भारत रत्न लालकृष्ण आडवाणी जी आज अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं. इस बार उनका जन्मदिन दीपावली के पावन पर्व के साथ आया है. प्रभु श्रीराम और दीपों से जुड़ा यह पर्व ऐसे समय में विशेष महत्व रखता है, जब हम भारतीय जनसंघ की स्थापना के 75 वर्ष, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती और हाल ही में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर को भी स्मरण कर रहे हैं.
आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही होते हैं, जिनका जीवन अनेक महत्वपूर्ण घटनाक्रमों और बदलावों का साक्षी रहा हो. आडवाणी जी का जीवन भी ऐसे ही विविध अनुभवों और ऐतिहासिक पड़ावों से होकर गुजरा है. 8 नवंबर, 1927 को देव दीपावली के दिन जन्मे आडवाणी जी ने वर्ष 1947 में विभाजन की त्रासदी के बीच सिंध में अपना परिचित संसार छोड़ने का दर्द झेला. लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के प्रति कोई कटुता रखे बिना नए सिरे से जीवन की शुरुआत की. विपरीत परिस्थितियों में शून्य से निर्माण करने की यही क्षमता उनके व्यक्तित्व का स्थायी गुण बनी रही. जनसंघ को मजबूत करने से लेकर भारतीय जनता पार्टी को एक सशक्त राजनीतिक संगठन के रूप में खड़ा करने तक, इसकी झलक लगातार देखने को मिली.
भाजपा अध्यक्ष के रूप में उनके कार्यकाल में पार्टी ने महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धियां हासिल कीं. वर्ष 1989 में कांग्रेस की सीटें 400 से घटकर 200 से नीचे आ गईं और 1996 में भाजपा पहली बार लोकसभा में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी. आडवाणी जी ने न केवल पार्टी को मजबूत वैचारिक आधार दिया, बल्कि कार्यकर्ताओं की कई पीढ़ियों को तैयार किया. राष्ट्र प्रथम का सिद्धांत उनके राजनीतिक चिंतन और संगठनात्मक कार्यों का मूल आधार रहा.
आडवाणी जी के नेतृत्व की दो विशेषताएं विशेष रूप से उल्लेखनीय रही हैं. पहली, उनकी वैचारिक स्पष्टता और बौद्धिक प्रखरता. उनके भाषणों, लेखों और साक्षात्कारों में यह स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी. जनसंघ और भाजपा के लिए उनके द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव आज भी अध्ययन के योग्य हैं. उनके साक्षात्कारों में भी विषयों की गहरी समझ, स्पष्टता और सटीकता दिखाई देती थी. दूसरी विशेषता भारतीय राजनीति के एक बड़े वर्ग द्वारा वर्षों से प्रचारित छद्म धर्मनिरपेक्षता को उजागर करने की उनकी क्षमता थी.
संगठन से लेकर सरकार तक, आडवाणी जी ने हर जिम्मेदारी को पूरी गंभीरता और समर्पण के साथ निभाया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों में काम किया. इसके बाद वे दिल्ली पहुंचे, जहां अटल बिहारी वाजपेयी जी के साथ उनका निकट संपर्क और राजनीतिक सहयोग शुरू हुआ. भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं, जब दो बड़े नेता कई दशकों तक साथ काम करें और उनके बीच प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग का भाव बना रहे. आडवाणी जी और अटल जी ने अपने लंबे राजनीतिक साथ से ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत किया. दोनों ने मिलकर भारतीय राजनीति की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
वर्ष 1970 में आडवाणी जी की संसदीय यात्रा प्रारंभ हुई. संसद में उनके वक्तव्यों और हस्तक्षेपों को राजनीतिक विचारधारा से परे विभिन्न दलों के नेताओं की सराहना मिली. सांसद, दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष और बाद में सत्ता पक्ष के सदस्य के रूप में भी उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई. संसदीय दायित्वों के बीच भी उनका देश के विभिन्न हिस्सों में जाना और आम लोगों से संवाद करना निरंतर जारी रहा.
वर्ष 1991 के लोकसभा चुनावों का एक प्रसंग आज भी स्मरणीय है. उस चुनाव में आडवाणी जी ने दो लोकसभा सीटों से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था, जिनमें गांधीनगर भी शामिल था. गुजरात से उनका पुराना संबंध था. विभाजन के बाद उनके पिता कच्छ में बस गए थे और आडवाणी जी स्वयं भी गुजरात से राज्यसभा के सदस्य रह चुके थे. इस लिहाज से गांधीनगर से चुनाव लड़ना उनके लिए एक तरह से घर वापसी जैसा था. भाजपा संगठन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए मुझे उनके चुनाव संबंधी दस्तावेज तैयार करने और पूरे चुनाव अभियान में सहयोग करने का अवसर मिला. गांधीनगर की जनता ने उन्हें लगातार संसद में अपना प्रतिनिधि चुना. गांधीनगर का मतदाता होने के नाते मुझे भी कई बार उन्हें मतदान करने का सौभाग्य मिला. अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति उनका लगाव, वहां के लोगों की समस्याओं पर ध्यान देना और निरंतर संपर्क बनाए रखना जनप्रतिनिधियों के लिए अनुकरणीय है.
आडवाणी जी के राजनीतिक जीवन में आपातकाल एक निर्णायक अध्याय रहा. लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए वे अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे. आपातकाल के दौरान के उनके अनुभवों का उल्लेख उनकी पुस्तक ‘A Prisoner's Scrap-Book’ में मिलता है. इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘A Tale of Two Emergencies’ शीर्षक से है, जिसमें जून 1975 में भारत में शुरू हुई घटनाओं और वर्ष 1933 के नाजी जर्मनी की घटनाओं के बीच की समानताओं को विस्तार से रेखांकित किया गया है.
