धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ जैसा उबाल था, CJP के इस प्रोटेस्ट में वैसी गर्मी क्यों नहीं दिखी?

कॉकरोच जनता पार्टी के धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ आंदोलन में जिस तरह की भीड़ दिखी थी, वैसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन में नजर नहीं आई. इसकी वजह मुद्दों का फर्क, आम लोगों से जुड़ाव की कमी, पुलिस की सख्ती और सोशल मीडिया की लोकप्रियता का सड़क पर भीड़ में न बदल पाना हो सकता है. यह प्रदर्शन CJP के साथ विपक्षी दलों के लिए भी सबक है कि केवल बड़े चेहरों और गंभीर आरोपों से कोई जनआंदोलन खड़ा नहीं होता.

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इसी साल जून में हुए CJP प्रोटेस्ट एक बड़ा जनआंदोलन बनकर उभरा था (Photo- PTI) इसी साल जून में हुए CJP प्रोटेस्ट एक बड़ा जनआंदोलन बनकर उभरा था (Photo- PTI)

राहुल चौहान

  • नई दिल्ली,
  • 11 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 11:48 PM IST

किसी भी आंदोलन की ताकत का अंदाजा केवल इस बात से नहीं लगाया जा सकता कि उसके समर्थन में कितने बड़े नेता सामने आए, कितने लोगों को हिरासत में लिया गया या सुरक्षा के कितने इंतजाम करने पड़े. असली पैमाना यह होता है कि आंदोलन की अपील पर आम लोग कितनी बड़ी संख्या में अपने घरों से निकले और कितने लोग उस मुद्दे को खुद से जुड़ा मानते हैं. कॉकरोच जनता पार्टी के हालिया प्रदर्शन को इसी कसौटी पर देखने की जरूरत है.

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मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और वोटर लिस्ट SIR के खिलाफ शुरू हुए इस आंदोलन में राजनीतिक हलचल तो खूब रही, लेकिन सड़कों पर वैसी भीड़ नहीं दिखी, जैसी कुछ महीने पहले पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ हुए आंदोलन में नजर आई थी. यह अंतर इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि पिछली बार सीजेपी ने अपनी ताकत का एहसास केवल अपने बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट से नहीं कराया था. सड़कों पर भी उसका असर देश ही नहीं, दुनियाभर की मीडिया में भी दिखा.

परीक्षा व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों और छात्रों के भविष्य से जुड़े सवालों पर शुरू हुआ आंदोलन कई दिनों तक चला. सोनम वांगचुक जैसे चेहरों के अलावा बड़ी संख्या में छात्रों और युवाओं की भागीदारी ने इसे व्यापक चर्चा का विषय बनाया. आंदोलन के दौरान टकराव और पुलिस कार्रवाई की कई बड़ी घटनाएं भी सामने आईं. और आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद आंदोलन खत्म हुआ. उस घटनाक्रम ने सीजेपी को एक ऐसे संगठन के रूप में पहचान दिलाई, जो युवाओं के गुस्से को सड़क पर उतार सकता है.

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लेकिन ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन में पिछली बार जैसी तस्वीर नहीं बनी. कुछ-कुछ जगह प्रदर्शनकारियों को जोश हाई हुआ भी तो पुलिस की सख्ती ऐसी थी कि वह लो कर दिया गया. अब सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या चुनाव आयोग से जुड़ा मुद्दा आम लोगों को उसी तरह प्रभावित नहीं कर पाया, जिस तरह परीक्षा और छात्रों के भविष्य से जुड़ा सवाल करता है? क्या आंदोलन की रणनीति में कोई कमी रही? या फिर इस बार की व्यापक पुलिस व्यवस्था और प्रदर्शन से पहले की गई हिरासत की कार्रवाई ने भीड़ को एक जगह जुटने ही नहीं दिया? इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है, क्योंकि किसी आंदोलन की सफलता को समझने के लिए केवल उसके आयोजकों के दावों या प्रशासन की कार्रवाई को देखना पर्याप्त नहीं है.

