ब्लैक जेम्स बॉन्ड चलेगा, महिला नहीं! 007 के लिए 'मर्दानगी' इतनी जरूरी क्यों?

जेम्स बॉन्ड की सबसे दिलचस्प बात यही है कि उनकी मर्दानगी सिर्फ ताकत दिखाने तक सीमित नहीं है. हिगसन ने इसी पहलू को समझाते हुए कहा है कि बॉन्ड एक तरह से पुरुषों की फैंटेसी भी है. वह महंगे होटलों में रुकता है, दुनिया घूमता है, तेज कार चलाता है और उसका पेशा ही लोगों को मारना है.

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जेम्स बॉन्ड का महिला होना कितना जरूरी? (Photo: ITG) जेम्स बॉन्ड का महिला होना कितना जरूरी? (Photo: ITG)

रितु तोमर

  • नई दिल्ली,
  • 26 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 9:41 AM IST

जेम्स बॉन्ड ऐसा किरदार है, जिसे हॉलीवुड ने छह दशक से ज्यादा लंबे सफर में महज एक जासूस बनकर नहीं रहने दिया. 007 एक पूरी सिनेमाई दुनिया का नाम है, बंदूकें, तेज रफ्तार कारें, महंगी घड़ियां, बेहतरीन सूट, मार्टिनी और दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच जाने वाला एक बेखौफ आशिकमिजाज एजेंट. बॉन्ड की पहचान उसके मिशन जितनी ही उसकी मर्दानगी से भी बनी है. वह ब्रिटेन के प्रति वफादार है, लेकिन महिलाओं के प्रति उसका आकर्षण भी उसके किरदार का उतना ही पुराना हिस्सा है. कई मौकों पर वह वुमेनाइजर की छवि में नजर आया है यानी 007 सिर्फ एक सीक्रेट एजेंट नहीं एक खास तरह की पुरुष कल्पना, लाइफस्टाइल और सिनेमाई मर्दानगी का प्रतीक बन चुका है.

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शायद यही वजह है कि जब सवाल उठता है कि क्या अगला जेम्स बॉन्ड एक महिला हो सकती है, तो बहस महज कास्टिंग तक सीमित नहीं रहती. असली सवाल यह है कि छह दशक में जिस किरदार की पहचान पुरुष होने के साथ इतनी गहराई से जुड़ चुकी है, उसका जेंडर बदलने पर क्या उसकी मूल पहचान भी बदल जाएगी? क्या दर्शक एक महिला को उसी 007 के रूप में स्वीकार करेंगे या फिर उसके लिए एक नया रास्ता और नई पहचान गढ़नी होगी? सवाल सिर्फ यह नहीं कि बॉन्ड कौन बनेगा, बल्कि यह भी है कि अपने साथ इतनी मजबूत पुरुष छवि लेकर चलने वाले बॉन्ड का बदलना क्या किरदार के ही बदलने जैसा नहीं हो जाएगा?

लंबे अरसे से दुनियाभर में हर जबान में ये चर्चा होती रही है कि जेम्स बॉन्ड का किरदार किसी महिला को निभाना चाहिए? दशकों से गोरी चमड़ी वाले शख्स को बॉन्ड के किरदार में देखकर बड़ी हुई पीढ़ियों के बीच भी सुगबुगाहट है कि क्या नया जेम्स बॉन्ड ब्लैक होगा या ये दारोमदार किसी महिला को सौंपा जाएगा? इसी बहस के बीच बॉन्ड के राइटर चार्ली हिगसन के एक इंटरव्यू पर नजर गई, जिसमें उन्होंने कहा कि अगर जेम्स बॉन्ड का किरदार कोई अश्वेत शख्स निभाए तो इसमें जरा भी दिक्कत नहीं है. लेकिन बॉन्ड को महिला बना देने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि बॉन्ड पूरी तरह से मर्दानगी को रेप्रेजेंट करता है.  

