इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एक बार दिल्ली से दो प्रोफेसर्स ... कुछ काम रहा होगा उन्हें... काम वाम निपटाने के बाद.. जब वो यूनिवर्सिटी से बाहर निकले तो ... गेट पर खड़े हुए ऑटो रिक्शा वाले को बुलाया... औऱ उससे कहा होटल तक ड्रॉप कर दो... ऑटो वाले ने कहा ठीक है बैठिये... अब ऑटो रिक्शा चल दिया... ये दोनों प्रोफेसर्स पीछे वाली सीट पर बैठे इंग्लिश लिटरेटचर की बातें करने लगे...
एक बोला, “भई देखिए Kafka के यहाँ Alienation सिर्फ सोशल सेपरेशन नहीं है बल्कि एक Existential condition है। उनके किरदार अपने ही वजूद से Estranged हैं”
दूसरा बोले, "नहीं वो ठीक है लेकिन ये तो आप मानेंगे कि काफका के यहाँ Absurdity कोई literary device नहीं, बल्कि एक Existential reality है। Metamorphosis में Gregor का कीड़े में तब्दील होना Dehumanisation का Metaphor है"
पहला बोला, - “नहीं, नहीं,नहीं,नहीं... Dehumanisation वाली बात पर मेरा एतराज़ है देखिए.. वो तो दोस्तोयेव्स्की की ताकत है... कि वो इंसानी ज़हन को किसी नैतिक धरातल पर नहीं रखते। और यही उनका Psychological और Philosophical universe है"
पहले वाले ने कहा, “नहीं देखिए ये तो मैं भी मानता हूं.... लेकिन मेरा प्वाइंट बस ये है कि जैसे वो The Stranger कहानी में वो लड़का जिसकी मां मर जाती है पर उसे रोना नहीं आता और दुनिया उसे जज करती है कि ये रो क्यों नहीं रहा.. अरे वो कौन राइटर हैं... आ...
दूसरे वाले प्रोफेसर साहब नाम जानते थे पर उनकी ज़बान पर नहीं आ रहा था। वो तड़पने से लगे, “अरे वो... क्या नाम है.. अरे.. देखो... ज़हन से उतर गया... अरे अच्छा सा नाम है”
- अल्बैर कामू
अचानक आटो की अगली सीट से आवाज़ आई। दोनों प्रोफेसर्स ने शीशे में देखा... पान खाए, ऑटो रिक्शा ड्राइवर बोला, “अरे अल्बैर कामूए ही तो लिखें हैं”
दोनों प्रोफेसर्स ने चौंक कर एक दूसरे को देखा... कि इलाहाबाद का ऑटो वाला कितना अवेयर है... बोले, “तुमने पढ़ा है लिटरेचर?”
ये है इलाहाबादी रंग... इस शहर के पानी में इंटलैक्ट है... यहां पान वाला भी आपको ऐसी ज्ञान की बात बता देगा जो आपको किताबों में नहीं मिलेगी.... क्योंकि ये शहर ही ज्ञानी लोगों का है... ये शहर है अकबर इलाहाबादी का, जवाहर लाल नेहरू का, फिराक गोरखपुरी,
अच्छा फिराक साहब से एक और किस्सा याद आया इलाहाबाद का...
दिल्ली के एक शायर जो एक सरकारी अफ़सर भी थे, एक बार इलाहाबाद आए तो फ़िराक़ साहब से मिले... कहने लगे कि मैंने गज़ल की किताब लिखी है... मैं चाहता हूं किताब का दिबाचा... यानि प्रस्तावना आप लिख दें... फिराक साहब ने कहा ठीक है... उन्होंने लिखा कि भई “ये शायर हैं... शे’र कहते हैं... दिल्ली में रहते हैं... सरकारी मुलाज़िम हैं... किताब छपवा रहे हैं... वग़ैरा” उन साहब को तसल्ली न हुई... कहने लगे “फ़िराक़ साहब इसमें बस एक लाइन और बढ़ा दीजिए कि इस शायर ने उर्दू ग़ज़ल को नया मोड़ दिया है”
फिराक साहब कहने लगे, “बेटा मोड़ मत दो वरना गज़ल टूट जाएगी... जितना लिख दिया बहुत चलो”
तो ये जो इलाहाबादीपन है... जो फिराक से चलकर, हरिवंश राय बच्चन से होता हुआ... शमसुर्रहमान फारुकी... तक पहुंचता है... ये वही मिज़ाज है। ये शहर आइपीएस पीसीएस या अधिकारी बनने का सपना लिये लोगों शहर है ... इलाहाबाद में कोई बेरोज़गार नहीं होता, सबका बस रिजल्ट आना बाकी होता है.... पर ये शहर स्ट्रीट स्मार्ट लोगों से भी भरा हुआ है.... इसी पर है आज की कहानी, पुराने वक्त इलाहाबाद से...