विपक्ष में रहते हुए आडवाणी जी ने जहां अपनी मुखरता और राजनीतिक दृढ़ता का परिचय दिया, वहीं सरकार में रहते हुए प्रशासनिक क्षमता भी प्रदर्शित की. वर्ष 1977 में जनता सरकार के गठन के बाद उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली. इस विभाग में उनके कार्यों को व्यापक रूप से प्रभावशाली माना गया. बाद में उपप्रधानमंत्री और देश के सबसे लंबे समय तक गृह मंत्री रहने वाले नेताओं में शामिल आडवाणी जी ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सुरक्षा बलों के जवानों के जीवन को बेहतर बनाने के उनके प्रयास आज भी याद किए जाते हैं. आतंकवाद के विरुद्ध उनके स्पष्ट रुख के परिणामस्वरूप भारत को एक कठोर आतंकवाद विरोधी कानून मिला.
आडवाणी जी के राजनीतिक जीवन की चर्चा सोमनाथ से अयोध्या तक निकली रथयात्रा के उल्लेख के बिना पूरी नहीं हो सकती. इस यात्रा ने भारतीय समाज और राजनीति की दिशा को प्रभावित किया. इस यात्रा की परिकल्पना से लेकर उसके क्रियान्वयन तक जुड़े रहने का अवसर मिलना मेरे लिए विशेष सौभाग्य की बात रही. यात्रा के शुभारंभ के समय सोमनाथ में उपस्थित रहना भी एक अविस्मरणीय अनुभव था. रथयात्रा केवल राजनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक दृढ़ता की भी परीक्षा होती है. लगातार यात्रा, लंबे कार्यक्रम, शारीरिक थकान और इसके बावजूद लक्ष्य के प्रति एकाग्रता बनाए रखना आसान नहीं होता. आडवाणी जी ने अपनी असाधारण सहनशक्ति से इस चुनौती का सामना किया.
बिहार में आडवाणी जी की गिरफ्तारी के वे दुखद क्षण भी स्मृतियों में हैं. इसके बाद गुजरात में भाजपा ने चिमनभाई पटेल सरकार से समर्थन वापस ले लिया. इस निर्णय के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि विचारधारा और राम मंदिर के प्रश्न पर कोई समझौता नहीं होगा. पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने संकल्प लिया था कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, राम मंदिर का निर्माण होकर रहेगा. वर्षों बाद भारत की जनता के आशीर्वाद से अयोध्या में प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर साकार हुआ.
आडवाणी जी के व्यक्तित्व की विशेषताएं केवल राजनीतिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं हैं. उनकी सादगी और सार्वजनिक जीवन में शुचिता के प्रति प्रतिबद्धता भी उतनी ही उल्लेखनीय है. नवनिर्माण आंदोलन के बाद वे जूनागढ़ पहुंचे थे और वहां एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में एक महीने तक रहे. इस दौरान उन्होंने विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी की तैयारी की, जिसमें कांग्रेस को जनता ने अस्वीकार कर दिया. सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और नैतिकता के प्रति उनका आग्रह उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है.
अध्ययन के प्रति उनकी रुचि भी उल्लेखनीय है. वे नियमित रूप से समाचार पत्रों का गहन अध्ययन करते हैं. उनके निकट रहने वाले लोग जानते हैं कि वे समाचार पत्रों को कितनी बारीकी से पढ़ते हैं. सिनेमा और रंगमंच के प्रति उनका विशेष लगाव रहा है और वे फिल्म समीक्षक के रूप में भी सक्रिय रुचि रखते रहे हैं. इतिहास के प्रति उनकी समझ और उसके संरक्षण की आवश्यकता का भाव उनकी पुस्तक ‘My Country My Life’ में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
सिंधी संस्कृति से उनका जुड़ाव भी जीवनभर बना रहा. इसी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने लेह के निकट आयोजित होने वाली सिंधु दर्शन पूजा को लोकप्रिय बनाने का प्रयास किया. मुझे भी आडवाणी जी और जॉर्ज फर्नांडिस जी के साथ इस पूजा में शामिल होने का अवसर मिला था.
आडवाणी जी की इस लंबी और उल्लेखनीय सार्वजनिक जीवन यात्रा का उल्लेख कमला आडवाणी जी के योगदान के बिना अधूरा रहेगा. वे उनके पूरे सार्वजनिक जीवन में निरंतर शक्ति और सहयोग का आधार बनी रहीं.
कराची में अपना बचपन बिताने वाले आडवाणी जी ने शायद कभी कल्पना नहीं की होगी कि उनका जीवन किस दिशा में आगे बढ़ेगा और वे भारतीय राजनीति के इतने महत्वपूर्ण अध्यायों का हिस्सा बनेंगे. उनके सार्वजनिक जीवन और योगदान के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए भारत की जनता ने वर्ष 2024 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया.
आज जब लालकृष्ण आडवाणी जी अपने जीवन के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तब उनका लंबा सार्वजनिक जीवन, संगठन के प्रति समर्पण, वैचारिक प्रतिबद्धता और राजनीतिक अनुभव अनेक पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का विषय है. मेरी कामना है कि ईश्वर उन्हें उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें और वे इसी प्रकार अपने अनुभवों और जीवन यात्रा से हम सभी का मार्गदर्शन करते रहें.
नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री