चीनी फिर VIP हो गई! कभी बेफिक्र होकर डालते थे, अब सोचकर डालेंगे

त्योहारों के मौसम में चीनी के बढ़ते दामों ने रसोई की इस साधारण चीज को फिर वीआईपी बना दिया है. कभी राशन की लिस्ट में सबसे आखिर में आने वाली चीनी अब घरेलू बजट से लेकर सरकार की चिंता तक का हिस्सा बन गई है. कीमतों की तेजी के बीच मिठाई महंगी होने का डर भी है. यानी इस बार त्योहारों में मिठास रहेगी, लेकिन उसका हिसाब भी रखना पड़ेगा.

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कल तक चीनी सिर्फ चीनी थी. आज वह बाजार की खबर है. सरकार की चिंता है. (Photo- ITG) कल तक चीनी सिर्फ चीनी थी. आज वह बाजार की खबर है. सरकार की चिंता है. (Photo- ITG)

राहुल चौहान

  • नई दिल्ली,
  • 27 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 6:29 AM IST

घर की रसोई में चीनी की हैसियत बहुत मामूली हो गई थी. चाय बनानी है तो चीनी डाल दी. मेहमान आ गए तो दो चम्मच ज्यादा डाल दी. बच्चे ने दूध पीने से मना किया तो उसमें एक चम्मच चीनी मिला दी. खाना खाने पर मिर्च लग गई तो चीनी खा ली. चीनी कोई धर्म नहीं देखती, जाति नहीं देखती. खुशी का मौका हुआ तो हर किसी ने मुंह मीठा कर लिया. 

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यानी चीनी हमारी जिंदगी में हमेशा से खास थी, बस उसे वीआईपी ट्रीटमेंट नहीं मिला. किसी ने कभी नहीं पूछा कि घर में चीनी कितनी बची है. 

चीनी थी भी ऐसी चीज, जिसका डिब्बा रसोई के किसी कोने में पड़ा रहता था. राशन की लिस्ट बनती तो दाल, चावल, आटा, तेल-मसाले पहले जगह घेर लेते और चीनी का नाम आखिर में आता. लेकिन चीनी ने एक बार फिर अपनी औकात बढ़ा ली है. अब वह रसोई की सामान्य सदस्य नहीं रही. वह फिर से वीआईपी हो गई है.

आलम ये है कि आने वाले त्योहारों से पहले चीनी का भाव देखकर लगता है कि मिठाई बनाने और मेहमानों को बुलाने से पहले परिवार की वित्तीय समिति की बैठक बुलानी पड़ेगी. एक किलो चीनी खरीदने से पहले शायद यह तय करना पड़े कि इस महीने बिजली का बिल थोड़ा देर से भर दें या चाय में चीनी थोड़ी कम कर दें.

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आज की जेन-जी पीढ़ी को यह जानकर सचमुच हैरानी होगी कि एक दौर ऐसा भी था, जब चीनी बाजार में पूरी तरह आजाद नहीं थी. सत्तर और अस्सी के दशक तक यह मिठास सरकारी कोटे की दुकानों में बाकायदा वाआईपी सुरक्षा में रहती थी. आम आदमी के लिए सस्ती चीनी खरीदना कोई मामूली किराना-कार्य नहीं, बल्कि सरकारी नियमों, राशन कार्ड और लंबी लाइन से गुजरने वाला अभियान था.

उस दौर में चीनी का रुतबा इतना वीआईपी था कि आम घरों में रोजमर्रा की चाय गुड़ से बनती थी. चीनी वाली चाय सिर्फ खास मेहमानों, बड़े अफसरों या ऐसे रिश्तेदारों के लिए बचाकर रखी जाती थी, जिनसे परिवार को भविष्य में कोई काम पड़ सकता हो. यानी गुड़ आम आदमी की मिठास था और चीनी घर की कूटनीति. किसान खेत में गन्ने के सही दाम के लिए संघर्ष करता था और आम आदमी कोटे की दुकान पर चीनी के लिए. 

शादी-ब्याह में तो चीनी जुटाना किसी सरकारी परियोजना से कम नहीं था. मिठाई बनवाने के लिए चीनी चाहिए तो गांव के प्रधान से लेकर ब्लॉक अधिकारी तक अर्जियां लगती थीं. शादी का कार्ड प्रमाण के तौर पर लगाना पड़ता था, मानो सरकार यह जांच रही हो कि सचमुच शादी हो रही है या परिवार सिर्फ चाय मीठी करने की साजिश कर रहा है.