बात उन दिनों की है जब इस शहर का नाम इलाहाबाद था.... मैं उन दिनों जिस प्राइवेट कंपनी के सेल्स डिपार्टमेंट में काम करता था... मेरा ट्रांसफर इलाहाबाद हुआ था... पहली बार आया था मैं इलाहाबाद... मैं दिन भर दफ्तर में रहता और शाम के समय घर के सामने वाले पार्क में पहुंच जाता और वहां थोड़ी जॉगिंग वगरैह करता था।
अच्छा मैं इलाहाबाद आने से पहले कई साल मुंबई में गुज़ार चुका था... इसलिए जब मैं इलाहाबादा आया तो एक साइकॉलोजी थी कि ये तो छोटा शहर है... यहां के लोग अभी मुंबई मुंबई से दसियों साल पीछे हैं... सीधे साधे लोग हैं... मेरा सेल्स का काम था तो लगता था कि यहां तो लोगों को बेवकूफ बनाना आसान होगा। ये तो हलवा होगा मेरे लिए। सेल्स का आदमी तो खुद को डेढ़ शाना और दुनिया को बेवकूफ समझता ही है।
तो ख़ैर... साहब... एक शाम जब मैं पार्क मे पहुंचा तो गेट से अंदर आते ही मेरी नज़र किनारे वाली बेंच पर बैठे एक आदमी और उसके बगल में बैठी एक छोटी बच्ची पर पड़ी। वो दोनों खामोशी के साथ बैठे थे। बच्ची की गोद में एक किताब थी जिसमें वो कुछ पेन से अंडरलाइन कर रही थी। आदमी यही कोई पैंतालिस के आसपास होगा और उसकी बेटी दस-बारह साल की। उसने लाल रंग के रिबन वाली एक आसमानी फ्रॉक पहनी थी। कोई खास बात तो नहीं थी उन दोनों में, वो पार्क में बैठे सैकड़ों दूसरे लोगों की ही तरह ही थे.. लेकिन हां उनके चेहरे पर छाई उदासी कुछ अलग सी लग रही थी। खैर, मैंने नज़र अंदाज़ किया और पार्क में बनी पगडंडियों पर जॉगिंग करने लगा।
मैंने दो तीन चक्कर काटे और जब मैं हांफने लगा... और सोचा एक और चक्कर मार लेता हूं तो फिर से उसी बेंच पर बैठे आदमी पर और उसके बगल में बैठी बच्ची पर नज़र गयी। वो बच्ची किताब में सर झुकाए थी... और वो आदमी उसकी तरफ हसरत से देख रहा था। कि शायद वो उससे बात कर ले। आदमी... बार बार बच्ची की तरफ देखता, लेकिन कुछ कहते-कहते रुक जाता।
मैं जब चक्कर पूरा करके आया तो अबकी वो आदमी मेरी तरफ देख रहा था। मैंने उसे क्रॉस किया तो वो अपनी सीट से उठा और चुस्त कदमों से मेरे पीछे आने लगा।
मैंने ज़रा सतर्क होकर देखा, फिर आगे बढ़ने लगा। लेकिन उसने भी चाल तेज़ कर दी... मैं अब कुछ घबराया। “ये कौन आदमी है, और पीछे क्यों आ रहा है” मैंने एक बार पलट कर देखा। वो आदमी मुझे रुकने का इशारा कर रहा था। उसके चेहरे पर बेचारगी थी। हम उस बेंच पर बैठी बच्ची से कुछ दूर आ गए थे। मैं रुक गया... वो हांफता हुआ मेरे पास आया... फिर सांस संभालते हुए बोला, “आप इलाहाबाद में नए हैं शायद...”
