दुलार, दुत्कार फिर प्यार... घर से सियासत तक बड़ी सख्त होती है बुआ

कहते हैं सत्ता की मलाई जितनी मुलायम होती है, तासीर उससे ज्यादा भी फायर होती है. पर रिश्ते तो रिश्ते हैं. मोह से बचा कौन है. आकाश और उनकी माया बुआ की कहानी में भी कुछ ऐसा ही है. एक तरफ भतीजे का फ्यूचर है तो दूसरी तरफ कुर्सी, संगठन और जिम्मेदारियां. इन सबके बीच इमेज की बड़ी सी बिल्डिंग भी है.

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मायावती सियासत की मंझी हुई खिलाड़ी हैं. मायावती सियासत की मंझी हुई खिलाड़ी हैं.

प्रशांत कुमार

  • नई दिल्ली,
  • 08 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 7:11 AM IST

बुआ जब मायके में होती है तो सबसे ज्यादा आनंद भतीजे को आता है, क्योंकि बुआ भतीजे को आकाश-भर दुलार करती है. बुआ, फूफाओं की तरह लॉन्गटर्म गुस्सा नहीं रहती. वह मायके की वो इकलौती सख्त-जुबान होती है जिसका कहा ब्रह्मा की लकीर होती है. भतीजे की ससुराल तक बुआ का सिक्का चलता है. भतीजे की सास हो या ससुर, बुआ चिढ़ जाए तो जुबान की कैंची चलाने में कतराती नहीं, क्योंकि ये उसका जन्मसिद्ध अधिकार होता है.

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बुआ-भतीजे के रिश्ते में अपनापन, अधिकार के साथ ही तमाशा बन जाने वाली नोकझोंक भी लाजमी है. एकबारगी बुआ भतीजे से यह कह दे कि हमसे ज्यादा समझदार हो गए हो क्या? तो इसमें कोई हैरानी थोड़े है. अब यूपी की सियासत ही देख लो. आकाश की माया बुआ भी लंबे अर्से से प्यार, दुलार, दुत्कार और फिर दुलार करती दिख रही हैं.

कहते हैं सत्ता की मलाई जितनी मुलायम होती है, तासीर उससे ज्यादा भी फायर होती है. पर रिश्ते तो रिश्ते हैं. मोह से बचा कौन है. आकाश और उनकी माया बुआ की कहानी में भी कुछ ऐसा ही है. एक तरफ भतीजे का फ्यूचर है तो दूसरी तरफ कुर्सी, संगठन और जिम्मेदारियां. इन सबके बीच इमेज की बड़ी सी बिल्डिंग भी है.

मायावती कभी भतीजे को उत्तराधिकारी घोषित करती हैं तो कभी कांशीराम और बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के आदर्शों की दुहाई देकर पार्टी से बाहर कर देती हैं. बुआ का मानना है कि आकाश ससुराल के कहने पर चलते हैं. खासकर ससुर के कहने पर. 

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सामान्य तौर पर भतीजा बुआ को जवाब दे सकता है पर सियासत वाली बुआ काफी सख्त है. बात जब मायावती की हो तो आकाश जैसा भतीजा ये कहने की भी हिम्मत नहीं जुटा सकता कि बुआ, अब जमाना बदल गया है. 

आम तौर पर बुआ-भतीजे की लड़ाई की जड़ छोटी-छोटी बातें ही होती हैं. जैसे- तुम्हारे पापा बहुत बिजी हैं, पर तुम फोन क्यों नहीं करते? अगर बुआ मायके में हो तो यह पूछना उसका हक है कि इतनी देर से घर क्यों आए? कुल मिलाकर बुआ वह सदस्य है जिसके बारे में कह सकते हैं कि इनकी ही चलती है. ऐसे में जब मायावती आकाश को डांटती फटकारती हैं तो घर तो चुप रहता है पर सियासी गलियारों में बवंडर उठता है. यही मायावती और सियासत की मुश्किल है.

घर में तो बुआ कह सकती हैं कि 'यू काम ठीक नाई कीन हओ' पर वही बात सोशल होने पर बखेड़ा खड़ा हो जाता है. मायावती और आकाश की सोच में अंतर लाजमी है क्योंकि हर पीढ़ी की अपनी राय होती है. मायावती ने जिस दौर में सियासत के गुर सीखे वो अलग था. आकाश के दौर में चीजें हवा से तेज हैं. 

