हम कहते हैं हम लेके रहेंगे आजादी, तो आप हमारे नारों को खारिज करते हैं. आप इस बात को खारिज करते हैं कि लोकतंत्र की चोरी हो गई. आपको लगता है कि स्कूल सुधर गए हैं और चुनाव सुथरे हो रहे हैं क्योंकि आपने इससे बेहतर कुछ देखा ही नहीं है. आप कुएं के मेंढक थे.
सोशल मीडिया का शुक्रिया, जिसने सरकारों के झूठ को बेनकाब कर दिया है. दुनिया कहां से कहां चली गई और हम छोटे-छोटे सपने लेकर जी रहे हैं. विकसित देशों के पास बेहतर सुविधाएं हैं, पूरा लोकतंत्र है और पूरी आजादी है.
हमने फ्रांस से समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के विचार उधार लिए थे कि ये हमें रास्ता दिखाएंगे. लेकिन क्या हमारे पास स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व है? पेरिस को देखिए. वहां के युवाओं सड़कों पर तांडव मचाने, स्कूलों और कभी-कभार किसी टीचर को आग लगाने, लेटेस्ट 18प्रो फोन लूटने की पूरी आजादी है. जिसको जो उखाड़ना है उखाड़ ले जा रहा है. पुलिस एक तरफ खड़ी रहती है क्योंकि युवा देश का भविष्य हैं.
फ़्रांस छोड़िए, हमारे पड़ोसियों ने हमें पीछे छोड़ दिया है. कोलंबो में युवा राष्ट्रपति के स्विमिंग पूल में तैरे. हमारी पुलिस अब भी हमें पार्लियामेंट स्ट्रीट से खदेड़ती है क्योंकि वहां के पार्क होटल का स्विमिंग पूल दिख भर जाता है. ढाका के युवा हसीना की साड़ी और बत्तखें उठाकर घर ले गए. काठमांडू ने अपनी संसद को माचिस लगा कर दीवाली मनाई. हमने वीडियो फॉरवर्ड किए और वापस रील्स देखने लगे. ऐसा कैसा चलेगा?
हमारी महत्वाकांक्षा, हमारी पहल, हमारे दिल की आग का क्या? पुलिस हालांकि सीख रही है. धीरे धीरे. वे अब हर गाली पर भड़कती नहीं है. कभी-कभी, आदत के मारे, लाठियां भांजने के लिए दौड़ पड़ती है. हमें फ्रांसीसी शैली की स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का पूरा पैकेज कब मिलेगा? यह आजादी कोई आजादी नहीं है. तुम्हें देनी पड़ेगी!
सिर्फ प्राइवेट यूनिवर्सिटी हैं जहां बरबाद करने को कुछ मौजूद है. वहां अमीर बच्चे पढ़ते हैं. एलपीयू (LPU) उनमें से एक है. जैसे ही देश के भविष्य ने कुछ गाड़ियों में आग लगाई, देखिए पंजाब पुलिस ने क्या किया. थोड़ी सी आगजनी पर पुलिस भड़क गई. सरकारी कॉलेजों में रखा ही क्या है, सिर्फ कचरा और बाकी खाली. सालों से टीचर लोगों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं. आप उस हॉस्टल का क्या ही उखाड़ लेंगे जिसका प्लास्टर उखड़ा है और पंखे एक बार घूमने में घंटा लगा देते हैं. यह तो ग़ुरबत का बंधुत्व है. यह समानता नहीं है. हम लेके रहेंगे!
पुराने जमाने के लोग बहुत भोले थे. अन्याय से लड़े ही नहीं. सीधा अपनी जिंदगी बनाने में और देश बनाने में व्यस्त हो गए. घर में कुछ था नहीं कि मांगने पर मिल जाता. हमें अब तक मांगने पर सब कुछ मिलता रहा है. हमने बाइक मांगी, मिल गई. हमने आइफ़ोन मांगा, मिल गया. हम इस्तीफा भी मांग लें तो मिल जाता है. पापा लोग इसके लिए खटते थे क्योंकि उन्हें हक़ के लिए लड़ना नहीं आता था. और इतना खटकर भी क्या कर लिया? फ्रांस जैसा विकसित देश तो नहीं बना पाए ना. और फ्रांस के पास कम से कम फैशन तो है.