मैंने कहा, Yes, I have come a week before.. Mumbai से आया हूं...लेकिन बात क्या है
वो बोला, वो... वो असल में मैं आपसे... एक मदद ... चाहता हूं... प्लीज़...देखिए गलत मत समझिएगा...
वो इतना ही बोला था कि मैं समझ गया कि अब ये कहेगा कि इसका पर्स खो गया है, या पैसे गिर गए हैं। पैसे दे दीजिए, ये मेरा ऐड्रैस है मैं लौटा दूंगा... अरे ये सब पैतरे अब बड़े शहरों में पुराने हो गए हैं। ये सब यहीं इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, उन्नाव यहीं चल रहे हैं... बंबई में लोग ये सब कर के छोड़ चुके हैं। मैंने सोच लिया था कि ज़ोर की डांट लगाऊंगा... जब ये पैसे मांगेगा... तो मैंने कहा..... “हां बताइये क्या मदद चाहिए...”
बोला, “सर बस एक छोटी सी मदद चाहिए.... क्या आप मेरा ऑटोग्राफ ले सकते हैं?”
“हैं” “क्या” मैं चौंक गया.... वो आगे बोला...
“देखिए, मुझे बस आपसे यही मदद चाहिए... असल में मैं एक एसपाइरिंग राइटर हूं... मतलब था। एक किताब लिखने के चक्कर में अपनी नौकरी वौकरी सब छोड़ दी... बर्बाद हो गया। किताब बिल्कुल नहीं बिकी... पब्लिशर्स किताबों के बंडल घर पर फेंक गए। अब मैं सड़क पर आ गया हूं... लेकिन लेकिन वो सब तो धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा... मैं बस अपनी बच्ची की नज़र में एक बार अपने लिए इज़्जत देखना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि मेरी बेटी जो वहां बेंच पर बैठी है... उसके सामने कोई उसके बाप से कोई एक बार कह दे कि – मैं आपका फैन हूं, एक ऑटग्राफ दे दीजिए... ताकि वो मेरे उस अपमान का दर्द कुछ कम महसूस कर सके। हमारी सारी सेविंग इसमें लग गयी... अब कुछ नहीं बचा है... बर्बाद हो गए हैं हम.... पर पर अगर एक बार आप उसके सामने मुझसे ये कहेंगे कि ‘अरे बैरागी जी आप?.... आपका तो मैं बहुत बड़ा फैन हूं... मैंने आपकी किताब ‘चूने की चांदनी’ पढ़ी है.... क्या लिखते हैं आप.... एक ऑटोग्राफ दे दीजिए” – बस... इतना अगर आप कर दें... तो एक बेटी की नज़र में उसके बाप की इज़्जत बढ़ जाएगी। उसे ये लगेगा कि इस किताब से सिर्फ गंवाया नहीं है, कुछ तो हासिल हुआ है”
बड़ी अजीब सिचुएशन थी ये... ऐसा तो मैंने पहले कभी सुना ही नहीं था... पर बहुत इमोशनल वजह थी... मना करता तो अंदर से बहुत खराब लगता... बेचारा क्या ही मांग रहा था... थोड़ी सी एक्टिंग ही तो करनी थी... औऱ वो तो मुझे पसंद ही थी... कॉलेज में बहुत की थी... सेल्स में कस्टमर के सामने आधी तो एक्टिंग ही होती है... मैं ज़रा सा मुस्कुराया... उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा –
“ठीक है, आप जाइये... वहीं बैठ जाइये... मैं उधर से चक्कर मार कर आऊंहा... और फिर .... क्या नाम बताया किताब का...”
- “च..च..चूने की चांदनी...” उसने बताया “और मेरा नाम बैरागी जी.... आप मुझे नाम से बुलाइयेगा”
हां हां सागर साहब... आप जाइये... मैं आता हूं... थोड़ी बहुत एक्टिंग हमने भी की है कॉलेज में... मैंने हसते हुए कहा तो वो हाथ जोड़कर बोला... बहुत महरबानी... मैं जाता हूं।
उसके जाने के बाद मैं कुछ देर खडा रहा और एक दो बार.... बुदबुदाने लगा।
खैर, दो-एक बार प्रैक्टिस करने के बाद मैं उस तरह पहुंचा। इस बार मेरी एक्टिंग ऐसी थी कि ऑस्कर वाले देख लेते तो इलाहाबाद के के इसी पार्क से सीधे उठा ले जाते। मैं दौड़ता हुआ आया ऐन बेंच के पास रुक कर अपने जूते की डोरी बांदने लगा... जो मैंने थोड़ी दूर पहले खुद खोली थी। फिर बहाने से अचानक देखकर कहा... “आप?” मैंने जैसे ही कहा.... किताब खोले बच्ची ने मेरी तरफ देखा.. फिर अपने पापा को देखा.... मैंने आदमी की तरफ देखकर कहा... “आप.... वो... आप बैरागी जी ही हैं ना”... उस आदमी ने फौरन पैर के उपर पैर रख लिए... और हाथ बांध कर बेंच पर पीछे खिसक गया। एक मिनट में सेलेब्रिटी बन गया... औऱ से बोला, “जी मैं ही हूं बैरागी... लेकिन आप की तारीफ....”
