीए में आने के बाद माना जा रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी का यह मास्टर स्ट्रोक है. राजनीतिक विश्वेषकों का कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनावों की तरह इस बार भी विपक्ष का पत्ता साफ होना तय है.इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि नीतीश कुमार के आने से बिहार में बीजेपी मजबूत हुई है. पर इसमें भी कोई 2 राय नहीं है कि एनडीए की मुश्किलें यहां पर दोगुनी हो गईं हैं जो समय परअगर नहीं सुलझाईं गईं तो बीजेपी को लेने के देने भी पड़ सकते हैं.एनडीए अब 2019 वाली नहीं है. जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान की महत्वाकांक्षाओँ को अगर बीजेपी शांत नहीं कर सकी तो नीतीश कुमार का दांव उल्टा पड़ सकता है.

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एनडीए में साथियों की संख्या बढ़ने से दिक्कतें बढ़ीं 

बिहार में 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी और जेडीयू ने 17-17 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा था. 6 सीटें लोजपा को मिलीं थीं. पर इस बार साथी दलों की संख्या बढ़ गई हैं.नए साथियों में उपेंद्र कुशवाहा का राष्ट्रीय लोक जनता दल, जीतन राम मांझी का हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा और लोकतांत्रिक जनशक्ति पार्टी के 2 हिस्से ( चिराग पासवान और पशुपति पारस) भी अब एनडीए के ही हिस्से हैं. जाहिर है कि सभी को सीट चाहिए. इसके साथ ही इस बार बीजेपी की कोशिश होगी कि वो पिछली बार से अधिक सीटों पर चुनाव लड़े.अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर बीजेपी को इन तमाम दलों के साथ समझौता कर साथ ले चलने का मकसद नहीं रह जाएगा.पिछली बार से अधिक सीटों पर लड़ने का मतलब है कि सहयोगी दलों का नाराज करना, क्योंकि बिना सहयोगी दलों का सीट काटे यह नामुमकिन है. नीतीश कुमार को पिछले बार की सीटों से कम संख्या पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना और चिराग पासवान की सीटों को पशुपति पारस के बीच बांटने पर बवाल होना तय है.

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2019 के लोक सभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी को एनडीए गठबंधन में एडजस्ट करने के लिए भाजपा को बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी थी.बीजेपी ने अपने पांच सिटिंग सांसदों का टिकट काटकर उन सीटों को जेडीयू को देना पड़ा था. लेकिन इस बार सहयोगियों की संख्या ज्यादा है और भाजपा का मुंह भी बड़ा हो गया है. भाजपा चिराग पासवान और पशुपति पारस को एक सीट कम में मनाने की कोशिश कर सकती है. नीतीश कुमार को भी पिछली बार के 17 सीटों की तुलना में इस बार एक सीट कम यानी 16 सीटों पर राजी करने की कोशिश होगी. उपेंद्र कुशवाहा को भी 3 की बजाय 2 पर ही मनाने का प्रयास किया जाएगा. जीतन राम मांझी अगर लोक सभा चुनाव लड़ने पर अड़ गए तो बीजेपी को अपने दो सिटिंग सांसदों की कुर्बानी देनी पड़ेगी. पोस्ट पोल एलायंस की आशंका को देखते हुए यह बीजेपी के लिए काफी महंगा सौदा साबित हो सकता है.

चिराग पासवान को साधना मुश्किल होगा

एनडीए गठबंधन में नीतीश कुमार के आने का सबसे अधिक विरोध और नाखुशी चिराग पासवान को ही है. नीतीश के एनडीए गठबंधन में शामिल होने के चलते उन्होंने अमित शाह और जेपी नड्डा से बात कर यह संदेश दे दिया है कि उनके कोटे की सीटों में कटौती नहीं होनी चाहिए. एनडीए के बैनर तले भाजपा ने पासवान की पार्टी को 2014 के लोक सभा चुनाव में 7 सीटें दी थी जिसमें से पार्टी के 6 सांसद चुनाव जीते थे. वहीं, 2019 के लोक सभा चुनाव में पासवान की पार्टी को लोक सभा की 6 सीटें दी गयी थी और एक सीट की भरपाई रामविलास पासवान को राज्य सभा भेज कर किया गया था.

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चिराग पासवान अपने चाचा, चचेरे भाई और अन्य सांसदों के अलग होने के बावजूद 7 के फ़ॉर्मूले पर अड़े हुए हैं और साथ ही हाजीपुर लोक सभा सीट भी चाहते हैं.बताया जा रहा है कि गृहमंत्री अमित शाह और बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ करीब डेढ़ से 2 घंटे चली बैठक में चिराग पासवान ने कहा, 'एलजेपी (रामविलास पासवान) बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट की नीति पर काम करना चाहती है. कहा जा रहा है कि उन्होंने क्लीयर कर दिया है कि हमारी सीटें कम नहीं होनी चाहिए.' राजनीतिक गलियारों में यह बात कही जा रही है कि अगर ऐसा नहीं होता है तो चिराग पासवान की पार्टी बिहार में 23 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ सकती है. चिराग पासवान के पास बिहार में 6 प्रतिशत एकमुश्त पासवान वोट हैं. जो कई लोकसभा सीटों पर निर्णायक हैसियत रखते हैं.

तेजस्वी से बातचीत होने के बारे में चिराग ने पिछले दिनों कहा था कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. लेकिन मैं बहुत स्पष्ट हूं कि मैं एनडीए गठबंधन में हूं.चिराग कह रहे हैं कि हमें पहले भी धोखा दिया गया है.पशुपति पारस हमारे कोटे में नहीं हैं, वे बीजेपी के साथ समझौता कर सकते हैं. यह उनकी समस्या है हमारी नहीं. मतलब साफ है कि अगर चिराग महागठबंधन की ओर जाते हैं तो यह बीजेपी के के लिए और खतरनाक हो सकता है.

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उपेंद्र कुशवाहा की आशंका भी सही है

उपेंद्र कुशवाहा भी अब एनडीए का हिस्सा हैं. कुछ दिनों पहले तक वो नीतीश के साथ थे.कुशवाहा के मन में नीतीश कुमार को लेकर अभी भी शंका है.उसकी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. नीतीश कुमार की वापसी के पहले कुशवाहा ने कहा था कि बिहार के लोगों के मन में आशंका है. नीतीश कुमार एनडीए में आ गए और एनडीए के मतदाताओं के आशीर्वाद से उनके लोग भी चुनाव जीत गए तो फिर से जीतकर महागठबंधन में ना चले जाएं, इस बात की क्या गारंटी है. इस गारंटी को पहले सुनिश्चित किया जाए़.

दरअसल उपेंद्र कुशवाहा की बात में दम है. जिस तरह नीतीश कुमार आरजेडी और कांग्रेस को लेकर सॉफ्ट दिख रहे हैं इससे शक होना स्वभाविक है. कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी नीतीश कुमार के खिलाफ कुछ बोलने से बच रहे हैं. राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा बिहार में प्रवेश की है. पर राहुल गांधी ने नीतीश कुमार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला है. उनके निशाने पर केवल बीजेपी ही है. कहीं न कहीं से ये बात सबके दिमाग में चल रहा है कि अगर लोकसभा चुनावों के बाद एनडीए की संख्या कम होती है तो पोस्ट पोल एलायंस में नीतीश कुमार खेला कर सकते हैं.

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