माता-पिता टाइप लोगों ने तजुर्बे से और एक खास उम्र के बाद ही जरूरी चीजें सीखीं. उन्होंने सफलता का पीछा किया क्योंकि वे भूखे थे. और क्योंकि वे भूखे थे, इसलिए उन्हें राशन कार्ड, पैन कार्ड और किसी न किसी तरह का आईडी कार्ड चाहिए था. उनमें से ज्यादातर के पास तो विक्टिम कार्ड भी नहीं था. उन्होंने पीड़ित होने के बारे में पढ़ा और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उसे रट लिया. उनके लिए पीड़ित होना एक सिलेबस मैटर था. हमारे लिए पीड़ित होना एक स्टार्टअप है. उनकी चिंता कट-ऑफ थी. हमारी चिंता फॉलोइंग है. उन्होंने इसे मेमोराइज़ किया. हमने मॉनेटाइज किया. यही असली है बदलाव. मेटा-मॉर्फोसिस. तुम कैसे नहीं दोगे, रिजाइन!
उन्होंने इतिहास पढ़ा मार्क्स के लिए. हम ने पढ़ा कार्ल मार्क्स के लिए. देश के भविष्य ने पुराने दौर को वापस जिंदा कर दिया है. और पूरा विक्टिमहुड उन पन्नों से खींच लाए हैं. एक समय था जब शोषित लोग कम थे, और इसकी पहचान सिर्फ कुछ समुदायों तक सीमित थी. अब, सूचना क्रांति को थैंक्स कहिए, हर किसी के पास एक विक्टिम कार्ड है. यहां तक कि तथाकथित ऊंची जातियां भी पक्का वाला विक्टिम कार्ड लेकर घूमती हैं. जो शोषित थे, अनुसूचित थे. अब अनुसूचित द्वारा शोषित होने का विक्टिम कार्ड भी उपलब्ध है. सब शोषक हैं, शोसित भी हैं.
सत्ता के सताए लोग सत्ता के पोषित भी हैं. अपना अपना विक्टिम कार्ड. आजीवन मान्य, रैलियों में रिन्यू होने वाला, नहीं है तो अगली रैली में बना दिया जाएगा, कोई KYC की जरूरत नहीं. हममें से कुछ के पास दो या तीन कार्ड हैं. राजनीतिक कार्ड वाले तो प्रीमियम प्लान पर हैं. हर कोई एक जख्म लेकर घूमता था. हमने उसे हरा कर दिया. तुम कुछ भी कर लो!
पुराने लोगों के पास विचारधाराएं थीं लेकिन कोई जख़्म नहीं थी, और थे भी तो पपड़ी पड़ गई थी और नाख़ून वो काट लेते थे. हमने पपड़ी उघाड़ दी और राजनीति के पुराधाओं के नाख़ून काम आ गए. पापा की दुनाली जुगाली कर रही थी, हम गोली ले आए हैं. पापा यार स्वार्थी थे. उन्हें घर, गाड़ियां और बच्चे चाहिए थे ताकि उनकी पढ़ाई में अपनी गाढ़ी कमाई लगा सकें. उनके सपने ही छोटे थे. हमारे बड़े हैं. हमें देश बदलना है. हमारे पास दर्द है, गुस्सा है, और हम विचारधाराएं उधार ले आए हैं.
पश्चिम से. हमने किताबें नहीं पढ़ी हैं. हमने सिर्फ रेडिट के थ्रेड्स पढ़े हैं. मार्क्स, अंबेडकर, भगत सिंह, चे - ये सब अब प्रोफाइल पिक्चर में लगाए हैं. हमें अपनी ख़ुद की तरक्की और उपलब्धियों से कोई फर्क नहीं पड़ता. तरक्की तो हमारे माता-पिता ने की थी, और देख लो वे कहां पहुंचे और देश कहां पहुंच गया. स्वार्थी लोग. स्वार्थी और भ्रष्ट सिस्टम. उन्होंने समझौते किए ताकि अपना भला कर सकें. हम शेयर करते हैं. गुस्सा, नारा, और पासवर्ड. हमें पश्चिम जैसे अधिकार चाहिए और चीन जैसी प्रगति. हम सब मिलकर इस सिस्टम को उखाड़ फेंकेंगे और आखिरकार एक विकसित देश बन जाएंगे. फ्रांस न सही, कम से कम नेपाल या बांग्लादेश ही सही. हम करके रहेंगे!
कमलेश सिंह