- “अरे मेरी तारीफ छोड़िये सर... तारीफें तो आपकी जितनी की जाएं उतनी कम हैं... ज़रूर मैंने पिछले जन्म में कोई नेकी की होगी कि आपसे मुलाकात हो गयी... मैं... मैं बता नहीं सकता बैरागी जी मैं आपका कितना बड़ा फैन हूं। आपकी वो... वो अभी किताब आयी है चूने की चांदनी... तीन बार, तीन बार पढ़ चुका हूं... क्या लिखा है आपने.... बैरागी जी... आप... आप अगर बुरा न माने तो.... मैंने अपने ट्रैक पैंट की जेब में हाथ डाला और कागज़ ढूंढने लगा... मेरे हाथ में एक पर्ची आई...जो इलाहाबाद आते वक्त टोल वालों ने रसीद के तौर पर दी थी। मैंने वही पर्ची उस आदमी की तरफ बढ़ा दी।
मैं उस पल उस आदमी का चेहरा देख रहा था... उसने बड़ी अदा से कागज़ लिया... फिर पूरा वक्त लेकर अपनी कमीज़ में लगी कलम निकाली... एक बार बहुत फख्र से उस बच्ची की तरफ देखा। उस बच्ची ने मुझे देखा। फिर उस आदमी ने कागज़ के टुकड़े पर दस्तखत किये. और कागज़ मेरी तरफ बढ़ा दिया।
मैंने बच्ची का चेहरा देखा... उसके चेहरे पर खुशी झूम रही थी, पर वो एक्साइटमेंट छुपाए थी।
मैंने कागज़ लिया... जेब में रखा और उनसे हाथ मिलाकर कहा, “सर मैं... मैं यहीं पास में रहता हूं... किसी दिन घर आइये न... क्या अच्छा दिन रहा आज... आपसे मुलाकात हो गयी...” कहकर मैं वहीं से निकल गया।
मैं आप लोगों को बता नहीं सकता कि इस पांच मिनट की एक्टिंग के बाद मेरे मन में कितनी ज़्यादा खुशी भरी हुई थी। लग रहा था कि मैंने कितना नेक काम किया है। बच्ची के मन में अपने नाकाम बाप के लिए इज़्जत पैदा करके। अच्छा अच्छा फील हो रहा था।
बहरहाल, कुछ देर के बाद जॉगिंग खत्म करके मैं पार्क से बाहर निकला तो देखा कि वो आदमी गेट के पास खड़ा है अकेले। शायद वहां पर लगे नल से पानी की बॉटल भरने आया था। मैंने उसे देखा... नज़रे मिली तो अबकी मैं मुस्कुराया और वो मेरी तरफ बढ़ा... “अरे सर, कैसे शुक्रिया अदा करूंगा आपका... आप को बता नहीं सकता कि आपने मेरे लिए क्या किया है। देखा था आपने कैसे देख रही थी। फख्र कर रही थी अपने बाप पर... ये मौका आपने दिया मुझे... अब मैं तो बर्बाद हो चुका हूं... कौड़ी कौड़ी को मोहताज हूं लेकिन इस बर्बादी के आलम में इस एक पल की क्या कीमत होगी... मैं आपको बता नहीं सकता”
मैं अपने उसी फील गुड वाले असर में उसकी तरफ बढ़ा.... और कंधे पर हाथ रखते हुए कहा... “कोई बात नहीं, मेरी भी बेटी है... मैं समझ सकता हूं” और फिर मैंने कुछ सोचा और अपनी दूसरी जेब में हाथ डालते हुए हज़ार रुपये का एक नोट निकाला, उन दिनों हज़ार के नोट चलते थे। मैंने उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा, “लो ये रख लो... काम आएंगे”
- अरे नहीं सर... आप ने यं ही इतनी मदद
- अरे कोई नहीं ले लो...
