शिवसेना का आज स्थापना दिवस है. 19 जून 1966 को बाला साहेब ठाकरे ने मराठी भाषी लोगों के अधिकारों और क्षेत्रीय गौरव की लड़ाई लड़ने के लिए शिवसेना की स्थापना की थी. 2022 के बाद बंटी हुई शिवसेना के दोनों धड़े अलग-अलग स्थापना दिवस मना रहे हैं. गोरेगांव में एकनाथ शिंदे, और सायन में उद्धव ठाकरे की रैली है. और, यह ऐसे वक्त हो रहा है जब उद्धव ठाकरे वाले हिस्से में एक और टूट हो गई है. 9 में से 6 सांसदों ने बगावत कर दी है. लेकिन, 6 बागियों में से 4 सार्वजनिक रूप से सामने आए हैं, बाकी 2 अभी अलग अलग वजहों से स्टैंड होल्ड किए हुए हैं.
महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे गुट की तरफ से शिवसेना सांसद श्रीकांत शिंदे ने स्थापना दिवस कार्यक्रम का टीजर रिलीज किया है. टीजर में बाल ठाकरे के पुराने-मशहूर बयान शामिल किए गए हैं - 'मैं शिवसेना को कांग्रेस नहीं बनने दूंगा', 'I am a mad, mad Hindu!'
दिलचस्प बात यह है कि जो इल्जाम लगाकर एकनाथ शिंदे ने विधायकों के साथ उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी, बागी सांसद भी वैसा ही आरोप लगा रहे हैं. बीजेपी के आरोपों को आगे बढ़ाते हुए एकनाथ शिंदे ने कहा था कि उद्धव ठाकरे हिंदुत्व की विचारधारा से भटक गए हैं. और, अब बागी सांसदों ने भी वही आरोप दोहराया है. रिपोर्ट के अनुसार, स्पीकर को लिखे पत्र से यह बात सामने आई है. बागी सांसदों का दावा है कि ठाकरे गुट के सीनियर नेता शिवसेना का विलय कांग्रेस में करना चाहते हैं, उद्धव ठाकरे विचारधारा बदल चुके हैं. ऐसे सांसदों की दलील है कि पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए वे अलग हो रहे हैं.
शिंदे की महायुति में दबदबा बढ़ाने की कवायद
महाराष्ट्र में तख्तापलट और शिवसेना के दो टुकड़े कर देने के एवज में एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई थी, सांसदों की बगावत के बाद एक बार फिर उनके समर्थक उनको सीएम बनाए जाने के लिए आवाज बुलंद करने लगे हैं. शिंदे सेना विधायक बच्चू कडू का कहना है कि शिवसैनिकों की इच्छा है कि एकनाथ शिंदे फिर से राज्य की कमान संभालें. हालांकि, इसे अपना निजी विचार भी करार दिया. एक कार्यक्रम के दौरान बच्चू कडू ने किसानों की समस्याओं और बढ़ती आत्महत्याओं का मुद्दा उठाते हुए कहा, विदर्भ क्षेत्र से मुख्यमंत्री होने के बावजूद किसानों की परेशानियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं.
ऐसे ही शिंदे कोटे से महायुति सरकार में मंत्री उदय सामंत कहते हैं, जिस तरह बीजेपी कार्यकर्ताओं की भावना होती है कि देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बनें, ठीक वैसे ही शिवसेना कार्यकर्ता और नेता चाहते हैं कि एकनाथ शिंदे उस पोजीशन में दिखें. बच्चू कडू की तरह उदय सामंत ने अपनी बातों को राजनीतिक विवाद के बजाय स्वाभाविक राजनीतिक आकांक्षा के रूप में समझने की गुजारिश की है.
महाराष्ट्र में बीजेपी के अपने दम पर 132 सीटें जीत लेने के बाद देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री की कुर्सी दोबारा हासिल कर ली, और तमाम विरोध, डिमांड और रूठ जाने के बावजूद एकनाथ शिंदे को डिप्टी सीएम के पद से ही संतोष करना पड़ा. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एकनाथ शिंदे को 57 सीटें मिली थीं. बेशक एकनाथ शिंदे अब जो करने जा रहे हैं, उनकी दावेदारी पहले के मुकाबले ज्यादा तो हो गई है, लेकिन देवेंद्र फडणवीस अब भला क्यों समझौता करेंगे. और, बीजेपी आलाकमान को भी ये सब क्यों मंजूर होगा.
एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी भले न जता पाएं, लेकिन केंद्र में सत्ताधारी एनडीए में तो उनकी पोजीशन बढ़ ही जाएगी. हाल ही में एक कार्यक्रम में न्योते को लेकर देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के समर्थकों के बीच भारी तल्खी देखने को मिली थी. मामला इतना गंभीर हो गया कि मुख्यमंत्री कार्यालय को आयोजकों के खिलाफ नोटिस जारी करना पड़ा.
हाल फिलहाल शिंदे खेमा महायुति में अपनी उपेक्षा, और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की उद्धव ठाकरे से बढ़ती करीबी से भी परेशान दिखा. मातोश्री से आदित्य ठाकरे के आधी रात के एक कॉल की भी खूब चर्चा रही, जिसके बाद देवेंद्र फडणवीस ने फटाफट एक्शन लेते हुए बीएमसी में हो रहे बदलाव पर तत्काल प्रभाव से ब्रेक लगा दिया था.
