इंदौर मुहर्रम मेले पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला... नगर निगम का आखिरी वक्त में लिया गया फैसला बदला, शर्तों के साथ दी मंजूरी

इंदौर नगर निगम ने अदालत में कहा कि धोबी घाट पर पारंपरिक रूप से केवल ताजिया विसर्जन होता रहा है, मेला नहीं लगता था. निगम ने यह भी दावा किया कि पिछले वर्ष आयोजन समिति ने अनुमति की शर्तों का उल्लंघन किया था और पूरी फीस भी जमा नहीं की थी.

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aajtak.in

  • इंदौर ,
  • 26 जून 2026,
  • अपडेटेड 12:00 AM IST

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने मुहर्रम मेले को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने इंदौर नगर निगम की मेयर-इन-काउंसिल की ओर से मंजूरी रद्द करने के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया है. अदालत ने मेले की अनुमति बहाल करते हुए कहा कि नगर निगम ने उचित प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया.

पूरा मामला मुहर्रम मेले के पारंपरिक आयोजन से जुड़ा है, जिसे लेकर 'वक्फ कर्बला इंतजामिया कमेटी' ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि कमेटी हर साल शहर के धोबी घाट पर ताजिया जुलूस और मुहर्रम मेले का आयोजन करती आ रही है और इंदौर नगर निगम समय-समय पर इसकी लिखित अनुमति देता रहा है.

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इस साल भी नगर निगम ने 25 जून को एक आधिकारिक आदेश जारी कर 26 जून से 28 जून तक (तीन दिन) मेले के आयोजन की अनुमति दी थी, जिसके एवज में कमेटी ने 1.36 लाख रुपये की निर्धारित फीस का भुगतान भी कर दिया था.

लेकिन, इसी बीच 25 जून की रात को ही मेयर-इन-काउंसिल (MIC) ने अचानक एक आपातकालीन बैठक बुलाई और दी गई मंजूरी को निरस्त करने का एकतरफा प्रस्ताव पारित कर दिया. वक्फ कमेटी का आरोप था कि उन्हें न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही उनका पक्ष सुना गया.

हाई कोर्ट में टिक नहीं पाए नगर निगम के तर्क
सुनवाई के दौरान इंदौर नगर निगम (IMC) ने कोर्ट में मेले का विरोध करते हुए दलील दी कि साल 2024 के एक पुराने अदालती फैसले के अनुसार, धोबी घाट पर केवल 0.02 एकड़ जमीन का उपयोग पारंपरिक रूप से होता है और वह भी मेले के लिए नहीं बल्कि सिर्फ ताजिया विसर्जन के लिए है. निगम ने यह भी आरोप लगाया कि पिछले साल कमेटी ने इवेंट की पूरी फीस जमा नहीं की थी और शर्तों का उल्लंघन किया था.

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दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्तत पवन कुमार द्विवेदी ने नगर निगम के तर्कों को खारिज कर दिया. कोर्ट ने पाया कि नगर निगम ने 25 जून को जो मंजूरी पत्र जारी किया था, उसमें पिछले साल की किसी शर्त के उल्लंघन या बकाया का कोई जिक्र नहीं था.

नगर निगम ऐसा कोई भी दस्तावेज पेश करने में नाकाम रहा जिससे साबित हो कि पिछले साल की शर्तों के उल्लंघन पर कमेटी के खिलाफ कोई कार्रवाई की गई थी.

मेले के लिए आवेदन 3 जून को ही दे दिया गया था, लेकिन निगम ने 25 जून तक इंतजार किया और फिर उसी रात बिना किसी पूर्व सूचना या नोटिस के मंजूरी वापस ले ली.

अदालत ने साफ तौर पर कहा कि म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने जिस तरह से इस पूरे संवेदनशील मामले को हैंडल किया, वह प्रशासनिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है.

केवल इस साल के लिए प्रभावी रहेगा आदेश
हाई कोर्ट ने वक्फ कमेटी की याचिका को स्वीकार करते हुए 25 जून के एमआईसी प्रस्ताव को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया और सभी शर्तों के साथ मेले की परमिशन बहाल कर दी. हालांकि, अदालत ने अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया है कि यह फैसला केवल इसी साल (2026) के मेले के लिए मान्य है और कोर्ट ने इस विशिष्ट स्थान पर हर साल कार्यक्रम आयोजित करने के स्थायी अधिकार के सवाल पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

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भविष्य में ऐसी कानून-व्यवस्था या प्रशासनिक असमंजस की स्थिति से बचने के लिए हाई कोर्ट ने एक सख्त गाइडलाइन भी जारी की है. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अगले साल से आयोजन समिति को मेला शुरू होने से कम से कम ढाई महीने पहले अपना आवेदन नगर निगम में जमा करना होगा और नगर निगम प्रशासन को मेला शुरू होने से कम से कम 30 दिन पहले उस आवेदन पर अपना अंतिम और स्पष्ट निर्णय लेना होगा.

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