शरजील बनाम इब्न खल्दून, और लिबरल्स का तमाशा 'बेनकाब’

इब्न खल्दून के छद्म नाम से लिखे गए एक लेख ने भारतीय राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. शरजील इमाम के कट्टरपंथी विचारों और संविधान विरोधी बयानों की आलोचना करने वाले इस लेख के बाद लेखक की पहचान उजागर करने की मांग तेज हो गई है.

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इब्न खल्दून नाम के एक शख्स ने शरजील इमाम पर लेख लिखा. (Photo- ITGD) इब्न खल्दून नाम के एक शख्स ने शरजील इमाम पर लेख लिखा. (Photo- ITGD)

कमलेश सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 22 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:26 AM IST

इब्न खल्दून एक जाने-माने आलिम, इतिहासकार और फिलॉसफर थे, जिन्हें आधुनिक समाजशास्त्र का जनक माना जाता है. वे हर चीज को, यहां तक कि मजहब को भी, पूरे ठंडे दिमाग और लॉजिक से देखते थे. उनके सिद्धांतों में एक विचार यह भी है कि हुकूमतें या सल्तनतें अपनी तीसरी पीढ़ी आते-आते कमजोर होने लगती हैं. उनका तर्क था कि हुकूमतों की एक कुदरती लाइफ साइकिल होती है जो लगभग तीन पीढ़ियों तक चलती है.

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यह सिद्धांत आज भी सटीक बैठता है. कुछ लोग मजे लेते हुए इसे अब प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल पर भी लागू कर रहे हैं. है ना मजेदार बात? लेकिन उनका असली कारनामा है 'मुकद्दिमा' नाम की किताब. मध्यकाल की एक ऐसी दुर्लभ रचना, जिसमें समाज के अध्ययन से मजहबी जज्बातों को बिल्कुल दूर रखा गया है.

भारत में एक शख्स ने इस महान आलिम के पेन नेम (छद्म नाम) को अपनाकर जीने की कोशिश की है. उनका नाम है- इब्न खल्दून भारती. उन्होंने हाल ही में एक लेख लिखा, जो कि शरजील इमाम के उस हालिया इंटरव्यू की आलोचना था, जिसमें उन्होंने भारतीय संविधान, सेक्युलरिज्म और देश के बुनियादी उसूलों पर सवाल उठाए थे.

इस पर बहुत तेज और तीखे रिएक्शन आए. चारों तरफ इस बात पर हंगामा मच गया कि एक गुमनाम लेखक को आखिर उस विचारक की आलोचना करने की इजाजत कैसे दी गई जो फिलहाल ’अपने राजनीतिक विचारों की वजह से जेल में है.’

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इब्न खल्दून भारती का नकाब उतारने की यह जिद पूरी तरह बेईमानी है. पेन नेम यानी तखल्लुस इसीलिए होते हैं ताकि लोग बिना किसी डर के दबी-कुचली रूढ़ियों और सोच को चुनौती दे सकें. वह कोई पत्रकार नहीं हैं. खबरों के मुताबिक वह सरकारी सेवा में हैं, जिससे किसी भी तरह का खुलासा करना और मुश्किल हो जाता है. उनकी पहचान सामने आने से लोग एक अधिकारी के तौर पर उनके काम को अलग नजरिए से देखने लगेंगे.

जो लोग इस्लामी उसूलों की आलोचना करने वाले एक लेखक के बारे में पूछ रहे हैं, वे खुद उस विचारधारा पर बात क्यों नहीं करना चाहते? बहस सबके सामने है. उसका जवाब दीजिए या मान लीजिए कि आप जवाब नहीं दे सकते. उनकी निजी जानकारी मांगने के बजाय एक अदद लेख लिखकर उसका जवाब दीजिए.

सबसे पहली बात तो यह है कि किसी को भी सिर्फ बोलने की वजह से जेल में नहीं डाला जाना चाहिए, चाहे उसकी बातें कितनी भी जहरीली क्यों न हों. ना ही ट्वीट्स के लिए, ना भाषणों के लिए, और ना ही ’सिस्टम’ के खिलाफ निकाली गई किसी भड़ास के लिए. शरजील की कैद को बहुत लंबा वक्त हो गया है, और उनकी इस तकलीफ को राजनीतिक ज्यादती के सबूत के तौर पर भुनाया जा रहा है.

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जिन मुस्लिम बुद्धिजीवियों और तथाकथित लिबरल्स ने इस ओपिनियन पीस के खिलाफ तलवारें खींच ली थीं, उन्हें खुद अपने गुस्से की असली वजह देखनी चाहिए. उन्हें किस बात पर ज्यादा गुस्सा आ रहा है- इस बात पर कि उस लेख में शरजील के सांप्रदायिक एजेंडे की पोल खोली गई, या इस बात पर कि लेखक ने अपनी पहचान गुप्त रखी है?