पिछली बार मुद्दा सीधे छात्रों के भविष्य से जुड़ा था

धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ हुए आंदोलन और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के बीच सबसे बड़ा अंतर मुद्दों की प्रकृति का है. परीक्षा में गड़बड़ी और प्रश्नपत्र लीक होने के आरोपों का असर सीधे छात्रों और उनके परिवारों पर पड़ता है. जिस युवा ने सालों तक किसी परीक्षा की तैयारी की हो, जिसके परिवार ने उसकी पढ़ाई पर पैसा और समय लगाया हो, उसके लिए परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी का आरोप किसी दूर की राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं होता. उसे और उसके परिवार को अपना भविष्य दांव पर लगा दिखाई देता है.

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यही वजह है कि शिक्षा से जुड़ा कोई विवाद अचानक बड़े जनआंदोलन में बदल सकता है. छात्र अपने अनुभव के आधार पर उसमें शामिल होते हैं. उनके परिवार भी इस मुद्दे से सीधे जुड़ जाते हैं. सोशल मीडिया पर चलने वाला कैंपेन सड़कों तक पहुंचने लगता है और देखते ही देखते आंदोलन का दायरा बढ़ जाता है. ऐसा ही कुछ सीजेपी के पिछले आंदोलन में दिखा भी.

इसके मुकाबले वोटर लिस्ट SIR एक महत्वपूर्ण, लेकिन तकनीकी और प्रक्रियागत विषय है. इसका असर नागरिकों के मतदान के अधिकार पर पड़ सकता है, लेकिन हर व्यक्ति इस प्रक्रिया को आसानी से समझ नहीं पाता. वोटर लिस्ट में नाम हटने, जोड़ने और पात्रता तय करने की प्रक्रिया के बारे में जानकारी का अभाव भी आंदोलन की अपील को सीमित कर सकता है.

हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा सवाल छात्रों के भविष्य से कम महत्वपूर्ण है. मतदान का अधिकार लोकतंत्र की बुनियाद है. किसी योग्य वोटर का नाम लिस्ट से गलत तरीके से हट जाए, तो वह अपने अधिकार से वंचित हो सकता है. लेकिन किसी मुद्दे का संवैधानिक महत्व और उसके समर्थन में सड़क पर उतरने वाले लोगों की संख्या दो अलग-अलग बातें हैं. अभिजीत दिपके और उनके संगठन के सामने चुनौती यही रही कि वह इस जटिल मुद्दे को आम नागरिक की रोजमर्रा की चिंता से नहीं जोड़ सके.

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सिर्फ बड़े नामों से भीड़ नहीं जुटती

इस बार के प्रदर्शन में राजनीतिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और चर्चित चेहरों की भागीदारी ने इसे सुर्खियों में जरूर रखा. कई नेताओं और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिए जाने की तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए. इसके बावजूद प्रदर्शन का दिखाई देने वाला स्वरूप पिछली बार की तरह एकजुट जनआंदोलन का नहीं बन पाया. यह बात किसी भी आंदोलन के लिए सोचने वाली बात है.

दरअसल, राजनीतिक समर्थन आंदोलन को मंच दे सकता है, मीडिया का ध्यान खींच सकता है और सरकार पर दबाव बनाने में मदद कर सकता है. लेकिन केवल बड़े चेहरों के जुड़ जाने से आम जनता किसी भी आंदोलन का हिस्सा नहीं बन सकती. इसके लिए लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि जिस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन किया जा रहा है, उसका सीधा संबंध उनके अधिकारों और हितों से है.

धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ आंदोलन में छात्रों की अपनी शिकायतें थीं. उनके पास अपनी परेशानी बताने के लिए ठोस उदाहरण थे. इसके उलट, वोटर लिस्ट के पुनरीक्षण को लेकर सीजेपी और विपक्ष को आम जनता को यह समझाना होगा कि प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों का असर किस तरह उन पर सीधा पड़ रहा है और इससे उनका भविष्य कैसे प्रभावित हो सकता है. राजनीतिक मंच से आरोप लगाना आसान हो सकता है, लेकिन उन आरोपों को आम जनता की चिंता में बदलना कठिन है. 