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अब हिगसन की कही इस बात को समझने के लिए बॉन्ड की शुरुआत तक लौटना जरूरी है. जेम्स बॉन्ड दरअसल ब्रिटिश लेखक ईयान फ्लेमिंग के दिमाग की उपज है. बॉन्ड एक ब्रिटिश MI6 एजेंट है. उन्होंने 1953 में अपने नोवेल कैसिनो रॉयल में बॉन्ड को गढ़ा. जेम्स बॉन्ड सिर्फ बंदूक चलाने वाला एजेंट नहीं है. फ्लेमिंग ने उसे  ऐसा आदमी बनाया, जो खूबसूरत है, आत्मविश्वासी है, शानदार कपड़े पहनता है, शराब और जुए का शौकीन है. तेज कार चलाना पसंद करता है. बेइंतहा खतरे के बीच भी एक खास तरह के कूल अंदाज में नजर आता है और महिलाओं के प्रति आकर्षण उसके व्यक्तित्व का हिस्सा है. फिल्मों ने बॉन्ड की इसी इमेज को कई गुना बढ़ाया है. 

जेम्स बॉन्ड की फिल्म फ्रॉम रशिया विद लव के एक सीन में शॉन कॉनरी (Photo: Shutterstock).

मुझे याद है मैंने जब पहली बार शॉन कॉनरी को जेम्स बॉन्ड के किरदार में देखा तो वो मुझे किसी ग्रीक गॉड से कम नहीं लगे. लंबा-चौड़ा, गोरा, हैंडसम आदमी जिसकी चाल में एक रूमानियत है और वो जब बोलता है तो आप एकटक उसके चेहरे की तरफ देखते रह जाते हैें. आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि शॉन कॉनरी पर्दे पर जेम्स बॉन्ड का किरदार निभाने वाले पहले एक्टर थे. उनके बाद रोजर मूर से लेकर टिमोथी डाल्टन, पीयर्स ब्रॉसनेन और डेनियल क्रेग जैसे तमाम एक्टर इस किरदार में नजर आए. हर अभिनेता ने बॉन्ड को अपने समय के हिसाब से थोड़ा बदला. किसी ने उसमें ज्यादा ह्यूमर का तड़का लगाया तो किसी ने रोमांस का. डेनियल क्रेग उसे एक अलग स्तर पर ले गए.

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बॉन्ड की सबसे दिलचस्प बात यही है कि उनकी मर्दानगी सिर्फ ताकत दिखाने तक सीमित नहीं है. हिगसन ने इसी पहलू को समझाते हुए कहा है कि बॉन्ड एक तरह से पुरुषों की फैंटेसी भी है. वह महंगे होटलों में रुकता है, दुनिया घूमता है, तेज कार चलाता है और उसका पेशा ही लोगों को मारना है पर बॉन्ड की कहानी में पुरुष होने का दूसरा पहलू भी है, जिसमें वह अपने भीतर की परेशानियों से बचने के लिए खुद को लगातार किसी काम, किसी मिशन या किसी लक्ष्य में झोंके रखता है. बॉन्ड जैसे पुरुष के लिए लगातार किसी मिशन में व्यस्त रहना उस भावनात्मक दुनिया से बचने का तरीका भी हो सकता है.

यही वह जगह है जहां बॉन्ड को महिला बनाने की बहस पेचीदा हो जाती है. क्या किसी पुरुष किरदार को महिला बना देने से सिर्फ उसका जेंडर बदलेगा या उसके साथ जुड़ी पूरी कहानी भी बदल जाएगी? एक महिला भी बंदूक चला सकती है, जासूसी कर सकती है, दुनिया बचा सकती है और दुश्मनों को मात दे सकती है. आज के सिनेमा में महिलाओं का एक्शन करना कोई नई चीज नहीं है इसलिए तकनीकी या सिनेमाई स्तर पर ऐसा करना असंभव बिल्कुल नहीं है. 

जेम्स बॉन्ड की 1974 की फिल्म द मैन विद द गोल्डन गन का एक सीन (Photo: Shutterstrock).

लेकिन मान लीजिए बॉन्ड का किरदार किसी महिला एक्टर को दिया जाए. वह मिशन को उसी शिद्दत से पूरा करेगी, वही कार चला रही होगी लेकिन उसके अनुभव की सामाजिक जमीन बदल जाएगी. जिस पुरुष को दुनिया घूमने, अकेले रहने, कई महिलाओं के साथ रिश्ते बनाने और भावनाओं से दूरी बनाए रखने की आजादी मिलती रही है. वही व्यवहार किसी महिला किरदार के लिए उसी तरह पढ़ा जाएगा, यह जरूरी नहीं. एक पुरुष जासूस का वुमेनाइजर होना जिस तरह पुराने बॉन्ड सिनेमा का हिस्सा रहा है, वही चीज महिला किरदार में बिल्कुल अलग अर्थ पैदा कर सकती है.

