सुबह से ही भोपाल की सड़कों पर असामान्य हलचल थी. राजधानी को किले में तब्दील कर दिया गया था. पुलिस की कई परतों वाली बैरिकेडिंग, बसें, डंपर और भारी पुलिस बल. सबकुछ इस तैयारी के साथ कि किसानों का काफिला मुख्यमंत्री आवास तक न पहुंच सके. लेकिन जैसे-जैसे दिन चढ़ता गया, हालात भी बदलते गए और मैं उन हर पलों का गवाह बना जो इस आंदोलन को यादगार बना गए.
किसान आंदोलन का भोपाल में ये दूसरा दिन था. मंगलवार शाम से भोपाल के वीर सावरकर सेतु के सामने डटे किसान बुधवार सुबह से इंतजार कर रहे थे कि उनके नेता अगला कदम क्या तय करते हैं. सुबह 10 बजते-बजते किसानों ने सड़क पर ही हवन शुरु कर दिया और सरकार की सद्बुद्धि के लिए हवन करने लगे.
कुछ देर बाद किसानों के एक जत्थे ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया और सरकार से मूंग की शत-प्रतिशत MSP पर खरीदी की मांग की. बीच-बीच में प्रदर्शनकारी किसान पुलिस से आगे बढ़ने के लिए टकराव करते लेकिन फिर वापस अपनी जगह लौट आते और नारेबाजी करते रहते.
बैरिकेडिंग को तोड़कर बसों पर चढ़ें प्रदर्शनकारी
बुधवार शाम 4 बजे किसानों के सब्र का बांध टूट गया और सबसे पहला बड़ा टकराव वीर सावरकर सेतु पर हुआ. किसानों को यहीं रोकने के लिए पुलिस ने बैरिकेड और बसों को पूरा सड़क पर दीवार की तरह खड़ा किया था. लेकिन शाम 4 बजे के बाद आंदोलनकारी बैरिकेडिंग को तोड़ते हुए बसों पर चढ़ गए. पुलिस अधिकारी लगातार उन्हें नीचे उतरने और शांत रहने की अपील करते रहे, लेकिन माहौल तेजी से गरमाता जा रहा था.
कुछ ही देर में किसानों ने बैरिकेडिंग हटानी शुरू कर दी. देखते ही देखते सुरक्षा का पहला घेरा टूट गया. इसके बाद जो हुआ, उसने पूरे घटनाक्रम की दिशा बदल दी. किसानों ने पुलिस की चार लेयर बैरिकेडिंग पार कर ली. कई प्रदर्शनकारी पुलिस की बसों पर चढ़ गए. कुछ बसों के भीतर घुसकर उन्हें हटाने की कोशिश करने लगे. पुलिस उन्हें रोक रही थी, लेकिन भीड़ का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था.
इसी दौरान एक ऐसा मंजर सामने आया, जो पूरे आंदोलन की सबसे चर्चित तस्वीर बन गया. जब प्रदर्शनकारी बस हटाकर आगे बढ़ना चाहते थे, तब एडिशनल कमिश्नर मोनिका शुक्ला खुद बस के सामने खड़ी हो गईं. उन्होंने अपने शरीर को ही ढाल बना लिया. कुछ पल के लिए पूरा माहौल ठहर सा गया. आखिरकार प्रदर्शनकारी बस छोड़कर पैदल आगे बढ़ गए.
सरकार विरोधी नारों की गूंज
बैरिकेडिंग पार करने के बाद किसानों का जत्था वीर सावरकर सेतु से होते हुए बोर्ड ऑफिस चौराहे तक पहुंच गया. यहां भी पुलिस ने रास्ता रोकने की पूरी तैयारी कर रखी थी, लेकिन आंदोलनकारी आगे निकल आए. कुछ देर अफरा-तफरी रही और फिर बड़ी संख्या में किसान सड़क पर बैठ गए. सरकार के खिलाफ नारे गूंजने लगे.
यहां से किसान लिंक रोड होते हुए रौशनपुरा चौराहे पर पहुंचे. तब तक शाम के 6 बज चुके थे. इसके आगे बाणगंगा चौराहा था जहां से सीएम आवास महज़ 500 मीटर दूर था लिहाजा रात के अंधेरे में भी पुलिस तेजी से काम करती दिखी. एक तरफ जहां रोशनपुरा चौराहे पर किसानों ने बारिश के बीच डेरा डालकर पीछे से आ रहे दूसरे किसानों का इंतजार शुरु किया तो दूसरी तरफ बाणगंगा चौराहे को अभेद्य सुरक्षा घेरे में बदल दिया गया था. तीन लेयर बैरिकेडिंग, डंपर और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया.
पीएम-आशा योजना के तहत मूंग खरीदी की मंजूरी
इसी बीच मंत्रालय में सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच बातचीत शुरू हुई. बैठक चल ही रही थी कि केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का मुख्यमंत्री मोहन यादव को लिखा गया पत्र सामने आया. पत्र में बताया गया कि केंद्र ने पीएम-आशा योजना के तहत मूंग खरीदी की मंजूरी दे दी है और राज्य सरकार चाहे तो 25 प्रतिशत से ज्यादा खरीदी अपने खर्च पर भी कर सकती है.
पत्र में ये भी लिखा था कि लक्ष्य के मुकाबले अब तक बहुत कम मूंग खरीदी हुई है. करीब तीन घंटे चली बातचीत के बाद आखिरकार सहमति बन गई. कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना ने घोषणा की कि सरकार 60 प्रतिशत तक मूंग खरीदेगी. नर्मदापुरम, सीहोर और हरदा सहित कई जिलों में करीब तीन क्विंटल प्रति एकड़ मूंग खरीदी जाएगी. स्लॉट बुकिंग 10 अगस्त तक और खरीदी 20 अगस्त तक होगी. साथ ही खाद वितरण में लागू ई-टोकन व्यवस्था फिलहाल स्थगित करने का भी फैसला लिया गया.
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समझौते के बाद देर रात प्रशासन ने रोशनपुरा चौराहे को किसानों से खाली करवा लिया. कुछ घंटे पहले जहां नारे, धक्का-मुक्की और बैरिकेड टूटने की आवाजें थीं, वहीं अब सड़कें धीरे-धीरे खाली हो रही थीं. करीब तीन दिन तक चले इस आंदोलन का अंत बातचीत से हुआ. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने राजधानी भोपाल को ऐसे कई दृश्य दिए, जो लंबे समय तक याद किए जाएंगे.
रवीश पाल सिंह