- “बहुत बहुत शुक्रिया... सर आपका...” उसने कहा और मैं आगे बढ़ गया।
उस दिन मुझे लगा था कि दुनिया कितनी सुंदर हो गयी है। इलाहाबाद जैसे शहर में मेरे जैसा बंबई से आया चतुर चौकास चालाक चमत्कारी आदमी... कितनी शानदार तरीके से मदद कर रहा है सबकी... जैसे वो स्वदेस का शाहरुख खान अमरीका से आया है गांव में बिजली बनाने। ज़िंदगी अच्छी-अच्छी लगने लगी।
दो अगले दो दिन तक दिल में फील गुड होता रहा... तीसरे दिन मैं शाम को फिर से जॉगिंग करते हुए पार्क पहुंचा... अपना वही मरून ट्रैक सूट पहने हुए। मैं अभी पार्क में दाखिल ही हुआ था कि उसी बेंच पर वो बच्ची मुझे फिर से बैठी दिखाई दी। मैं मुस्कुराया...लेकिन उसके चेहरे पर आज भी वैसे ही भाव थे... मुझे थोड़ा बुरा लगा “बड़ी ज़िद्दी टाइप की लड़की है... उसको पता है कि उस दिन मैंने उसके पापा से बात की थी... कम से मुस्कुरा सकती थी...” सोचकर मैंने उस बच्ची की तरफ ज़रा चिढ़ कर देखा... और भवें तिरछी करते हुए निकल गया। जब मैं एक चक्कर काट कर आया और फिर से उसके सामने से गुज़रा तो मैं पसीने में हांफ रहा था... हालांकि वो बेंच पर किताब लिए बैठी, उसी में झुकी थी। इस बार मुझसे रहा नहीं गया। मैंने एक ही जगह पर खड़े खड़े जॉगिंग करते हुए, जिसे स्पॉट जॉगिग कहते हैं, करते हुए कहा, “कहां हैं”
उसने तरफ सर उठाकर देखा... फिर पीछे देखा जैसे चेक कर रही हो कि मैं किसी और से बात तो नहीं कर रहा है... फिर बोली... “कौन....”
मेने कहा “अरे तुम्हारे पापा... और कौन....”
उसने एक बार मुंह थोड़ा सा बिचकाया... फिर कुछ कनफ्यूज़ होते हुए बोली.... बैंगलोर
मैंने कहा, “बैंगलोर चले गए.... कब गए”
वो बोली, “वो तो वहीं रहते हैं... चार साल से”
मैं जो खड़े खड़े जॉगिंग कर रहा था रुक गया... “चार साल से... तो वो उस दिन यहां जो बैठे थे... वो कौन था” मैंने हैरानी से पूछा.... उसने बड़ी बेफिक्री से कंधे उचकाते हुए कहा, “मुझे क्या पता... मैं तो रोज़ यहां पढ़ने आती हूं... घर पर उस वक्त मम्मी से कथक सीखने वाले बच्चे आ जाते हैं तो बहुत शोर होता है... तो मैं यहां चली आती हूं... उस दिन भी बैठी थी... वो मेरे बगल में आकर बैठ गए... मुझे क्या पता वो कौन थे”
ये सुनते ही मुझे अपने कानों के पीछे कुछ गर्म गर्म महसूस हुआ। और याद आए वो हज़ाप रुपए जो मैंने उसे दिए थे निकला था। “चूना लगा गया” मेरे मुंह से बस यही निकला... तभी मुझे याद आया कि उस दिन जब मैंने उसकी तरफ पर्ची बढ़ाई थी तो उसने ऑटोग्राफ के तौर पर कुछ लिखा था। मैंने फौरन ट्रैक सूट की जेब में में हाथ डाला... जेब के कोने में एक गुंजटी हुई पर्ची मिली... मैंने उसे खोला... तो क्या देखता हूं कि उस पर उसने कोई ऑटोग्राफ नहीं दिया था... वहां लिखा था इलाहाबाद में स्वागत है महाराज
जमशेद क़मर सिद्दीक़ी