तृणमूल में टूट के बाद ममता बनर्जी के पास अब क्या विकल्प बचा है?

देश की राजनीति में क्षेत्रीय दल हमेशा नेतृत्व के इर्द-गिर्द खड़े पाए जाते हैं. लेकिन जब विधायक बागी हो जाएं, और नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े करने लगें, तो मामला काफी गंभीर हो जाता है. और, मामला पार्टी की पहचान, कंट्रोल और राजनीतिक विरासत की लड़ाई में तब्दील हो जाता है.

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पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बागी तृणमूल कांग्रेस नेता ऋतब्रत बनर्जी. (Photo: ) पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बागी तृणमूल कांग्रेस नेता ऋतब्रत बनर्जी. (Photo: )

मृगांक शेखर

  • नई दिल्ली,
  • 04 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:27 PM IST

कई बार हालात ऐसे होते हैं जब इंसान निरीह और निर्विकल्प हो जाता है. ममता बनर्जी फिलहाल अपनी राजनीति के ऐसे ही दौर से गुजर रही हैं. पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान ममता बनर्जी रैलियों में लोगों से कहा करती थीं, 'मेरे पास कोई पावर नहीं है, उन्होंने मुझसे सारी पावर, लॉ एंड ऑर्डर और सब कुछ छीन लिया है.'

एक चुनावी रैली का समापन करते हुए ममता बनर्जी शेरो शायरी वाले अंदाज में यहां तक बोल गईं कि सब कुछ ठीक रहा तो फिर मुलाकात होगी. ममता बनर्जी ने कहा था, 'फिर मिलेंगे, रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे, फिर जोड़ा फूल खिलेंगे, रहा तृणमूल तो फिर मिलेंगे.'

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ममता बनर्जी तब ऐसी बातें क्यों कर रही थीं, हो सकता है उनको मालूम हो. हो सकता है उनको भी मालूम न हो. हो सकता है, आने वाले हालात का आभास होने लगा हो. हो सकता है, इंट्यूशन हो रहा हो - मुद्दे की बात यह है कि तब की आशंकाएं अब हकीकत बन कर सामने आ रही हैं. 

जिस तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी शुरू से ही खुद फैसले लेती आ रही थीं, अब कोई और फैसले ले रहा है. ममता बनर्जी के फैसले को चैलेंज करते हुए बदल दे रहा है, और उस फैसले को मान्यता भी मिल जा रही है. ममता बनर्जी ने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निकाल दिया था, लेकिन अब वही ऋतब्रत बनर्जी विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के नेता और विपक्ष के नेता भी बन गए हैं. स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को टीएमसी के 58 विधायकों का नेता बना दिया है.  

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मालूम नहीं पश्चिम बंगाल में जब ये सब हो रहा था तो उद्धव ठाकरे और शरद पवार के मन में क्या चल रहा होगा. अरविंद केजरीवाल की आंखों के सामने भी हालिया जख्म उभर गए होंगे. हो सकता है, ममता बनर्जी भी अपनी हालत उद्धव ठाकरे, शरद पवार और अरविंद केजरीवाल जैसी ही पा रही हों - लेकिन बेबस और खामोश होकर, मन मसोस कर सब कुछ देख रही हों. 

जैसे अरविंद केजरीवाल के सांसद छोड़कर चले गए, ममता बनर्जी के विधायक बहुत दूर जा चुके हैं. लेकिन, तृणमूल कांग्रेस के सांसद अब भी उनके साथ लगते हैं. खतरे की तलवार जरूर लटक रही है, लेकिन उनकी तरफ से कम से कम बगावत जैसी बातें तो सामने नहीं आई हैं. डूबते को तो तिनके का सहारा होता है, सांसदों का साथ बने रहना तो नाव और पतवार लिए मदद खातिर खड़े माझी जैसा है.  

सारी संभावनाओं और आशंकाओं के बावजूद मदद की एक बड़ी उम्मीद अदालत तो है ही. लेकिन, वहां भी उम्मीदें कैसे टूटती हैं उद्धव ठाकरे और शरद पवार के साथ चिराग पासवान ही जानते हैं. चिराग पासवान अकेले ऐसे नेता हैं, जिन्होंने हालात बदलने पर बाउंस बैक किया है - क्या ममता बनर्जी को भी चिराग पासवान जैसा कोई मौका मिलेगा?

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अब तो अदालत में ही फैसला होगा

अब खतरा तृणमूल कांग्रेस नाम और चुनाव निशान पर मंडरा रहा है. राजनीतिक दल का नाम और निशान का मालिकाना हक चुनाव आयोग तय करता है. उद्धव ठाकरे, शरद पवार और चिराग पासवान सभी के मामलों में चुनाव आयोग का फैसला एक जैसे देखा गया है. चिराग पासवान का खोया हुआ सम्मान और राजनीतिक संपत्ति तो हासिल हो गई, लेकिन पार्टी का नाम और चुनाव निशान नहीं मिला. अब चिराग पासवान लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के नेता बन चुके हैं. क्योंकि, एक वक्त चिराग पासवान के चाचा पशुपति कुमार पारस को पार्टी का असली दावेदार मान लिया गया था. 