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हिगसन रंग या नस्ल के मामले में बॉन्ड को लेकर कोई ऐसी सीमा नहीं खींचते. उन्होंने साफ कहा कि बॉन्ड अश्वेत हो सकता है और इसमें कोई समस्या भी नहीं है. लेकिन बॉन्ड का पुरुष होना उसके चरित्र की बुनियादी पहचान का हिस्सा है. मामला चमड़ी के रंग का नहीं है. मामला है, किरदार के व्यक्तित्व का है.

शायद यही हिगसन की बात का सबसे दिलचस्प हिस्सा है. वह नस्ल और जेंडर को एक ही तरह का बदलाव नहीं मानते. उनके मुताबिक बॉन्ड का अश्वेत होना उसके मूल चरित्र को खत्म नहीं करता, क्योंकि बॉन्ड की कहानी का सेंटर प्वॉइन्ट उसकी त्वचा का रंग कभी नहीं रहा लेकिन पुरुष होना उसके किरदार की उस कल्पना का हिस्सा है, जिसे फ्लेमिंग ने गढ़ा और फिल्मों ने दशकों तक मजबूत किया. यह तर्क इस बात का दावा नहीं है कि कोई महिला महान जासूस नहीं हो सकती बल्कि सवाल यह है कि क्या उस महिला को जेम्स बॉन्ड ही कहना जरूरी होगा?

जेम्स बॉन्ड के किरदार में पियर्स ब्रॉसनन.

दरअसल, बॉन्ड फ्रेंचाइजी की खूबी हमेशा उसके किरदार को पूरी तरह जस का तस रखने में नहीं रही. शॉन कॉनरी का बॉन्ड रोजर मूर के बॉन्ड जैसा नहीं था और डेनियल क्रेग का बॉन्ड भी पियर्स ब्रॉसनन की दुनिया से काफी अलग था. यहां तक कि बॉन्ड के बदलते दौर के साथ उसकी भावनात्मकता भी बदली. कैसिनो रॉयल और उसके बाद की फिल्मों में बॉन्ड को ज्यादा भावुक देखा गया. इस तरह फ्रेंचाइजी ने यह दिखाने की भी कोशिश की कि बॉन्ड बदल सकता है लेकिन उसकी मूल पहचान को पूरी तरह खत्म किए बिना.

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हिगसन ने जिस पुरुष होने के दबाव की तरफ इशारा किया है, वही शायद बॉन्ड के किरदार का सबसे कम चर्चित हिस्सा है. बाहर से वह दुनिया का सबसे आजाद आदमी दिखाई देता है, लेकिन उसके भीतर लगातार मिशन, हिंसा, अकेलापन और भावनाओं से दूरी का एक दूसरा संसार चलता रहता है और शायद इसी वजह से बॉन्ड को महिला बनाने की बहस इतनी दिलचस्प है.

जेम्स बॉन्ड के किरदार में डेनियल क्रेग.

हॉलीवुड में पुरुष सुपरहीरो की विरासत को महिला किरदार के जरिए आगे बढ़ाने की कोशिश भी नई नहीं है. मार्वल ने भी रिरी विलियम्स को आयरनहार्ट के रूप में इसी विरासत से जोड़ा. हालांकि, उन्हें सीधे फीमेल आयरन मैन बनाने के बजाय मार्वल ने उनकी अपनी पहचान गढ़ने की कोशिश की. रिरी 2025 में डिज्नी प्लस की सीरीज आयरनहार्ट में फीमेल आयरन मैन के किरदार में नजर आईं. किरदार की बुनियाद भले ही आयरन मैन की दुनिया से जुड़ी रही, लेकिन मार्वल ने रिरी को टोनी स्टार्क का महिला वर्जन बनाने के बजाय एक अलग सुपरहीरो के तौर पर स्थापित किया. लेकिन दर्शकों को यह एक्सपेरिमेंट बिल्कुल पसंद नहीं आया.

अगर हॉलीवुड को एक ऐसी महिला चाहिए जो बॉन्ड की तरह दुनिया घूमे, खतरे से खेले और अपनी शर्तों पर जिए, तो उसके लिए नया किरदार गढ़ना शायद ज्यादा दिलचस्प रास्ता हो सकता है क्योंकि हर लोकप्रिय पुरुष किरदार को महिला के तौर पर गढ़ देना जरूरी नहीं है. कभी-कभी नया किरदार गढ़ना ज्यादा बड़ा सिनेमाई कदम होता है.

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