बाकी दिनों में यही लोग दूर-दूर से आने वाले किसी भी इशारे को भांप लेते हैं और किसी भी व्हिसलब्लोअर को बचाने के लिए तैयार खड़े रहते हैं. हालांकि, इसके बावजूद शरजील का लंबे समय से जेल में रहना किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता. ये दोनों बातें अपनी जगह सच हो सकती हैं. लेकिन उन लोगों के लिए यह बात पचाना मुश्किल है जिन्हें सिर्फ एक ही तरह के गुस्से की लत लगी हुई है.

हमें बारीकियों की आम खींचतान से बख्शिए. असली बारीकी यह है कि शरजील एक पक्के मुसलमान हैं जो इतिहास, समाजशास्त्र और राजनीति की गहरी समझ रखते हैं और बौद्धिक वर्ग के सामने मजबूती से अपनी बात रख सकते हैं. यह मेल मुस्लिम बुद्धिजीवियों और गैर-मुस्लिम लिबरल्स के सिलेबस से बाहर की चीज है.

शरजील की सोच के मुताबिक, एक सच्चा मुसलमान गैर-इस्लामी देश में रहते हुए वैचारिक कसमसाहट का शिकार होता है. उनकी समझ कहती है कि उनका मजहब उन्हें उन जगहों से हिजरत करने का हुक्म देता है जिन पर गैर-मुसलमानों की हुकूमत हो. ’क्या अल्लाह की जमीन इतनी बड़ी नहीं थी कि तुम वहां हिजरत कर लेते?’

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इस्लाम में 'शिर्क' से बड़ा कोई गुनाह नहीं है. जब खुदा के साथ किसी को साझीदार ठहरा दिया जाए. जरा देखिए कि शरजील किसे सबसे बड़ा गुनाह मानते हैं: राष्ट्रवाद, भौतिकवाद, सेक्युलरिज्म, उदारवाद और मानवतावाद. साल 2026 के हिसाब से यह बात बहुत आगे की लगती है. लेकिन फिर भी यह एक वैचारिक बहस तो है. पूरी तरह मजहबी ही सही. और एक भारतीय नागरिक को संविधान ने यह हक दिया है कि वह अपनी बात रख सके. अगर आप इसे सुनना नहीं चाहते? तो यह आपकी बदकिस्मती है.

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और लिबरलों के लिए तो यह और भी बुरा है. यहीं आकर उनकी तबीयत खराब होने लगती है. उन्हें इस विचारधारा से उतनी तकलीफ नहीं है, जितनी इस बात से है कि शरजील इसे बिना किसी लाग-लपेट के साफ-साफ कह देते हैं. इस्लाम के कई दूसरे स्कूल ऑफ थॉट विशुद्ध रूप से मजहबी आधार पर उनकी इस सोच को खारिज करते हैं. इस्लाम कोई एक ढर्रे की चीज नहीं है, भले ही रूढ़िवादी लोग इसे वैसा ही पेश करने की कोशिश करें.

अलग-अलग लोग एक ही आयत के अलग-अलग मतलब निकालते हैं. कुरान के अंतिम और अटल होने की बात मानने के बाद भी, लगभग हर विचार को सही ठहराने या खारिज करने की गुंजाइश हमेशा रहती है. लिबरल्स उन बातों और अर्थों को नजरअंदाज करना पसंद करते हैं जो उन्हें सूट नहीं करते.

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शरजील इमाम उदारवादियों के लिए एक डरावना सपना इसलिए हैं क्योंकि वे सार्वजनिक रूप से वह बात कह देते हैं जिसे कहने में सरकार के कई पैरोकार निजी तौर पर भी डरते हैं. शरजील किसी पारंपरिक दाढ़ी-टोपी वाले मौलाना की तरह नहीं दिखते, फिर भी वैसी ही बातें बोलते हैं. इस पर एक स्वाभाविक हैरानी है, या फिर उसका नाटक.

शरजील एक अलग किस्म के आलिम हैं, और जिनकी बातें उन लिबरल्स के लिए बहुत तीखी हैं जो हर बहस के लिए अपनी जेब में कोई न कोई सूफी शेर तैयार रखते हैं. जब उनसे दबाव डालकर पूछा जाता है, तो वे यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि उन्हें समझने के लिए क्रिटिकल थ्योरी और न जाने क्या-क्या पढ़ना पड़ेगा.

संविधान को फासीवादी बताना, सेक्युलरिज्म को एक धोखा कहना, और लोकतंत्र को मुसलमानों को उनके ’खुदाई हक’ से वंचित करने का जरिया बताना कोई क्रिटिकल थ्योरी नहीं है. यह नई सदी के हिसाब से बदली हुई टू-नेशन थ्योरी है. जिस यूनिवर्सिटी से यह सिद्धांत निकला था, अब वह भारत की एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है. उसके संस्थापक सर सैयद अहमद को उनकी जयंती पर ससम्मान याद किया जाता है. और दक्षिणपंथी राजनीति से आने वाले प्रधानमंत्री भी उन्हें श्रद्धांजलि देना नहीं भूलते.

