लखनऊ में गुरुवार को जो हुआ, वह केवल एक हत्या या आत्महत्या की खबर नहीं है. वह हमारे समय का एक भयावह आईना है. एक एसबीआई कर्मचारी अपनी पत्नी को, जो आईसीआईसीआई बैंक में काम करती थी, उसके दफ्तर के बाहर बुलाकर गोली मार देता है. इसके बाद वह आराम से वहां से निकलता है, ऑटो पकड़कर करीब डेढ़-दो किलोमीटर दूर अपने घर पहुंचता है, अपनी बहन को गोली मारता है और फिर खुद को भी खत्म कर लेता है. इस पूरे घटनाक्रम में तीन जिंदगियां समाप्त हो जाती हैं.
लेकिन इस घटना का सबसे परेशान करने वाला पहलू केवल हत्या नहीं है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि पत्नी की हत्या के बाद क्या हुआ? क्या किसी ने हत्यारे का पीछा किया? क्या किसी ने पुलिस को तत्काल सूचना नहीं दी? क्या बैंक के बाहर मौजूद लोग केवल तमाशबीन बने रहे? क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि किसी को गोली मारने वाला व्यक्ति आराम से ऑटो में बैठकर घर पहुंच जाए और वहां दो और जिंदगियां खत्म कर दे?
संभव है कि उस समय लोगों में डर रहा हो. संभव है कि किसी को समझ ही न आया हो कि क्या हुआ है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि अगर समाज और व्यवस्था की प्रतिक्रिया अधिक तेज होती, तो शायद कम से कम दो जानें बच सकती थीं. हत्यारा घर तक पहुंचने से पहले पकड़ा जा सकता था.पुलिस एक्टिव होती तो हत्यारा घर पहुंचने से पहले पकड़ा जा सकता था. आसपास के लोग सतर्क हो सकते थे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
यह घटना केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है. यह समाज की निष्क्रियता की भी कहानी है. इस त्रासदी का दूसरा पहलू उससे भी अधिक गंभीर है. बताया जा रहा है कि पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे थे और तलाक की प्रक्रिया चल रही थी.यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारे फैमिली कोर्ट, परामर्श केंद्र और सामाजिक संस्थाएं ऐसे मामलों को समय रहते संभाल पा रही हैं? अदालत का काम केवल कानूनी फैसला देना नहीं है. पारिवारिक विवादों में कई बार संवाद, काउंसलिंग और मध्यस्थता भी उतनी ही जरूरी होती है.
निश्चित रूप से हर हत्या के लिए फैमिली कोर्ट को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. कई बार अपराधी पहले से ही हिंसक मानसिकता लेकर चलता है. लेकिन यह भी सच है कि देश में वैवाहिक विवादों, रिश्तों के टूटने, अवैध संबंधों के आरोपों और पारिवारिक तनाव के कारण होने वाली हत्याओं तथा आत्महत्याओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. लगभग हर सप्ताह किसी न किसी शहर से ऐसी खबर आती है जहां पति ने पत्नी को मार दिया, पत्नी ने पति की हत्या करवा दी, प्रेम संबंध के कारण पूरा परिवार खत्म हो गया या फिर कोई व्यक्ति अपने बच्चों समेत आत्महत्या कर बैठा.
दरअसल भारत एक बड़े सामाजिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है. एक तरफ आधुनिकता है, आर्थिक स्वतंत्रता है, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की नई परिभाषाएं हैं. दूसरी तरफ पारंपरिक पारिवारिक संरचनाएं हैं, रिश्तों को लेकर पुरानी अपेक्षाएं हैं और भावनात्मक असुरक्षाएं हैं. जब ये दोनों दुनिया टकराती हैं तो कई लोग उस बदलाव को संभाल नहीं पाते.
समस्या यह है कि हमारी सामाजिक संस्थाएं इस बदलाव की गति के साथ खुद को नहीं बदल पाई हैं. स्कूलों में भावनात्मक शिक्षा नहीं है. परिवारों में संवाद कम होता जा रहा है. मानसिक स्वास्थ्य को अभी भी कमजोरी माना जाता है. काउंसलिंग को लोग बदनामी समझते हैं. अदालतों में मुकदमे वर्षों तक चलते हैं. नतीजा यह होता है कि तनाव धीरे-धीरे विस्फोटक रूप ले लेता है.
इस मामले में आरोपी ने कथित रूप से हत्या के बाद व्हाट्सऐप स्टेटस तक डाला, जिसमें उसने अपने इरादों का उल्लेख किया था. यह केवल अपराध नहीं, बल्कि गहरे मानसिक और भावनात्मक विघटन का संकेत भी है. सवाल यह है कि क्या उसके आसपास किसी ने पहले कभी उसकी स्थिति को समझने की कोशिश की? क्या परिवार, मित्र, समाज या संस्थाएं कोई चेतावनी पहचान सकीं?
सरकार को कानून-व्यवस्था मजबूत करनी होगी, लेकिन केवल पुलिस इस समस्या का समाधान नहीं कर सकती. समाज को भी अपनी भूमिका निभानी होगी. फैमिली कोर्ट को अधिक प्रभावी बनाना होगा. वैवाहिक विवादों में अनिवार्य काउंसलिंग की व्यवस्था पर विचार होना चाहिए. मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाना होगा. और सबसे बढ़कर हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना होगा जहां टूटते रिश्तों का अंत अदालत या श्मशान में नहीं, बल्कि संवाद की मेज पर हो.
लखनऊ की यह घटना केवल तीन मौतों की कहानी नहीं है. यह उस सामाजिक संकट की चेतावनी है जो हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रहा है. यदि हम अब भी नहीं जागे, तो आने वाले वर्षों में ऐसी खबरें अपवाद नहीं, सामान्य बन जाएंगी. तब सवाल यह नहीं होगा कि गुनहगार कौन था. सवाल यह होगा कि जब समाज टूट रहा था, तब हम सब कहां थे?
संयम श्रीवास्तव