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पुलिस की सख्ती ने भी बदली आंदोलन की तस्वीर

इस बार प्रदर्शन में कम भीड़ दिखाई देने पर चर्चा करते समय पुलिस की भूमिका को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं होगा. धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ हुए आंदोलन के दौरान प्रशासन को भीड़ और प्रदर्शन के विस्तार से निपटने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था. तब सीजेपी को दिल्ली पुलिस ने शर्तों के साथ आंदोलन करने की परमिशन दे दी गई थी. लेकिन तब दिल्ली पुलिस ने भी नहीं सोचा होगा कि इतनी भीड़ जुट जाएगी और आंदोलन इतना लंबा खिंच जाएगा.

यही कारण रहा है कि इस बार सब इसका उलट रहा. दिल्ली पुलिस ने परमिशन देने से साफ इनकार कर दिया. साथ ही राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था कहीं अधिक व्यापक रखी गई. 20 हजार जवानों की तैनाती कर दी गई और बॉर्डरों पर सख्ती बढ़ा दी गई. 45 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए. वहीं जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर कई लेयर में बैरिकेडिंग लगा दी गई. सीजेपी के बड़े चेहरों, नेताओं और अन्य प्रदर्शनकारियों को पहले से ही हिरासत में ले लिया गया. दिल्ली पुलिस ने अपनी सख्त प्लानिंग से इस बार के सीजेपी आंदोलन को पसरने ही नहीं दिया.

हालांकि ऐसी स्थिति में सिर्फ तस्वीरों या किसी एक जगह मौजूद भीड़ को देखकर यह कहना ठीक नहीं होगा कि आंदोलन को लोगों का समर्थन नहीं मिला. कारण, जब प्रदर्शनकारियों को तय जगह तक पहुंचने से रोका जाता है, तो आंदोलन में शामिल होने वाले लोगों की सही संख्या का अंदाजा लगाना भी मुश्किल हो जाता है. कम भीड़ दिखने की एक वजह लोगों का कम समर्थन हो सकता है, लेकिन पुलिस की पाबंदियां भी इसमें भूमिका निभा सकती हैं. फिर भी, यह सवाल अपनी जगह है कि क्या सीजेपी इस बार वैसा दबाव बना पाई, जैसा पिछले आंदोलन के दौरान दिखाई दिया था. पिछली बार लाठीचार्ज, आंसू गैस गोले जैसी कार्रवाई के बावजूद युवा प्रदर्शनकारी अड़े रहे. जो इस बार बिल्कुल नजर नहीं आया.

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सोशल मीडिया का शोर और सड़क की हकीकत

कॉकरोच जनता पार्टी के पिछले आंदोलन की सफलता में सोशल मीडिया की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही. डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मुद्दे को लेकर चर्चा बढ़ी, युवाओं ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं और आंदोलन को व्यापक पहचान मिली. लेकिन सोशल मीडिया पर किसी कैंपेन की लोकप्रियता हमेशा सड़क पर भीड़ में तब्दील नहीं होती. किसी पोस्ट पर हजारों प्रतिक्रियाएं आ सकती हैं, कोई वीडियो तेजी से फैल सकता है और किसी नेता के बयान पर बड़ी बहस हो सकती है. लेकिन इनमें से कितने लोग वास्तव में आंदोलन के मकसद से सहमत हैं, कितने लोग केवल चर्चा में हिस्सा ले रहे हैं और कितने लोग प्रदर्शन में शामिल होने के लिए तैयार हैं, इसका अंदाजा केवल ऑनलाइन एक्टिविटी से नहीं लगाया जा सकता.

यही चुनौती अब CJP के सामने है. पहले आंदोलन से बनी पहचान के कारण उससे बड़ी उम्मीदें जुड़ गई थीं. ऐसे में दूसरे बड़े प्रदर्शन की तुलना अपने आप पहले आंदोलन से होने लगी. लेकिन किसी एक आंदोलन की सफलता का मतलब यह नहीं कि संगठन हर मुद्दे पर वैसी ही भीड़ जुटा पाएगा. हर आंदोलन की अपनी परिस्थितियां होती हैं. ऐसे में सीजेपी को यह समझना होगा कि पहले आंदोलन से मिली लोकप्रियता अपने आप आगे के आंदोलनों में समर्थन की गारंटी नहीं है. इसके अलावा CJP के हालिया प्रदर्शन से विपक्षी दलों को भी बड़ा मैसेज मिल सकता है.

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