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भारत हमेशा से ऐसा ही रहा है. भारत आज भी ऐसा ही है. शरजील उस भारत को असहज कर देते हैं जो इस विरोधाभास को बहुत ही शानदार तरीके से संभालता आया है.

शरजील भारतीय स्टेट के खिलाफ मुस्लिम युवाओं को कट्टर बनाने की कोशिश करते हैं. इसके जवाब में उन हिंदू युवाओं में भी नफरत और गुस्सा बढ़ने लगता है जो देश-विदेश के ऑनलाइन कंटेंट की वजह से पहले से ही खतरनाक लेवल पर गुस्सा पाल रहे हैं. सांप्रदायिकता एक ऐसा कारोबार है जहां विरोधी दल भी एक-दूसरे के धंधे में खुशी-खुशी मदद करते हैं.

सांप्रदायिक सोच वाले लोगों को शरजील की ये खतरनाक बातें बहुत पसंद आती हैं. लिबरल्स को शरजील के कट्टरपन से उतना डर नहीं लगता, जितना इस बात से कि कहीं दक्षिणपंथी ताकतों को आगे चलकर यह कहने का मौका न मिले कि ’हमने तो आपको पहले ही चेताया था.’

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शरजील 2020 से दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मामले में जेल में बंद हैं. इस पूरी कानूनी प्रक्रिया में बहुत देर हुई है. किसी को लंबे समय तक बिना ट्रायल कैद में रखना गलत है. हालांकि, उन पर लगे आरोप सिर्फ उनके विचारों को लेकर नहीं हैं, बल्कि दंगों से जुड़ी आपराधिक साजिश का हिस्सा होने के हैं. इससे वे कोई पूरी तरह शुद्ध राजनीतिक कैदी नहीं बन जाते. असली समस्या हमारा बेहद सुस्त जस्टिस सिस्टम है, न कि भारत के लोकतंत्र के प्रति शरजील की नफरत का बचाव करना.

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दुनिया के बाकी हिस्सों में जहां हालात बहुत खराब हैं, वहीं भारत आज भी अलग-अलग धर्मों के लोगों को साथ लेकर चल रहा है. हम इसे शोरगुल के साथ, थोड़ी बेढंगे तरीके से और कई बार भ्रम में रहकर ही सही, लेकिन एक संतुलन बनाकर चला रहे हैं. मुसलमानों के भीतर से उठने वाले विरोध की आवाज को दबाने से बचना इसी संतुलन को बनाए रखने का एक हिस्सा है. इब्न खल्दून भारती का असली नाम ढूंढने से यह सारा संतुलन बिगड़ जाता है.

भारत में शरजील जैसे एक्स्ट्रा-मजहबी मुसलमान हैं और वैसे ही एक्स्ट्रा-प्रेक्टिसिंग हिंदू भी. ये दोनों उस सामाजिक ताने-बाने के किनारों पर बैठते हैं जिस पर हमें बहुत गर्व है. इसके अलावा, शरजील अकेले नहीं हैं. उन्हें उन शैंपेन पीने वाले लिबरल्स का भी समर्थन मिल जाता है जो उनके विचारों से कतराते तो हैं, लेकिन यह मांग नहीं करते कि वे अपनी बात वापस लें. यह वही तबका है जो एक तरफ तो शाम की पार्टी में कटी हुई स्कर्ट पहनता है और दूसरी तरफ यह जिद करता है कि छोटी बच्चियों को स्कूल में बुर्का पहनने का हक है, बशर्ते मां-बाप राजी हों.

जहां दूसरे लोगों को इसमें पितृसत्ता की निशानी दिखती है, वहीं इन्हें इसमें महिलाओं की मर्जी नजर आती है. बाकी जगहों पर वे पितृसत्ता को कुचलना चाहते हैं. लंबे समय से विचारों का नामकरण करने का अधिकार इन्हीं के पास है. और वे अपनी सुविधा के हिसाब से लेबल बांटते आए हैं.

कोई हैरानी की बात नहीं है कि वे इब्न खल्दून का असली नाम जानना चाहते हैं, जिसने वह ओपिनियन पीस लिखा. ताकि संकीर्ण सोच वाली भीड़ उसे बुरा-भला कह सके. और लिबरल्स इस बात की निंदा करें कि ’इस्लाम इसकी इजाजत नहीं देता.’ इसीलिए यह मांग उठती है कि ’इब्न खल्दून को बेनकाब करो’.

आखिरी बात वही है जो पहले थी. शरजील इमाम का ट्रायल आगे बढ़ना चाहिए. यह उनके लिए भी अच्छा है और बाकी सबके लिए भी, सिवाय उन लोगों के जो चिल्ला रहे हैं- ’आईडी दिखाओ’. और कल फिर किसी और की पहचान की सुरक्षा मांगने आ जाएंगे.

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