इंदौर से रिश्तों को झकझोर देने वाली एक बेहद मार्मिक घटना सामने आई है. यहां एक 85 वर्षीय मां अपने बेटे के लौटने की उम्मीद में साढ़े चार साल तक वृद्धाश्रम में इंतजार करती रही, लेकिन जिस बेटे ने दो दिन में वापस आने का वादा किया था, वह फिर कभी मां को लेने नहीं आया. जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर मां की आंखें बेटे की राह देखती रहीं और जब उनकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं, तब भी बेटा अंतिम विदाई देने नहीं पहुंचा.
मीटिंग का बहाना बना, 2 दिन में लौट आने का किया था वादा
85 वर्षीय सरिता नारायणे को उनका बेटा जनवरी 2022 में इंदौर के निराश्रित आश्रम में छोड़कर गया था. उसने आश्रम प्रबंधन से कहा था कि उसकी मीटिंग है और वह सिर्फ दो दिन बाद वापस आकर मां को अपने साथ घर ले जाएगा. बेटे की यह बात सुनकर सरिता को भरोसा था कि उनका बेटा उन्हें लेने जरूर आएगा. लेकिन दो दिन बीते, फिर महीने और देखते ही देखते करीब साढ़े चार साल गुजर गए.
आश्रम प्रबंधन के मुताबिक सरिता अक्सर अपने बेटे की बातें करती थीं. वह उससे मिलने और उसके घर वापस जाने की इच्छा जताती थीं. उम्र बढ़ने के साथ उनकी तबीयत बिगड़ने लगी. आंखों की रोशनी भी कमजोर हो गई. आश्रम ने दानदाताओं की मदद से उनका चश्मा बनवाया और इलाज की व्यवस्था कराई. मगर जिस बेटे के लिए वह इंतजार करती रहीं, उसने कभी मां का हाल तक नहीं पूछा.
बताया गया कि बेटे ने अपना मोबाइल नंबर बंद कर लिया और दूसरी जगह जाकर रहने लगा. आश्रम की ओर से उससे संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. फिर आया वह दिन जिसका किसी ने शायद कभी सोचा भी नहीं था. 10 अगस्त को सरिता नारायणे ने आखिरी सांस ली. आश्रम प्रबंधन ने बेटे को मां के निधन की सूचना दी, लेकिन इस बार भी उसकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया. एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, बल्कि तीन दिन तक आश्रम प्रबंधन बेटे के आने का इंतजार करता रहा. जब कोई नहीं आया तो आखिरकार आश्रम के लोगों ने ही उन्हें अपनी मां की तरह सम्मान दिया और अंतिम संस्कार कराया.
मां का मकान भी बेच दिया
आश्रम प्रबंधन के मुताबिक बेटे ने मां का मकान भी बेच दिया और इसके बाद उनसे पूरी तरह दूरी बना ली. जिस घर में मां ने अपने बेटे के लिए जिंदगी बिताई, उसी घर से निकलने के बाद वह वृद्धाश्रम में बेटे की वापसी का इंतजार करती रहीं.
निराश्रित आश्रम के संस्थापक यश पाराशर ने बताया कि सरिता अपने बेटे के आने की उम्मीद में रहती थीं. उन्होंने कहा कि आश्रम ने अपनी क्षमता के मुताबिक उनकी देखभाल की और उनके इलाज से लेकर चश्मे तक की व्यवस्था कराई.
सरिता की कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मौत की कहानी नहीं है. यह उस मां की कहानी है, जिसने आखिरी सांस तक बेटे पर भरोसा किया. बेटे ने दो दिन में लौटने का वादा किया था, लेकिन मां की जिंदगी के साढ़े चार साल इंतजार में गुजर गए. आखिर में जब मां चली गई, तब भी बेटा नहीं आया. सवाल यही है कि जिस मां ने बेटे को जिंदगी दी, क्या उसके हिस्से में आखिरी वक्त पर सिर्फ इंतजार और तन्हाई ही रह गई?
धर्मेंद्र कुमार शर्मा