मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से इंसानियत और पारिवारिक रिश्तों को शर्मसार कर देने वाला एक संवेदनहीन मामला सामने आया है. जिस पिता ने जीवन भर पसीना बहाकर अपने बच्चों का पालन-पोषण किया, उसी पिता की मौत के बाद उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए उनके अपने बच्चे नहीं पहुंचे. पिता के निधन के बाद जब उनके बेटों और बेटी को सूचना दी गई, तो उन्होंने आने से साफ इनकार कर दिया और वृद्धाश्रम प्रबंधन से अंतिम संस्कार करके 'डेथ सर्टिफिकेट' भिजवाने की बात कह दी.
दरअसल, मूल रूप से इंदौर के रहने वाले 70 वर्षीय घनश्याम सिंह पिछले ढाई सालों से भोपाल स्थित 'अपना घर' वृद्धाश्रम में रह रहे थे. घनश्याम सिंह के गाल में एक गंभीर बीमारी थी, जिसके कारण वे बोल पाने में पूरी तरह असमर्थ थे.
अकेलेपन में बीता आखिरी समय
बुजुर्ग के दो बेटे और एक बेटी हैं, जो इंदौर में प्राइवेट नौकरियां करते हैं, लेकिन जीवन के अंतिम पड़ाव में परिवार का कोई भी सदस्य उनके साथ नहीं था. शुक्रवार को बीमारी के चलते वृद्धाश्रम में ही उनका निधन हो गया.
'पिता से कोई वास्ता नहीं, आप ही कर दो दाह संस्कार'
घनश्याम सिंह के निधन के बाद 'अपना घर' की संचालिका माधुरी मिश्रा ने जब उनके परिजनों से संपर्क किया, तो बच्चों के जवाब ने हर किसी का दिल दहला दिया.
जब संचालिका ने सबसे पहले मृतक की बेटी को फोन लगाकर पिता के निधन की सूचना दी, तो बेटी ने कहा, ''हमारे पिताजी ने हमें छोटी-छोटी चीजें भी नहीं दी हैं. हमारा उनसे कोई वास्ता नहीं है. आप उनके बेटों से बात कीजिए.''
इसके बाद जब इंदौर में रह रहे बेटों से बात की गई, तो उन्होंने आने से मना करते हुए कहा, ''आप ही अंतिम संस्कार करवा दीजिए और बाद में हमें डेथ सर्टिफिकेट भिजवा देना.''
पुलिस की मदद से हुआ अंतिम संस्कार
बच्चों के इस अमानवीय रवैये के बाद 'अपना घर' की संचालिका माधुरी मिश्रा और वृद्धाश्रम प्रबंधन ने पुलिस की मदद ली.
पुलिस और स्थानीय लोगों की मौजूदगी में 70 वर्षीय घनश्याम सिंह का भोपाल के भदभदा विश्राम घाट में रीति-रिवाज के साथ अंतिम संस्कार किया गया.
सभ्य समाज पर सवाल
जिस पिता के जनाजे को बेटों का कंधा मिलना चाहिए था, वहां वृद्धाश्रम के कर्मचारियों और पुलिस ने उन्हें अंतिम विदाई दी. यह घटना समाज में बुजुर्गों के प्रति घटती संवेदनशीलता और टूटते पारिवारिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
धर्मेंद्र साहू