अब एकनाथ शिंदे ने एक तीर से डबल निशाने साधे हैं. उद्धव ठाकरे की तो संपूर्ण बर्बादी का इरादा झलक रहा है, निशाने पर देवेंद्र फडणवीस भी लगते हैं. महायुति में नंबर के मामले में भले ही एकनाथ शिंदे पिछड़ गए हों, लेकिन 'ऑपरेशन टाइगर' के सफल होते ही एनडीए में एकनाथ शिंदे का दबदबा कायम हो जाएगा.
कहा जाता रहा है कि केंद्र की एनडीए सरकार चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार की बैसाखी पर टिकी हुई है, लेकिन अब तो आधा समीकरण बदल चुका है, आधा बदलने की राह पर है. 16 सांसदों के साथ टीडीपी नेता और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू एनडीए में दूसरी पोजीशन पर कब्जा जमाए हुए थे, लेकिन 20 सांसदों वाली NCPI ने टीडीपी को तीसरे स्थान पर पहुंचा दिया है.
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना को 9-9 सीटें मिली थीं, जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 7 ही सीटें मिल पाई थीं. अब अगर उद्धव ठाकरे के हिस्से के 6 सांसद एकनाथ शिंदे के साथ मिल जाते हैं, तो लोकसभा में उनके 13 सांसद हो जाएंगे.
13 सांसदों का नेता बनते ही एकनाथ शिंदे एनडीए में नीतीश कुमार को पीछे छोड़ देंगे. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू के 12 सांसद हैं. देखा जाए तो बीजेपी के सामने नीतीश कुमार की जेडीयू के मुकाबले एकनाथ शिंदे की अहमियत बढ़ जाएगी - और अगले मंत्रिमंडल विस्तार में भी उनकी दावेदारी बढ़ सकती है.
अब अगर एनडीए में एकनाथ शिंदे का कद बढ़ेगा तो अपने आप महायुति में देवेंद्र फडणवीस के लिए भी उनको नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
बार बार क्यों चूक जाते हैं उद्धव ठाकरे
शिवसेना के इतिहास को देखें, तो शिवसेना में ताजा बिखराव कोई नई बात नहीं लगती - 60 साल में शिवसेना में 6 बार टूट दर्ज की गई है.
2022 की बगावत जहां उद्धव ठाकरे के लिए जोरदार झटका था, 2026 की टूट ने बर्बादी की कगार पर पहुंचा दिया है.
1. शिवसेना में 70 के दशक में पहली टूट तब देखी गई जब मुंबई के एक नेता बंदू शिंगरे ने बाला साहेब ठाकरे से अलग होकर अपना अलग दल बना लिया था.
2. दिसंबर, 1991 में छगन भुजबल की बाल ठाकरे के खिलाफ बगावत की काफी चर्चा रही है. तब छगन भुजबल महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता हुआ करते थे, और शिवसेना के 52 विधायकों में से 18 के उनके सपोर्ट में होने का दावा किया गया था - लेकिन 6 विधायकों का ही समर्थन मिल सका. बाद में बागी गुट ने कांग्रेस से हाथ मिला लिया था.
3. जुलाई, 2005 में नारायण राणे ने भी जोरदार झटका दिया था, जिसे 1999 में बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री भी बनवाया था. तब शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने वाले नारायण राणे फिलहाल बीजेपी में हैं.
4. उद्धव ठाकरे को शिवसेना की कमान सौंप दिए जाने के बाद बाल ठाकरे के उत्तराधिकार के दावेदार राज ठाकरे ने 2006 में शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बना ली थी.
मराठी मानुष के मुद्दे पर कुछ दिनों पहले उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे साथ देखे गए थे, लेकिन बाद में मामला ठंडा ही पड़ गया लगता है.
5. शिवसेना के लिए पहली बार 2022 में बड़ा झटका 55 में से 40 विधायकों के साथ एकनाथ शिंदे की बगावत थी - और अब वही एकनाथ शिंदे दूसरा झटका दे रहे हैं.
उद्धव ठाकरे के लिए कांग्रेस के साथ बने रहना भारी पड़ रहा है. अव्वल तो बीजेपी नेतृत्व चैलेंज करते हुए टकराना महंगा साबित हो रहा है, लेकिन नई टूट में सांसदों का कांग्रेस का नाम लेकर हिंदुत्व के एजेंडे वाली पार्टी के बचाव की दलील 2022 की पुनरावृत्ति ही दर्शाती है.
हिंदुत्व के एजेंडे वाली राजनीतिक विरासत को नया कलेवर देने की कोशिश में उद्धव ठाकरे को बार बार कीमत चुकानी पड़ रही है. शिवसेना के आक्रामक रुख को नरम करने तक तो चल जाता था, लेकिन हिंदुत्व की कट्टर हिंदुत्व वाली राजनीतिक विचारधारा से आगे बढ़कर उद्धव ठाकरे का धर्मनिरपेक्ष होना उनके शिवसैनिक हजम नहीं कर पा रहे हैं. 2022 के बाद जो भी नेता साथ थे, उनके साथ होने की वजह भी खास ही रही होगी, लेकिन अब वो बॉन्ड भी कमजोर पड़ गया है - और उद्धव ठाकरे राजनीति के उसी मोड़ पर चूक जाते हैं.
मृगांक शेखर