बाढ़ आ गई है... सड़कें पानी में डूब गई हैं... अब शादी कैसे होगी? ये सवाल ओडिशा के जाजपुर जिले के एक परिवार के सामने भी था. चारों तरफ पानी ही पानी. गांव का संपर्क सड़क से कट चुका था. उधर शादी की तारीख महीनों पहले तय हो चुकी थी. मुहूर्त निकल चुका था, रिश्तेदार बुलाए जा चुके थे और दुल्हन इंतजार में थी.
अब दो ही रास्ते थे. या तो शादी टाल दी जाए... या फिर रास्ता बदल दिया जाए. दूल्हे ने दूसरा रास्ता चुना. कार नहीं मिली... बस नहीं चली... सड़क भी नहीं बची... तो पूरी बारात देसी नाव पर सवार हो गई. ओडिशा इस वक्त बाढ़ की मार झेल रहा है. नदियां उफान पर हैं. गांव टापू बन चुके हैं. जाजपुर जिले के सिमिलिया गांव का भी यही हाल है. सड़कें कई फीट पानी के नीचे हैं. ऐसे में किसी का गांव से बाहर निकलना भी चुनौती है.
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इसी गांव के एक युवक की शादी ढेंकानाल जिले के भुवन इलाके में तय थी. तारीख बदलना आसान नहीं था. इसलिए परिवार ने फैसला किया कि अगर सड़क नहीं है, तो पानी ही रास्ता बनेगा.
दूल्हा तैयार हुआ. बाराती भी सज-धजकर पहुंचे. इस बार घोड़ी नहीं थी... लग्जरी कार नहीं थी... और न ही डीजे वाली गाड़ी. दूल्हा, रिश्तेदार और बाराती पारंपरिक मोटरचालित देसी नाव, जिसे स्थानीय भाषा में 'भुटभुटी' कहा जाता है, उस पर सवार हुए. जिस नाव का इस्तेमाल गांव वाले रोजमर्रा के सफर के लिए करते हैं, उसी पर इस बार शादी की रौनक सजी थी.
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दूल्हा शेरवानी में बैठा था. रिश्तेदार हंसी-मजाक कर रहे थे. बच्चे भी सफर का मजा ले रहे थे. नाव धीरे-धीरे बाढ़ के पानी को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी. जिसने भी यह नजारा देखा, वह कुछ देर के लिए ठहर गया. किसी ने मोबाइल निकाला... किसी ने वीडियो बनाया... और देखते ही देखते यह अनोखी बारात चर्चा का विषय बन गई.
दूल्हे ने कहा- ये शादी जिंदगी भर याद रहेगी
दूल्हे का कहना है कि उसने कभी नहीं सोचा था कि अपनी ही शादी में उसे नाव से जाना पड़ेगा. लेकिन अब यही सफर उसकी जिंदगी की सबसे यादगार कहानी बन गया है. शादी तो हर किसी की होती है, लेकिन हर किसी की बारात बाढ़ के पानी के बीच से नहीं गुजरती.
यह कहानी उस हकीकत की भी है, जिससे ओडिशा के बाढ़ प्रभावित गांव हर साल गुजरते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि हर मानसून में सड़कें डूब जाती हैं. गांवों का संपर्क टूट जाता है. स्कूल जाना हो, अस्पताल पहुंचना हो या किसी जरूरी काम से बाहर निकलना हो... नाव ही एकमात्र सहारा बचती है. यानी जिस नाव पर इस बार बारात निकली, उसी नाव पर कई बार मरीज भी अस्पताल पहुंचते हैं. लेकिन बाढ़ उतरने के बाद भी सवाल वहीं रहेगा कि क्या हर मानसून में लोगों को अपनी जिंदगी नाव के भरोसे ही जीनी पड़ेगी?
अजय कुमार नाथ