मायावती आज भी रैलियों से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस तक में कागज पर लिखे शब्दों को बोलती हैं. पर आकाश का दौर सोशल मीडिया और क्विक रिएक्शन का है. ऐसे में जब आकाश कभी कुछ सख्त बोल देते हैं या किसी नेता को अंकल कह देते हैं तो मायावती को लगता है कि भतीजे को संभलकर चलना चाहिए. वो अपरिपक्व है. 

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खैर आकाश चाहकर भी पब्लिक डोमेन पर यह नहीं कहते कि अब राजनीति पुराने तरीके से नहीं चल सकती. वो कहते हैं तो बस इतना कि बसपा सुप्रीमो अभिभावक हैं और उनका कहा सिर माथे. बुआ-भतीजे के रिश्ते में दूरी भी है और अपनापन भी. 

बुआ मायके में वह शख्सियत है जिनके सामने भतीजा बिगड़ता और सुधरता है. बुआ उसे डांटती है, उसके लिए सबसे भिड़ती है और भतीजे पर ज्यादा गुस्सा हो तो यह भी कह सकती है कि तुम्हारे बाप भी मुझसे डरते हैं. मायावती और आकाश के मामले में यहां थोड़ा उलट है. 

अपने भाई के लिए मायावती का स्नेह अलग है. उन्हें अगर कोई खटक रहा है तो वह हैं आकाश के ससुर. जिस वजह से बुआ भतीजे के रिश्ते की हलचल प्रदेश की सियासत में महसूस होती है.

मायावती सरकार में रहें या ना रहें, फिल्मी 'नारायण शंकर' की तरह उनके राजनीतिक गुरुकुल में भी परंपरा, प्रतिष्ठा, अनुशासन... तीन स्तंभ हैं. बुआ का अनुशासन बोलता है. उनके कोप का कई अधिकारी और नेता भाजन हुए हैं. उनकी अपनी अलग एक सत्ता है. पार्टी लाइन से अलग होने का मतलब गेट आउट... ये उनकी शैली है. कई बार आकाश का अंदाज इस लाइन से टकराता दिखाई दिया.

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एक वजह परिवार का राजनीतिक प्रभाव भी है. मायावती ने आकाश के ससुर के प्रभाव और गुटबाजी पर नाराजगी जाहिर की. ऐसे में आकाश के सामने बार-बार मुश्किल खड़ी होती है कि परिवार और पार्टी के बीच संतुलन कैसे बनाएं?

इन सबसे बड़ा सवाल है उत्तराधिकार का. आकाश को उत्तराधिकारी बनाने का मतलब पार्टी की अगली पीढ़ी तैयार करना था लेकिन आकाश शायद 'मिर्जापुर' देख लिए. उनको लगा गद्दी पर चाहे बुआ बैठें या वो, नियम सेम रहेगा. पर मायावती के मामले में ऐसा नहीं है. गद्दी पर बुआ ही बैठेंगी. नियम भी बुआ का ही चलेगा. यहां या की कोई गुंजाइश नहीं है.
 
मायावती सियासत की मंझी हुई खिलाड़ी हैं. उनको पता है कि फिल्मी मिर्जापुर हो या लखनऊ की गद्दी, दोनों जगह दिमाग और दम चाहिए, सिर्फ गुस्सा नहीं. उनकी पाठशाला में अनुशासन सबसे ऊपर है. मायावती को इस राह में आकाश के ससुर का प्रभाव रोड़ा नजर आया.

बुआ बार-बार आकाश को सियासी कसौटी में कस रही हैं. वो ये भी बता रही हैं कि मायके में चलेगी तो सिर्फ बुआ की. बुआ के होते हुए ससुराल की दाल लखनऊ में तो कतई नहीं गलेगी. दाल भी मायके की होगी, नमक भी मायके का और इसे पकाया भी मायके में ही जाएगा. खैर अब आगे देखना है कि इस दाल में आकाश को आनंद आता है या नहीं. अगर फिर मायावती को लगा कि दाल में मिलावट हो रही है तो इसमें दो राय नहीं कि वो कहेंगी आकाश बाबू... 'योग्य नहीं हैं आप'

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