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तब शादी में रिश्तेदार सिर्फ नाचने और खाना खाने नहीं आते थे, कुछ लोग अपना राशन कार्ड भी साथ लाते थे. रिश्तेदारी की असली परीक्षा यही थी कि कौन शादी में आया और कौन चीनी के इंतजाम में काम आया.

जरा सोचिए, जिस चीज के लिए कभी प्रधान, ब्लॉक अधिकारी और राशन कार्ड की जरूरत पड़ती थी, वही चीनी बाद में बाजार में खुली घूमने लगी. डिब्बे में आई, चाय में घुली और धीरे-धीरे घर की सामान्य सदस्य बन गई. लोग उसे बिना हिसाब के डालने लगे.

लेकिन इतिहास को शायद मिठास ज्यादा दिन तक मुफ्त में देना मंजूर नहीं था.

चीनी ने एक बार फिर अपना सामाजिक दर्जा बढ़ा लिया है. कभी वह मिर्च-मसालों के साथ राशन की लिस्ट में खड़ी रहती थी. फिर धीरे-धीरे जरूरी सामान बनी. और अब महंगे सामानों की कतार में पहुंच गई है. अगला प्रमोशन शायद ड्राई फ्रूट्स के साथ वाली सीट पर बैठने के लिए हो.

भारत में शक्कर को ‘चीनी’ कहने की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है. शुरुआती शक्कर का रंग भूरा होता था. चीन के सम्राट को यह रंग पसंद नहीं आया. उन्होंने रंग बदलने का फरमान जारी किया. बस, फिर रंग बदला गया और क्रिस्टल जैसी साफ रिफाइंड शुगर तैयार हुई. ब्रिटिश दौर में जब बंगाल में रिफाइंड शुगर की मिलें लगीं, तो शुरुआत में चीन के कारीगर क्रिस्टल शक्कर बनाने में मदद करते थे. धीरे-धीरे क्रिस्टल वाली शक्कर भारतीयों के बीच ‘चीनी’ कहलाने लगी.

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यानी चीनी का नाम भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग से बना और उसका रुतबा भी अंतरराष्ट्रीय बाजार से बढ़ा. आज वही चीनी फिर घरेलू बजट की विदेश नीति तय कर रही है.

चीनी के भाव में हालिया तेजी ने उसे अचानक उस श्रेणी में पहुंचा दिया है, जहां कभी सोना, पेट्रोल और प्याज हुआ करते थे. फर्क बस इतना है कि सोने के दाम देखकर आदमी खरीदने का सपना छोड़ देता है, प्याज के दाम देखकर सब्जी बदल देता है और चीनी के दाम देखकर चाय का स्वाद.

त्योहारों का मौसम आने वाला है. गणेश चतुर्थी, दशहरा, दिवाली... यानी मिठाइयों का मौसम. लेकिन इस बार मिठाई की दुकान पर जाने से पहले जेब को मानसिक रूप से तैयार करना पड़ेगा. देश के कई बाजारों में चीनी की खुदरा कीमत 60-70 रुपये किलो तक पहुंच गई है.

सरकार भी समझ गई है कि मामला सिर्फ चाय में आधा चम्मच चीनी कम करने तक सीमित नहीं है. त्योहारों में मांग बढ़ेगी, मिठाई महंगी होगी और आम आदमी का बजट फिर वही पुराना सवाल पूछेगा त्योहार मनाएं या खर्चों का शोक मनाएं. इसीलिए सरकार ने चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है. बड़े खरीदारों के लिए स्टॉक रखने की सीमा भी तय की गई है. 

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यानी चीनी अब इतनी महत्वपूर्ण हो गई है कि उसके लिए सरकार बैठक कर रही है, कारोबारी स्टॉक गिन रहे हैं और आम आदमी रसोई में डिब्बा देखकर अनुमान लगा रहा है कि अगली तनख्वाह तक मिठास बचेगी या नहीं.

कभी चीनी को भी नहीं पता रहा होगा कि उसके अच्छे दिन ऐसे आएंगे.

पहले लोग दुकानदार से पूछते थे कि भैया, चीनी कितने की है? अब सवाल होगा कि चीनी कितने की है और उधार में कितनी देंगे?

हो सकता है जल्द ही किराना दुकानदार चीनी बेचते समय ग्राहक से पहचान पत्र तक दिखाने को कहने लगे और सवाल पूछें कि इतनी चीनी का करेंगे क्या?

वहीं मिठाई वाले की परेशानी अलग है. उसके सामने सबसे बड़ा सवाल है कि मिठाई कितनी महंगी करे. चीनी महंगी है, दूध महंगा है, मावा महंगा है, ड्राई फ्रूट महंगे हैं, गैस महंगी और मजदूरी का अपना हिसाब है. लेकिन ग्राहक को तो वही पुरानी मिठाई चाहिए, वो भी उसी पुराने भाव में.

