निशांत कुमार के सिर कांटों भरा ताज, क्या वे ‘नवीन पटनायक‘ बन पाएंगे?

निशांत कुमार ने जेडीयू में शामिल होकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कर दी है. खबर तो यही है कि निशांत कुमार को बड़ी जिम्मेदारियां मिल सकती हैं, लेकिन तस्वीर अभी पूरी तरह साफ नहीं हुई है - लेकिन जिन हालात में निशांत कुमार ने कदम बढ़ाया है, कदम कदम पर काबिलियत का सबूत पेश करना होगा.

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जेडीयू नेताओं के साथ नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार. (Photo: PTI) जेडीयू नेताओं के साथ नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार. (Photo: PTI)

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 09 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 1:18 PM IST

निशांत कुमार अपने पिता नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू में शामिल होते वक्त भी बेहद शांत नजर आए. नए काम का उत्साह अंदर भले रहा हो, चेहरे या हाव-भाव से तो नजर नहीं आया. कुछ लोग आंसू की तरह अपनी फीलिंग भी छुपा लेते हैं, हो सकता है निशांत के भी ऐसे ही प्रयास रहे हों.

अभी तो शुरुआत है. निशांत कुमार को आगे बड़ी जिम्मेदारियां मिलने की बातें हो रही हैं. पार्टी और परिवार के करीब लोग तो निशांत को शांत और बेहद गंभीर बता रहे हैं, लेकिन कुछ लोग उनकी काबिलियत पर वैसे ही शक जता रहे हैं, जैसे कांग्रेस नेता राहुल गांधी अपने राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर होते हैं. 

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निशांत कुमार मेहनत करने और अपने पिता के 20 साल में किए काम को आगे बढ़ाने की बात भी कर रहे हैं, फिर भी सवाल है - क्या तमाम सहयोगियों और सलाहकारों की बदौलत निशांत कुमार भविष्य में मिलने वाली जिम्मेदारियों को संभाल पाएंगे? सच तो यही है कि ऐसे हर सवाल का जवाब तो वक्त ही दे सकता है.

काम बोलता है, तो विरोधी खामोश हो जाते हैं

कुल 15 मिनट के कार्यक्रम में निशांत कुमार के 2 मिनट का संबोधन भी शामिल रहा, और अपनी तरफ से वे सारी बातें बोल दीं जो जरूरी लगी होंगी. मंच पर भी उनका संकोच साफ साफ दिखा, वह बार-बार आगे की तरफ झुक जा रहे थे. जेडीयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने निशांत कुमार को जेडीयू की सदस्यता की पर्ची थमाई, और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने जेडीयू का पट्टा पहनाया. बस उसी वक्त निशांत कुमार ने तत्परता दिखाई, झुके और ललन सिंह के पांव छू लिए - तालियां बजीं, पुराना अध्याय समाप्त और नया आरंभ हुआ. 

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मीडिया के जरिए निशांत कुमार के बारे में कई तरह की बातें सामने आ रही हैं. कुछ लोग उनके राजनीति में सफल होने पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन जेडीयू कार्यकर्ता निशांत को नए रोल में पाकर शांत हो गए हैं. जो विरोध नीतीश कुमार के राज्यसभा के नामांकन के लिए जाते वक्त देखने को मिली था, वैसा तो कहीं नहीं ही नजर आ रहा है. 

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में निशांत कुमार के बारे में दो तरह की बातें जानने को मिली हैं. रिपोर्ट में एक पारिवारिक सदस्य के हवाले से बताया गया है, 'निशांत में कुछ विलक्षण खूबियां हैं. वह अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि का है और चीजों को जल्दी समझ लेता है. उसे तारीखें बहुत याद रहती हैं. इसके अलावा वह बहुत केयरिंग है. परिवार में किसी के बीमार पड़ने पर वह सेवा में जुट जाता है. उसने अपने मामा का इलाज अपने खर्च पर करवाया और अपनी नानी की भी खूब सेवा की.'

बताते हैं कि निशांत कुमार का शुरुआती जीवन ननिहाल में ही बीता है. अपने माता-पिता के साथ निशांत कुमार तब रहना शुरू किया जब वो 5 साल के हो गए थे. 