चिराग पासवान की ही तरह चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे और अजित पवार को क्रमशः शिवसेना और एनसीपी का वैधानिक नेता बताया. अजित पवार वाली एनसीपी की अध्यक्ष अब उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार हैं. उद्धव ठाकरे और शरद पवार के पास भी जो उनकी पार्टियों का बचा हुआ हिस्सा है, उनके भी नाम बदले हुए हैं - और अब यही खतरा ममता बनर्जी के मामले में भी संभावित लग रहा है. 

बीते मामलों से तो यही मालूम होता है कि ममता बनर्जी के तृणमूल कांग्रेस के साथ भी वैसा ही होने वाला है. भले ही ममता बनर्जी मामले को अदालत में ले जाएं, लेकिन वहां भी चुनाव आयोग की ही राय ली जाएगी. और, पुराने मामलों की तरह चुनाव आयोग का फैसला ही आखिरी माना जा सकता है. 

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मामला अदालत जाने पर तमाम पहलुओं पर गौर किया जाएगा. मसलन, विधानसभा स्पीकर की क्या भूमिका रही. विधायकों के बागी गुट को मान्यता देने में हड़बड़ी क्यों हुई. और हड़बड़ी में कहीं नियमों को नजरअंदाज तो नहीं किया गया. 

यह मामला संभवतः अदालत में जाएगा।
तृणमूल कांग्रेस के भीतर इस विवाद का अंतिम निर्णय संभवतः न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही स्पष्ट होगा। विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय, पार्टी में बहुमत के दावे और मूल राजनीतिक दल के अधिकारों को लेकर कानूनी लड़ाई के संकेत मिल रहे हैं।

आगे क्या होना है

2022 में महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने बगावत के साथ एक झटके में तख्तापलट कर दिया था. ऋतब्रत बनर्जी के तेवर देखकर तो लगता है, अगर ममता बनर्जी इस बार भी चुनाव जीत गई होतीं, तब भी ये सब संभावित था. महाराष्ट्र में शिवसेना में हुए विभाजन के बाद हुए सत्ता संघर्ष में ऐसे ही सवाल उठ रहे थे. और सुप्रीम कोर्ट में विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों को चुनौती दी गई थी. 

1. पश्चिम बंगाल की घटना के बाद स्पीकर के फैसले पर सवाल उठने लगे हैं. बहस का टॉपिक यह है कि स्पीकर के फटाफट फैसले का संवैधानिक आधार क्या था? महाराष्ट्र के मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी थी, विधायक दल का नेता राजनीतिक दल और विधायिका के बीच की कड़ी होता है. इसलिए, उसका चयन केवल विधायकों के बहुमत के आधार पर नहीं किया जा सकता. मूल राजनीतिक दल की तरफ से अनुमोदित विधायक का चयन भी मायने रखता है.

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2. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के 80 विधायकों में से 58 ने पत्र लिखकर ममता बनर्जी की तरफ से चुने गए विधायक दल के नेता को खारिज कर दिया था. फिर विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को विधायक दल के नेता के तौर पर मान्यता देने की मांग की. ममता बनर्जी ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया था. नियुक्ति पर उठे सवालों के बीच उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का कमरा भी नहीं मिला था.

स्पीकर ने विधायकों का पत्र मिलने के बाद न सिर्फ ऋतब्रत बनर्जी को नेता मान लिया, बल्कि नेता प्रतिपक्ष का कमरा भी खोल दिया गया. बागी विधायकों को अलग गुट के रूप में स्पीकर ने फटाफट मान्यता भी दे डाली. 

3. कहने को तो बागी गुट ममता बनर्जी को ही तृणमूल कांग्रेस का नेता होने की बात कह रहा है, लेकिन ऐन उसी वक्त वे यह भी बोल देते हैं कि उनको अब मुख्य सलाहकार या मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए. बेशक ये सब सीधे सीधे ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है, लेकिन अभिषेक बनर्जी के खिलाफ विधायकों के गुस्से का साइड इफेक्ट तो उनको झेलना ही पड़ रहा है. 

4. दलबदल विरोधी कानून के तहत, अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई विधायक या सांसद अलग समूह बना लेते हैं, तो वे अयोग्य नहीं ठहराए जा सकते. हालांकि, इसके लिए उन्हें किसी अन्य पार्टी में विलय करना जरूरी है. जैसे राघव चड्ढा के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद बीजेपी में शामिल हो गए थे. लेकिन, पश्चिम बंगाल की स्थिति अलग है क्योंकि बागियों ने किसी दूसरी पार्टी में शामिल होने के बजाए खुद को असली तृणमूल कांग्रेस होने का दावा किया है. शिवसेना और एनसीपी का केस भी पहले इसी रूप में सामने आया था. 

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5. पश्चिम बंगाल का यह राजनीतिक घटनाक्रम क्षेत्रीय दलों के लिए बड़े खतरे का संकेत है. सवाल यह उठ रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के बाद अब किसका नंबर है? पंजाब में आम आदमी पार्टी और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के सामने भी ऐसी चुनौती खड़ी हो सकती है. यूपी और पंजाब में 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं.

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