और यहीं से भारतीय त्योहारों का सबसे बड़ा संकट शुरू होता है. त्योहार में मिठाई बांटनी है, लेकिन मिठाई का डिब्बा अब बजट बिगाड़ने की क्षमता रखने लगा है. हो सकता है इस बार रिश्तेदारों को मिठाई देते हुए लोग कहें कि डिब्बा संभालकर रखना, अंदर मिठाई से ज्यादा महंगाई है.

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कुछ लोग शायद एक किलो की जगह 500 ग्राम मिठाई खरीदें और दुकानदार से आग्रह करें कि भाई साहब, डिब्बा बड़ा रखना. आखिर त्योहार में डिब्बा बड़ा दिखना भी तो जरूरी है. मिठाई कम हो सकती है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा का पैकेजिंग बजट नहीं.

वैसे मिठाई वाले भी कोई कम कलाकार नहीं हैं. चीनी महंगी हुई है तो अब मिठाई का आकार थोड़ा छोटा हो सकता है. 20 रुपये में पहले रसगुल्ला जितना बड़ा था, अब थोड़ा फिटनेस पर ध्यान देता दिखाई दे सकता है. गुलाब जामुन भी कैलोरी बचाने के नाम पर सिकुड़ सकता है. जलेबी की गोलाई शायद वही रहे, लेकिन उसके घुमावों के बीच की दूरी बढ़ जाए. और जब ग्राहक पूछेगा कि भाई, जलेबी इतनी पतली क्यों है?

तो जवाब आएगा कि सर, आजकल लोग हेल्थ कॉन्शियस हैं.

...और इसी तरह महंगाई हर चीज को स्वास्थ्य से जोड़ देती है.

कल तक मिठाई में चीनी कम होने पर दुकानदार सफाई देता था कि स्वाद हल्का रखा है. अब वह कहेगा कि सर, यह लो-शुगर प्रीमियम रेंज है.

चीनी के दाम बढ़ने की वजहों पर भी चर्चा है. सरकार ने साफ किया है कि मौजूदा तेजी को सिर्फ एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल से जोड़ना सही नहीं है. उत्पादन अनुमान से कम रहने, मौसम से जुड़ी दिक्कतों और बाजार के अन्य कारणों ने कीमतों पर दबाव बढ़ाया है. 

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लेकिन आम आदमी को इन आर्थिक शब्दों से ज्यादा मतलब अपने चाय के कप से है. उसे बस इतना पता है कि पहले एक किलो चीनी खरीदने पर जेब को खास फर्क नहीं पड़ता था. अब फर्क चाय के स्वाद से पहले बजट में दिखाई देता है.

वैसे चीनी के वीआईपी बनने का एक फायदा भी है. अब शायद घर में चीनी के डिब्बे की सुरक्षा बढ़ जाएगी. पहले कोई भी मेहमान रसोई में जाकर चाय बना लेता था. अब हो सकता है कि घर का कोई सदस्य पीछे से आवाज लगाए कि जरा रुकिए, चीनी मैं निकाल देता हूं.

टेंशन की बात तो ये है कि कहीं ऐसा न हो आने वाले दिनों में घरों में चीनी के लिए भी तिजोरी की जरूरत पड़ जाए. जैसे सोने की चेन लॉकर में, जरूरी कागज अलमारी में और चीनी रसोई के सबसे सुरक्षित खाने में. बच्चों को रोज का कोटा मिलेगा. मेहमानों के लिए चाय में चीनी डालने से पहले अनुमति ली जाएगी. और अगर कोई रिश्तेदार बिना बताए आ गया, तो उसे फीकी चाय देकर समझाया जाएगा कि देश कठिन आर्थिक दौर से गुजर रहा है.

यही वजह है कि कल तक चीनी सिर्फ चीनी थी. आज वह बाजार की खबर है. सरकार की चिंता है. मिठाई वाले की 'लागत' है. गृहिणी का बजट है. और आम आदमी की चाय का स्वाद. 

खैर त्योहार आखिर त्योहार है. मिठाई बनेगी, चाय बनेगी, मेहमान आएंगे और लोग एक-दूसरे का मुंह मीठा कराएंगे. इसलिए अगर इस बार त्योहार पर कोई आपके घर आए और आप उसे चाय का कप दें, तो उसमें चीनी कितनी है, इस पर ध्यान मत दीजिएगा. बस इतना समझ लीजिए, चाय में चीनी भले कम हो गई हो, लेकिन उसकी हैसियत वीआईपी हो गई है.

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