निशांत कुमार के बारे में उनके करीबी मित्र अजीत की राय भी काफी महत्वपूर्ण है. अजीत, असल में, आरजेडी नेता जगदानंद सिंह के बेटे हैं. निशांत के बचपन में जगदानंद सिंह और नीतीश कुमार पड़ोसी हुआ करते थे. अजीत के अनुसार, निशांत कुमार का स्वभाव राजनीति वाला नहीं है, और वो कार्यकर्ताओं के साथ ज्यादा मेलजोल नहीं रख सकते. इंडिया टुडे से बातचीत में अजीत बताते हैं, वह शुरू से शर्मीला था... और अब तो बिल्कुल सीएम हाउस में बंद रहता है... वह अस्वस्थ भी रहता है, और फिलहाल अध्यात्म ही उसकी मुख्य अभिरुचि है.'

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निशांत कुमार को अपने काम से सबको जवाब देना है. साबित करना है कि उनको 'पप्पू' समझने वाले बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं.

भविष्य के एक नेता की लंबी अघोषित ट्रेनिंग

यह तो माना ही जा सकता है कि एक्टिव पॉलिटिक्स में न रहते हुए भी निशांत कुमार ने सत्ता को बेहद करीब से देखा है, और अब अपने काम से साबित खुद को साबित भी करना है. और, निशांत कुमार अपने संबोधन में ऐसा बोल भी चुके हैं. 

निशांत कुमार के राजनीति में आने के रास्ते में तो सबसे बड़ी बाधा उनके पिता नीतीश कुमार के सिद्धांत ही थे, लेकिन हो सकता है उनको भी बेटे का मिजाज राजनीति के अनुकूल न लगा हो. इंडिया टुडे की रिपोर्ट में बताया गया है कि निशांत के सामने आने वाली चुनौतियों से हर कोई वाकिफ था. पार्टी के नेता भी, और परिवार के लोग भी - और चीजों को दुरुस्त करने के लिए करीब साल भर से निशांत कुमार को जरूरतों के हिसाब से तैयार भी किया जा रहा था. 

जरूरी पॉलिटिकल ट्रेनिंग देने के लिए कुछ खास लोगों की एक टीम भी बनाई गई थी. और आगे के लिए, रिपोर्ट में कहा गया है, निशांत कुमार के साथ युवा विधायकों की एक टीम बनाई जा रही है. टीम में ज्यादातर वे लोग ही शामिल किए गए हैं, जो बरसों से निशांत के करीब रहे हैं, या फिर ऐसे लोग करीबी रिश्तेदार हैं. 

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रिपोर्ट के मुताबिक, सलाहकारों की टीम में बीआईटी मेसरा में निशांत के साथ रहे इस्लामपुर के विधायक रूहेल रंजन, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष सदानंद सिंह के बेटे शुभानंद मुकेश, जेडीयू नेता दिनेश कुमार सिंह, एलजेपी सांसद वीणा देवी की विधायक बेटी कोमल सिंह और आनंद मोहन के बेटे चेतन आनंद जैसे युवा नेताओं को निशांत कुमार की सहयोगी टीम में शामिल किया गया है. अन्य लोग हैं, जेडीयू का सोशल मीडिया देखने वाले नीतीश कुमार के भांजे मनीष और उनकी बड़ी बहन के नाती अनुराज फिलहाल निशांत के सबसे करीबी लोगों में माने जा रहे हैं.

अपने वादे पर भी खरा उतरना होगा

भूमिका भले ही अलग हो, लेकिन जल्दी ही निशांत कुमार में नीतीश कुमार का अक्स देखा जाना शुरू हो जाएगा. चाहे जिस स्थिति में हो, बिहार में नीतीश कुमार 2.0 की शुरुआत होने वाली है, और निशांत कुमार को अपने काम के दायरे में रहकर ही उसकी झलक दिखानी होगी.  

हर मामले में पहला इम्प्रेशन आखिरी नहीं होता. हो सकता है निशांत कुमार का पहला भाषण लोगों को ऐसा महसूस कराया हो, लेकिन पहले प्रदर्शन के आधार पर किसी को भी खारिज करना ठीक नहीं होता. और, अभ्यास से बहुत कुछ ठीक किया जा सकता है.  

निशांत कुमार ने कहा भी, ‘मैं पार्टी के लिए मेहनत से काम करूंगा... मेरे पिताजी ने 20 साल में जो काम किए हैं, मैं उन्हें आगे बढ़ाऊंगा... राज्यसभा जाने का फैसला मेरे पिताजी का है... बिहार की जनता और देश की जनता से अपील करता हूं कि पिताजी पर विश्वास बनाए रखें.’

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बोले, 'हम सब... मेरे पिता नीतीश कुमार के मार्गदर्शन में काम करेंगे... पार्टी और जनता ने मुझ पर जो विश्वास किया है, उस पर मैं खरा उतरने की कोशिश करूंगा... आप पापा पर विश्वास बनाए रखें.' 

