कश्मीर से कन्याकुमारी तक, क्यों पूरे देश में अलग है छत, खिड़की और घरों का डिजाइन?

आर्किटेक्ट संजय पुरी का कहना है क भारत में हर जगह एक जैसे घर नहीं बनाए जा सकते हैं. राजस्थान की जरूरतें अलग हैं और गोवा व केरल की अलग. राजस्थान में गर्मी को ध्यान में रखते हुए घर डिजाइन किए जाते हैं. जबकि गोवा-केरल में बारिश का ख्याल रखना पड़ता है.

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भारत में हर जगह मौसम के हिसाब से घरों का डिजाइन तय किया जाता है. (Photo: ITG) भारत में हर जगह मौसम के हिसाब से घरों का डिजाइन तय किया जाता है. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 10:34 PM IST

क्या आपने कभी गौर किया है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में घरों का डिजाइन बिल्कुल अलग होता है. कहीं खिड़िकियां और रोशनदान छोटे रखे जाते हैं तो कहीं बड़े. कहीं घर की छतों को फ्लैट रखा जाता है तो कहीं स्लोप. कश्मीर से कन्याकुमारी तक घरों का डिजाइन एकदम अलग हो जाता है. आखिर इसकी वजह क्या है? मशहूर आर्किटेक्ट संजय पुरी ने एक पॉडकास्ट में इस बारे में विस्तार से जानकारी दी है.

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संजय पुरी ने बताया कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में घरों का डिजाइन वहां के मौसम के हिसाब से बदलता है. राजस्थान में गर्मी और रोजमर्रा के घरेलू कामों के लिए छत का उपयोग अहम हो सकता है. जबकि गोवा और केरल जैसे ज्यादा बारिश वाले इलाकों में ढलान वाली छत ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है. वहीं, दिल्ली में गर्मी और सर्दी दोनों का ध्यान रखना पड़ता है. इसलिए घर की दिशा, छत और डिजाइन थोड़ा अलग होता है.

उन्होंने कहा कि घर बनाते समय उसकी खूबसूरती के साथ-साथ मौसम का भी ध्यान रखना पड़ता है. राजस्थान, दिल्ली, गुजरात और दक्षिण भारत में मौसम की परिस्थितियां अलग हैं. ऐसे में घर की योजना भी एक जैसी नहीं हो सकती. इनमें कुछ बदलाव जरूरी हैं. उदाहरण के लिए गर्म इलाकों में कई बुनियादी प्लानिंग एक जैसी हो सकती हैं. जैसे- घर की दिशा और कोर्टयार्ड. लेकिन घर के डिजाइन में कुछ जरूरी बदलाव करने ही होंगे.

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राजस्थान में छतें फ्लैट क्यों?
आर्किटेक्ट संजय पुरी ने बताया कि राजस्थान एक गर्म इलाका है. ऐसे में वहां फ्लैट रूफ यानी सपाट छत का इस्तेमाल कई तरह से किया जा सकता है. घर के लोग इस जगह का इस्तेमाल अचार बनाने, अनाज सुखाने और दूसरे घरेलू कामों के लिए कर सकते हैं. इन कामों के लिए सपाट छत बहुत उपयोगी होगी. लेकिन इसी डिजाइन को ज्यादा बारिश वाले इलाके में इस्तेमाल करना उचित नहीं है.

गोवा और केरल में ढलान वाली छतें
गोवा और केरल जैसे इलाकों में बारिश ज्यादा होती है. ऐसे स्थानों पर पारंपरिक रूप से ढलान वाली छतें बनाई जाती हैं. इससे बारिश का पानी घर की छत पर जमा नहीं होता है. छत ढलान होने की वजह से वो नीचे की तरफ निकल जाता है, जिससे छत के लीकेज होने का खतरा कम होता है.

इसके अलावा, कश्मीर में भी स्लोप यानी ढलान वाली छतें बनाई जाती हैं. इसकी वजह यहां की ज्यादा बर्फबारी है. बर्फबारी होने से अक्सर लोगों की छतों पर बर्फ जमा हो जाती है. फ्लैट छतों से इस बर्फ को हटाना बहुत टेढ़ा काम है. लेकिन स्लोप वाली छतों पर जमी बर्फ को आसानी से हटाया जा सकता है.

दिल्ली में दोनों दिशाओं में धूप जरूरी
देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति थोड़ी अलग है. यहां गर्मी और सर्दी दोनों ही ज्यादा होती हैं. इसलिए घर की प्लानिंग में दोनों मौसमों का ध्यान रखना पड़ता है. दक्षिण दिशा से आने वाली धूप सर्दियों में उपयोगी हो सकती है. वहीं, उत्तर दिशा में बनी खिड़की गर्मी के मौसम में ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकती है. दरअसल, भारत के उत्तरी गोलार्ध और दिल्ली जैसे गर्म इलाकों में सूरज दक्षिण दिशा में रहता है, जिससे उत्तर दिशा में मौजूद खिड़कियों से सीधी और तेज धूप अंदर नहीं आती है.

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