'पिताजी' से संबोधन शुरू करते हुए निशांत कुमार 'पापा' पर आ गए थे. शायद ये औपचारिकता से आगे बढ़कर सहज होने या अनौपचारिक होने की शुरुआत हो.   

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, करीबी लोग यह भी बताते हैं कि अंतर्मुखी स्वभाव के निशांत यह सब करने के लिए बहुत मुश्किल से राजी हुए हैं. बताया जाता है, तीन मार्च तक वह अपने पिता से कहते रहे, 'आप मुझे पार्टी में रख लीजिए, मगर... मैं अभी न पार्टी संभाल सकता हूं, न सरकार का कामकाज.

नीतीश कुमार का टका सा जवाब था, “अब तो फैसला हो चुका है.”

वारिस तो बेटा ही होता है!

निशांत कुमार ने भी दोहराया है कि राज्यसभा जाने का फैसला उनके पिता नीतीश कुमार का ही है. पहले जेडीयू नेताओं की तरफ से भी ऐसी बातें कही जा चुकी हैं. निशांत कुमार के राजनीति में आने का फैसला भी नीतीश कुमार ने ही लिया है, जैसा मालूम हो रहा है. 

निशांत कुमार के जेडीयू की सदस्यता ले लेने के बाद नीतीश कुमार उन सिद्धांतों से भी मुक्त हो चुके हैं, जिनमें बरसों से उनको परिवारवाद की राजनीति का विरोधी देखा, समझा और माना जाता रहा है - और इस तरह निशांत कुमार भी तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव और राहुल गांधी जैसे नेताओं में शुमार हो गए हैं. 

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फर्क यह है कि निशांत कुमार विरोधी खेमे में नहीं होने के कारण राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की तरह निशाने पर नहीं आने वाले हैं. निशांत कुमार के खुद को साबित करने में यह चीज भी मददगार होगी - अपनी राजनीति के आखिरी दौर में ही सही, नीतीश कुमार ने भी अपने भाई जैसे दोस्त की बात से इत्तेफाक जता ही दिया, बेटा वारिस नहीं होगा तो क्या भैंस चराएगा?

क्या निशांत भी नवीन पटनायक बन सकते हैं?

तुलना करने के लिए तो निशांत कुमार के सामने तेजस्वी यादव से लेकर राहुल गांधी तक हैं, लेकिन जिन हालात में निशांत कुमार ने राजनीति में एंट्री ली है, वे ओडीशा के 24 साल तक मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक से ज्यादा मिल रहे हैं. खास बात यह है कि नवीन पटनायक और नीतीश कुमार अच्छे दोस्त भी हैं. दोस्ती की एक मिसाल तब भी देखने को मिला था जब राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जेडीयू की तरफ से चुनाव में उम्मीदवार थे. 

सोशल मीडिया पर कई लोग निशांत कुमार और नवीन पटनायक में मिलती जुलती कई चीजें देख रहे हैं. असल में, नवीन पटनायक ने 51 साल की उम्र में जनता दल से अलग पिता के नाम पर अपनी पार्टी बीजू जनता दल बना ली थी. बीजू पटनायक भी ओडिशा के मुख्यमंत्री थे. 

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निशांत कुमार के अविवाहित होने में तो नवीन पटनायक से समानता है, लेकिन उनकी उम्र को लेकर दो बातें सामने आ रही हैं. विकिपीडिया में निशांत कुमार का जन्म दिन 20 जुलाई 1975 बताया गया है. लेकिन, इंडिया टुडे की रिपोर्ट में बताया गया है, मीडिया में निशांत का जन्म वर्ष 1975 बताया जाता है, मगर सच यह है कि उनका जन्म 20 जुलाई 1980 को हुआ था.

ये भी संयोग ही है कि जेडीयू की ही तरह एक वक्त बीजू जनता दल का भी बीजेपी के साथ गठबंधन था. 1998 के आम चुनाव में गठबंधन को ओडिशा की 21 में से 16 सीटें मिली थीं. और, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल में नवीन पटनायक भी शामिल हुए. 

2000 के ओडिशा विधानसभा चुनाव में गठबंधन में रहते हुए बीजेडी को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं, और नवीन पटनायक ओडिशा के मुख्यमंत्री बन गए - मौका तो निशांत कुमार के सामने भी है, जरूरत सिर्फ खुद को साबित करने की है.

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